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इलाहाबाद का ऐतिहासिक दधिकांदो मेला शुरू, 1890 में अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में हुई थी शुरूआत

historic Dudhandongo fair begins in allahabad - Allahabad News in Hindi

अमरीश मनीष शुक्ल, इलाहाबाद। संगम नगरी यानी इलाहाबाद से आज मैं आपके लिए एक और ऐतिहासिक कहानी लेकर आया हूं। जिसे पढ़कर आप आजादी की लड़ाई के कुछ गौरवशाली समय को अपने जहन में उतार सकेंगे और वह जान पाएंगे जो किताबों में नहीं मिलता है, तो आइये इतिहास के धूमिल उन पन्नों को पलटते है। बात 1890 की है। जब हिन्दुस्तान अंग्रेजों का गुलाम था। हिंदुस्तानी क्रन्तिकरियों ने गुलामी की जंजीरो को तोड़ने के लिए आवाज उठानी शुरू कर दी थी। उसी वक़्त अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में शुरू हुआ था एक ऐतिहासिक मेला। जो सैकड़ों सालों से आज भी निरंतर संगम नगरी में आयोजित हो रहा है। यह उस वक़्त सिर्फ मेला नहीं था। यह इलाहाबाद में अंग्रेजी हुकूमत से बगावत की शुरुवात थी। अधिकांश लोग इसे आज भी सिर्फ मनोरंजन वाला मेला ही समझ लुफ्त उठाकर वापस लौट जाते है। लेकिन यह मेला क्रांतिकारियों खून से सींचा गया था। इस मेले के कण कण में क्रांन्तिकरियों की आवाज सुनने वालों को आज भी सुनाई देती है। बस लाउडस्पीकर के शोर में अब कोई उससे सुनने वाला नहीं है। इस साल का दधिकंदो शुक्रवार की रात यानी 25 अगस्त को 2017 से शुरू हो चुका है। अब यह शहर के कैंट इलाके में लगातार चलता रहेगा। मेले की खास बात है सजे-धजे हाथी पर रखे चांदी के हौदे पर आसीन श्रीकृष्ण-बलदाऊ के दिव्य जोड़ी। इस ऐतिहासिक मेले में अगर कोई परम्परा आज भी सैकड़ों सालों से निभाई जा रही है तो वह यही है। लोग श्रीकृष्ण-बलदाऊ की एक झलक के भी बेकरार होते है। इस मेले को अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में आम जनमानस को एकजुट करने के लिए शुरू किया गया था। यह ठीक उसी तरह की शुरुआत थी जैसा की महाराष्ट्र में गणेश पूजा पर होता था। तीर्थराज प्रयाग में इसके लिए दिन चुना गया और वह दिन था भगवन श्रीकृष्ण के जन्म का छठवां दिन। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के बाद उनकी छठी मानने का धार्मिक कारण दर्शा कर लोगों को एकत्रित किया गया और अब सैकड़ों साल बाद भी यह क्रम है।

बात उस उस वक़्त की की है जब इलाहाबाद के कैंट इलाके में अंग्रेजों द्वारा हिन्दुस्तानियों के किसी प्रकार के उत्सव पर प्रतिबन्ध था। उन दिनों अंग्रेजों का आतंक चरम पर बढ़ चला था। तब सन 1890 में इलाहबाद में इस मेले की नींव रखने के लिए क्रांन्तिकरियों की बैठक हुई थी। प्रयाग के तीर्थ
पुरोहित रामकैलाश पाठक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय चंद्र, सुमित्रा देवी ने उस बैठक को सम्बोधित किया था। निर्णय हुआ की अगर बहुत सारे लोग एक साथ एक जगह एकत्रित हो तो उनमें आजादी की लड़ाई के लिए जोश भरा जा सकता है।अगर ज्यादा लोग एकत्रित हो तो तो उनमें संगठित होने की भी भावना घर करती।
साथ ही उनके अंदर से अंग्रेजों का भय खत्म जा सकता था। लोग क्रांति के नाम पर उस समय बामुश्किल ही एकत्रित होते। लेकिन धार्मिक उत्सव के नाम पर उन्हें नजदीक लाया जा सकता था। लेकिन अब भी समस्या यह थी कि अंग्रेज कही इस मेले को न होने दे तब क्या होगा। लेकिन मामला धर्म से जुड़ा था तो इतना तो साफ था कि अंग्रेज जबरन कोई कदम नहीं उठाएगा। लेकिन
एहतियातन मेले का आयोजन रात में ही करने का निर्णय लिया गया। इसके पीछे वजह यह भी थी की रात में लोग खाली रहते। सब कुछ तय तो हो गया और पूरे इलाहाबाद में यह जानकारी फैला दी गई की इस बार भगवान श्रीकृष्ण की छठी मनाई जाएगी। भगवान की झांकी निकली जाएगी। जो भी इसमें शामिल होगा। उनका जीवन धन्य हो जायेगा। लोगों में मेले को लेकर काफी मोह पैदा हुआ। कुछ धर्म से, कुछ मनोरंजन से और कुछ क्रांति से। लेकिन उस वक़्त इतने आधुनिक संशाधन तो ही लाइट आदि की व्यवस्था थी. तब इस मेले की शुरुआत मशाल व लालटेन की रोशनी में हुई।जन्माष्टमी के 5 दिन बाद यानि छठवे दिन श्रीकृष्ण-बलदाऊ की जोड़ी सजी। मेले में तब हठी घोड़े थे थे नहीं लोगों ने अपने कंधे पर श्रीकृष्ण-बलदाऊ को बैठाया और निकल पड़े मेला (नगर) भ्रमण पर। लोगों में बाल गोपाल को अपने कंधे पर बैठने की होड़ मची रही। लोग आस्था में ऐसे दुबे की सारी रात मेला चलता रहा। जयकारा लगता रहा। जहां से भी यह सवारी निकलती लोग अपने घरों से पड़ते और जयकारा लगाए हुए पीछे चल पड़ते। रात भर में यह एक ऐसा कारवां बन गया जो आने वाले वक़्त में अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेकने की चिंगारी भर रहा था। फिर तो हर साल यह मेला दिन दूना चुगनी की कहावत के हिसाब से बढ़ता गया।

दधिकांदो का अर्थ है दही क्रीड़ा। सबको पता है की भगवन श्रीकृष्ण दही और मक्खन की कैसी कैसी लीला करते थे। इसलिए इस मेले का नाम भी दधिकांदो रखा गया। पैदल लालटेन और मशाल से गैस की रोशनी से होते हुए आज श्रीकृष्ण-बलदाऊ की सवारी अत्याधुनिक लाइटों की रोशनी तक आ पहुंची है। यहाँ यहाँ पहली बार 60 के दशक में विद्युत सजावट शुरू हुई थी। 70-80 के दशक में चांदी के हौदे में बैठाकर भगवान की सवारी निकालने का दौर शुरू हुआ। अब मेले में कृष्ण-बलदाऊ की सवारी कंधे के बजाय हाथी से निकलती है। जबकि मेले में श्रीकृष्णलीला पर आधारित दर्जनों चौकियां भी निकलती है।

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