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यूपी में दलित वोट बैंक पर सियासी जंग तेज, भाजपा-सपा-बसपा-कांग्रेस सभी ने झोंकी ताकत

Political Battle for Dalit Vote Bank Intensifies in UP; BJP, SP, BSP, and Congress Go All Out - Lucknow News in Hindi

लखनऊ । उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सभी दलों ने दलित वोटों को साधने की तैयारी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा) बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस इन दिनों प्रमुखता से दलित वोटों को रिझाने के लिए तरह-तरह की रणनीति बनाने में जुटे हैं। चुनाव करीब आते देख सभी दल इस वर्ग पर खास फोकस कर रहे हैं। इस कारण अंबेडकर जयंती के पहले राजनीतिक दलों में तरह-तरह की प्रतिस्पर्धा देखने के लिए मिल रही है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के सकारात्मक नतीजे न आने के बाद से ही दलित वोट बैंक को सहेजने की कवायद शुरू कर दी थी। इसका बेड़ा खुद संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने उठाया था। उन्होंने इस वर्ग के प्रोफेशनल के बीच उनके कैंपस में जाकर उनके दर्द को समझने का प्रयास किया। कई संगोष्ठियों का आयोजन किया। धर्मपाल खुद कई जिलों में पहुंचे। 45 जिलों में उन्होंने अनुसूचित वर्ग के बीच चल रही योजनाओं के बारे में बताया। इसके बाद टीम भी लगातार संपर्क कर रही है। उसी का नतीजा है कि अंबेडकर जयंती के पहले सरकार ने अंबेडकर मूर्ति विकास योजना की शुरुआत की है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर के समाज सुधारक, सांस्कृतिक विभूतियों की मूर्तियों की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण को एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
डा० बी०आर० अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ के अंतर्गत योगी सरकार बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ-साथ संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि समेत अन्य महापुरुषों की मूर्तियों का व्यापक सौंदर्यीकरण करेगी। इसके साथ ही आगामी 14 अप्रैल को प्रदेश की सभी विधानसभा क्षेत्रों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। यहां स्थानीय जनप्रतिनिधि (सांसद, विधायक, एमएलसी) जनता को इस योजना और चयनित स्थलों के बारे में जानकारी भी देंगे।
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी का कहना है कि भाजपा ने दलित वर्ग के लिए सबसे ज्यादा काम किया है। पुरानी सरकारों ने तो सिर्फ नारे लगाकर इनका वोट लिया है। सपा सरकार ने दलितों का सबसे ज्यादा उत्पीड़न किया है। महापुरुषों के नाम बदलने से लेकर जितने भी अत्याचार के काम थे, सब इन्हीं की सरकार में हुए। जब से भाजपा सरकार आई है उसका फोकस दलित उत्थान और महापुरुषों को उचित सम्मान रहा है।
वहीं, लोकसभा के चुनावी नतीजे से उत्साहित समाजवादी पार्टी ने अब अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम की बनी तस्वीर से थोड़ा अलग रणनीति बनायी है। दलित वर्ग पर विशेष ध्यान दिया है। पार्टी ने बसपा से आए नेताओं को आगे कर दलित समाज में पैठ बनाने की कोशिश तेज कर दी है। दलित वोटरों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए पार्टी कांशीराम की जयंती से लेकर डॉ. अंबेडकर जयंती मनाने की परंपरा को शुरू किया है।
सपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक यादव कहते हैं कि भाजपा का दलित के प्रति प्रेम यह सिर्फ चुनावी प्रेम है। भाजपा सिंबॉलिक पॉलिटिक्स करती है। इससे समाज का भला नहीं होगा। उससे इसका कोई भला नहीं होगा। उसका भला नौकरियों में आरक्षण बढ़ेगा। उन्हें बराबरी का दर्जा मिलेगा। उप्र में भाजपा की सरकारों में सिर्फ दलितों के अधिकारों को लूटा गया है। सोशल जस्टिस की लड़ाई सिर्फ सपा लड़ती है। उनके अधिकारों को दिलाने के लिए वह हमेशा आगे बढ़ती रहेगी।
कांग्रेस भी प्रदेश में दलित वोटों को रिझाने के लिए प्रयासरत है। उसने अभी पिछले दिनों पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को भी बुलाया था। इसके अलावा कई प्रोग्राम चला रही है। कांग्रेस के प्रवक्ता अंशू अवस्थी ने कहा कि भाजपा दलितों को लुभाने के लिए सिर्फ चुनावी स्कीम लाती है। इससे उनका उत्थान नहीं होता। जबकि कांग्रेस ने अपनी सरकारों वाले प्रदेशों के लिए अच्छी अच्छी स्कीम और कानून लाए हैं। जिससे उनका भला हुआ है। यह लोग बाबा साहेब के बनाए संविधान को बदलना चाहते हैं। भाजपा का कोई भी हथकंडा चलेगा नहीं।
दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी अपने पारंपरिक जाटव वोट बैंक को बचाए रखने पर सबसे ज्यादा जोर दे रही है। साथ ही गेस्ट हाउस कांड, प्रमोशन में आरक्षण और दलित महापुरुषों के नाम पर बने जिलों की बात को लगातार उठा कर सपा से आगाह कर रही हैं। मायावती अब भी दलित राजनीति का बड़ा चेहरा मानी जाती हैं। वह एक बार फिर ब्राह्मण-दलित समीकरण को साधने की कोशिश में है, लेकिन संगठन की सक्रियता और बदलते राजनीतिक समीकरण उसके सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत का मानना है कि विधानसभा चुनाव के लिए सभी दल का फोकस दलित वोट बैंक ही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में दलित वोट कई सीटों पर हार-जीत तय करेगा। इसी कारण सत्तारूढ़ दल भाजपा लगातार इस पर फोकस कर रही है। सपा भी इस वोट बैंक पर ज्यादा निगाह बनाए हुए हैं। कांग्रेस भी दलित वोट को पाने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपना रही वहीं बसपा सभी दलों को घेरकर लगातार आगाह कर रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव दलित वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है।
--आईएएनएस

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