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समाजवादी पार्टी के गढ़ में, उनके अपने ही दे रहे हैं टक्कर

In the bastion of the Samajwadi Party, they are giving their own collision - Lucknow News in Hindi

धीरज उपाध्याय
लखनऊ । लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण के मतदान के बाद अब तीसरे और चौथे चरण के लिए 23 और 29 अप्रैल को समाजवादी पार्टी के गढ़ में मतदान होगा। पहले चरण में मतदान के प्रतिशत में ज्यादा बढ़त नहीं आने से सभी पार्टियो की नजर अब अगले चरणों मे होने वाले मतदान पर टिकी है। वहीं उत्तर प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा ) में हालात कुछ ठीक नहीं दिख रहे है। उसको इस बार अपने गढ़ में अपने यादव कुनबे के लोगों से चुनौती मिलती दिख रही है। आगामी चुनाव में यादव परिवार के अपने गढ़ मैनपुरी, फ़िरोज़ाबाद और इटावा तक में उसके करीबी ही सपा के खिलाफ ताल ठोकते नजर आ रहे है।

बता दे कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए सपा ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के साथ गठबंधन के तहत सपा के कोटे में 37 सीटें आयी है, वहीं बसपा को 38 सीटें और आरएलडी को 3 सीटें मिली है। अभी तक सपा ने अपने कोटे से 11 उम्मीदवारो के नामों की 3 लिस्ट जारी की है। लेकिन उसके अपने गृह क्षेत्र और यादव परिवार के गढ़ इटावा, फ़िरोज़ाबाद और मैनपुरी जहां से सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ने जा रहे हैं, वहाँ भी उनके लिए परिस्थितियाँ कठिन होती जा रही हैं। इन सबके पीछे कार्यकर्ताओं का गठबंधन के प्रति असंतोष तथा मौजूदा नेत्रत्व द्वारा उनकी बढ़ती हुई अनदेखी भी एक कारण है । इसका एक ताज़ा उदाहरण है, जब चुनाव तारीखों के ऐलान से ठीक पहले, सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने मैनपुरी की 51 सदस्यीय जिला इकाई को भंग कर दिया था, जिससे वहाँ के कार्यकर्ताओं मे काफी रोष है। उसके बाद इस सीट पर मौजूदा सांसद तेज प्रताप सिंह यादव जो मुलायम के पोते हैं, उनको इस सीट से टिकट न मिलने से उनके समर्थको ने अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ, जिला पार्टी दफ्तर पर नारेबाजी करते हुए अखिलेश और रामगोपाल यादव मुर्दाबाद के नारे लगाये। दूसरी ओर शिवपाल यादव ने अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (पीएसपीएल) के बैनर तले फ़िरोज़ाबाद सीट से रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव के खिलाफ मैदान में उतरकर इसको अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया है। जबकि फ़िरोज़ाबाद से मुलायम के करीबी और विश्वासपात्र, सिरसागंज से पार्टी विधायक, हरिओम यादव द्वारा शिवपाल के समर्थन के ऐलान के बाद इस सीट पर वर्तमान सांसद अक्षय यादव की मुश्किले और बढ़ गयी है। इन सबके कारण समाजवादी पार्टी को अपने घर में भी अपनी स्थिति डामाडोल नजर आ रही है। वहीं परिवार के गढ़ इटावा की दूसरी सीट पर शिवपाल के उम्मीदवार उतारने से सपा उम्मीदवार कमलेश कठेरिया के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। बदायूं में भी धर्मेंद्र यादव के लिए मुश्किलें बढ़ गयी जबसे कांग्रेस ने चार बार सांसद रह चुके सलीम शेरवानी को वहाँ से उतारा है। जिससे वहाँ के करीब 2 लाख मुस्लिम वोटों में फर्क पड़ सकता है।

गौरतलब है कि 2014 लोक सभा चुनाव में यूपी में मोदी लहर में जब सभी पार्टियाँ बह गयी थी, तब प्रदेश में केवल यादव परिवार ही यादव बेल्ट और आजमगढ़ के सहारे अपनी पाँच सीटें जीत पाने में कामयाब रही थी। हालांकि इस बार सपा का कुनबा अपने ही क्षेत्र में कमजोर नजर आ रहा है। विरोध और बगावत सपा के लिए नया नहीं है। वर्ष 2016 के बाद यादव परिवार में सत्ता को लेकर शुरू हुए पारिवारिक झगड़े से पिछले तीन वर्षों में आंतरिक विघटन के कारण समाजवादी पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है। यहीं कारण है कि 2014 के लोक सभा चुनाव में पाँच सीटे जीतने के बाद भी सपा को राष्ट्रिय राजनीति में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए प्रदेश में गठबंधन का सहारा लेना पड़ा और वो अब 80 में से केवल 37 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वहीं शिवपाल यादव द्वारा प्रदेश के सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के ऐलान से वो अपनी पूर्व पार्टी सपा को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते दिख रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषको के मुताबिक, बसपा के खाते में गयी सपा की सीटों पर समाजवादी पार्टी के मजबूत और जिताऊ पूर्व सांसद, क्षेत्र के पदाधिकारी नेता जिनको किसी और जगह से टिकट नहीं मिलेगा, वो सभी अंतिम सूची जारी होने बाद अन्य पार्टियो और खासकर शिवपाल की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (पीएसपीएल) का रुख कर सकते है। जिसके चलते सपा के वोट बैंक को नुकसान होगा। गौरतलब है कि गठबंधन में दो पार्टियों के शीर्ष नेत्रत्व में तो ताल-मेल नजर आ रहा है , लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओ के बीच सामंजस्य की कमी है। सपा के जमीनी कार्यकता ये मानने को तैयार नहीं है कि जिस बसपा राज्य में उनपर मुकदमे लादकर जेल भेजकर प्रताड़ित किया गया था अब उसी का साथ कैसे दे । जबकि शिवपाल के पार्टी में रहने के बावजूद अंतर्कलह के कारण 2017 यूपी विधान सभा चुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था। जबकि इस बार वो यादव बाहुल्य क्षेत्रों में खुलकर प्रभाव डालने की हर संभव कोशिश करेंगे जिससे, ये साबित किया जा सके कि अखिलेश यादव उनके और मुलायम सिंह यादव के मुक़ाबले एक कमजोर नेता है।

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Web Title-In the bastion of the Samajwadi Party, they are giving their own collision
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