• Aapki Saheli
  • Astro Sathi
  • Business Khaskhabar
  • ifairer
  • iautoindia
1 of 1

होली : रंगों से आगे, सोच का इम्तिहान

Holi: Beyond Colors, a Test of Thinking - Udaipur News in Hindi

—लेखक : भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर क्या इस होली हम सिर्फ़ रंग ही उड़ाएंगे या अपने भीतर जमी डर, भ्रष्टाचार, बुरी नियत और अज्ञान की परतों को भी जलाएंगे? उदयपुर। होली हर साल आती है।गलियाँ गुलाल से भर जाती हैं। चेहरे मुस्कानों से रंग जाते हैं और कुछ घंटों के लिए लगता है कि जीवन सचमुच हल्का हो गया है। लेकिन यह हल्कापन अगर त्वचा तक ही सीमित रह जाए तो होली एक रस्म बनकर रह जाती है। असली होली तब है जब रंग मन तक पहुँचें और सवाल अंतरात्मा से टकराएँ। होलिका दहन केवल लकड़ियों और अग्नि का पर्व नहीं है। यह एक प्रतीक है बुराई, दुःख, अनैतिकता और अपराध के अंत का। लेकिन आज सवाल यह नहीं कि अग्नि जली या नहीं, सवाल यह है कि उस अग्नि में क्या जला?
आज की बुराई न शोर मचाती है न खुले तौर पर चुनौती देती है। वह व्यवस्था के भीतर घुल-मिल जाती है। जैसे चोर रोज़ चोरी के नए तरीके खोज लेता है। वैसे ही अनैतिकता भी हर दिन नया नाम और नया औचित्य ढूँढ लेती है।
पहले चोरी ताले तोड़कर होती थी। आज सिस्टम के भीतर से होती है।पहले अफ़वाहें चौपाल में फैलती थीं। आज वे स्क्रीन से समाज तक पहुँचती हैं।
ऐसे में होली हमसे सीधे सवाल करती है- क्या हमने अपने भीतर के डर को जलाया? क्या भ्रष्टाचार को केवल शब्दों में कोसा या अपने व्यवहार से भी हटाया?
क्या बुरी नियत और अज्ञान को सचमुच अग्नि को समर्पित किया?
इस दौर में अपराध केवल कानून की धाराओं में नहीं बसता। वह चुप्पी में पनपता है। अन्याय देखकर चुप रह जाना, झूठ जानते हुए भी आगे बढ़ जाना और गलत को “सब ऐसा ही करते हैं”कहकर सामान्य बना देना। ये सब ऐसे अपराध हैं जिन पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता। लेकिन समाज की आत्मा धीरे-धीरे खोखली हो जाती है।
होली की अग्नि इसी चुप्पी को जलाने का प्रतीक है। वह पूछती है- क्या सच इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि वह असुविधाजनक था? क्या अज्ञान को स्वीकार करने के बजाय उसे ढाल बना लिया गया? आज समाज में रंगों की कोई कमी नहीं, कमी है तो संवेदनाओं की, भीड़ बढ़ रही है। लेकिन रिश्ते सिकुड़ रहे हैं। हर हाथ में मोबाइल है पर सामने खड़े मनुष्य को देखने का धैर्य नहीं। किसी का दुःख अब खबर है और खबर अब स्क्रॉल। ऐसे समय में होली याद दिलाती है कि रंग चेहरे पर नहीं, दृष्टि में होने चाहिए। करुणा, संवाद और जिम्मेदारी यही असली गुलाल हैं। अगर मन में मैल है तो गुलाल भी दाग बन जाता है।
आज की सबसे खतरनाक सोच यह है- “काम हो जाना चाहिए तरीका कोई भी हो।” यही विचार भ्रष्टाचार और बुरी नियत को मजबूती देता है। होली इस मानसिकता के विरुद्ध खड़ी होती है और कहती है- साधन अपवित्र हैं तो साध्य भी कलंकित होगा।
जैसे गंदे हाथों से लगाया गया रंग कभी सुंदर नहीं लगता।
इस बार ज़रूरत केवल रंग खेलने की नहीं सोच और कर्म की होली खेलने की है। डर को जलाने की, अहंकार को राख करने की और अज्ञान को ज्ञान से चुनौती देने की है।
होली का असली साहस दूसरों को रंगने में नहीं, खुद को बदलने में है। अपने भीतर बैठे उस छोटे-से होलिका को पहचानने में है। जो लालच, डर और बुरी नियत के ईंधन से जीवित रहती है। जब तक वह भीतर नहीं जलेगी तब तक बाहर की होलिका केवल लकड़ियों की आग ही रहेगी। होली तभी सार्थक है जब वह हमें हँसाने के साथ पूछे- क्या हमने सिर्फ़ होलिका जलाई या अपने भीतर का अंधकार भी? अगर इस होली पर हम थोड़ा कम डरपोक, थोड़ा कम सुविधावादी और थोड़ा ज़्यादा जिम्मेदार नागरिक बन सकें तो समझिए होली ने अपना अर्थ पा लिया।

ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे

यह भी पढ़े

Web Title-Holi: Beyond Colors, a Test of Thinking
खास खबर Hindi News के अपडेट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो करे!
(News in Hindi खास खबर पर)
Tags: holi special article, bhagwan prasad gaur udaipur, social awareness, ethics in society, holika dahan meaning, corruption and morality, philosophy of colors 2026, hindi news, news in hindi, breaking news in hindi, real time news, udaipur news, udaipur news in hindi, real time udaipur city news, real time news, udaipur news khas khabar, udaipur news in hindi
Khaskhabar.com Facebook Page:
स्थानीय ख़बरें

राजस्थान से

प्रमुख खबरे

आपका राज्य

Traffic

जीवन मंत्र

Daily Horoscope

वेबसाइट पर प्रकाशित सामग्री एवं सभी तरह के विवादों का न्याय क्षेत्र जयपुर ही रहेगा।
Copyright © 2026 Khaskhabar.com Group, All Rights Reserved