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क्या पूर्वी यूपी में 3-4 फीसदी वोट बदलने से, गठबंधन 8-10 सीटों पर बिगाड़ सकता है भाजपा का गणित

BJP math can break the alliance with 8-10 seats - Lucknow News in Hindi

धीरज उपाध्याय
लखनऊ । दिल्ली की संसद का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है ये बात सभी दल जानते है। इसलिए सभी राजनीतिक पार्टिया यूपी में अपनी पूरी ताकत लगाकर लोकसभा चुनाव लड़ रही है। वहीं भाजपा इस बार भी उत्तर प्रदेश में 2014 लोक सभा चुनाव का अपना पुराना रिकार्ड दोहराना चाहती है। इस बार यूपी में भाजपा नेताओं ने 74 + प्लस का नारा दिया है। वहीं विपक्षी पार्टियाँ उसके विजय रथ को रोकने के लिए कहीं एक साथ मैदान में हैं तो कुछ जगहों पर अकेले ही भाजपा को रोकने के ज़ोर लगा रही है। भाजपा और राजग ने पिछली बार पूर्वाचल में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था। इस बार भी पार्टी यहाँ पर फिर से मोदी और राष्ट्रवाद के नाम पर अपना परचम फहराना चाह रही है। वहीं मोदी मैजिक को गलत साबित करने के लिए एक दूसरे के धुर-विरोधी रहे सपा-बसपा ने 25 साल बाद गठजोड़ किया हैं। कांग्रेस ने भी पूर्वी यूपी फतह करने के लिए प्रियंका गांधी के रूप में अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया हैं। प्रियंका ने तो पूर्वाचल में अपने पुराने वोट बैंक को साधने के लिए लगातार 3-4 दिनों तक गंगा यात्रा भी की है।
पूर्वाचल में चुनाव छठे चरण 12 मई और सातवें व अंतिम चरण 19 मई को होने है। पूर्वाचल जीतने के लिए सभी दलों की नजर पिछले चुनाव के आंकड़ों पर है, जहाँ पूर्वाचल में केवल तीन-चार प्रतिशत मतों के उलटफेर से प्रमुख दलों के ‘‘महारथियों’ को फर्श से अर्श और अर्श से फर्श पर पहुंचाया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वाराणसी सीट पूर्वाचल के केंद्र बिन्दु के रूप में देखी जा सकती है। इस सीट का असर आस पास के करीब 10-12 सीटो पर रहता है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्वाचल के 10 जिलों की 12 लोकसभा सीटों की धुरी वाराणसी थी। जिसके चलते भाजपा ने वाराणसी के साथ पूर्वाचल की 12 में से 11 सीटों पर कमल खिलाया था। एकमात्र आजमगढ़ लोकसभा सीट में तत्कालीन सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव अपनी साइकिल दौड़ाने में कामयाब रहे थे। बीते चुनाव में पूर्वाचल भगवा में रंगा था और भाजपा इसी प्रदर्शन को दोहराने की जुगत में है। पिछले लोकसभा चुनाव में पूर्वाचल की 12 सीटों में से 9 सीटों पर जीत और हार का अंतर के बीच 10 फीसदी से भी कम वोटों का अंतर था। हालांकि पिछले चुनाव में नौ सीटों पर सपा-बसपा को मिले वोट प्रतिशत का गणितीय जोड़ भाजपा पर भारी दिख रहा है। इनमें से तीन सीटों पर तो मुक़ाबला अंतिम राउंड की काउंटिंग तक चला था। इसी को देखते हुए सपा-बसपा गठबंधन इन सीटों पर अपने पिछले प्रदर्शन के आधार पर भगवा खेमे को पछाड़ने की रणनीति बना रही है। ये वो सीटें है जहाँ गठबंधन इस बार भाजपा को पटकनी देने की फिराक में है। जैसे की गाजीपुर लोकसभा सीट जहाँ से भाजपा प्रत्याशी मनोज सिन्हा ने अपनी प्रतिद्वंद्वी सपा की शिवकन्या कुशवाहा को मात्र 1.80 फीसद वोटो के अंतर से हराया था। लालगंज लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की नीलम सोनकर भी सपा के बेचई सरोज से महज 3.79 प्रतिशत ज्यादा वोट पाकर विजयी हुई थीं। वहीं पूर्वाचल में सपा के पाले में जाने वाली एकमात्र सीट पर सपा के मुलायम सिंह यादव भी भाजपा के रमाकांत यादव से मात्र 3.71 प्रतिशत अधिक वोट ही पा सके थे। इसके अलावा जौनपुर, मछलीशहर, घोसी, बलिया, चंदौली और भदोही लोकसभा सीट पर भी जीत का अंतर 10 फीसदी से भी कम वोटों का था।
पूर्वाचल में ज़्यादातर सीटों पर जातीय गणित गठबंधन के पक्ष में दिखता है, क्योंकि पिछली बार भाजपा ने मोदी लहर के चलते जातीय गणित के ऊपर पार पाने में सफलता प्राप्त की थी , लेकिन इस बार प्रदेश में गठबंधन के रूप में दलित- मुसलमान- पिछड़ा का जो मजबूत समीकरण बना है, भाजपा को उसे भेद पाना चुनौती होगी।

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