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राजस्थान विद्यापीठ के संस्थापक जनार्दनराय नागर की 29वीं पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि : प्रतापनगर परिसर और फतेहसागर पाल पर अर्पित किए श्रद्धासुमन

Heartfelt Tributes on the 29th Death Anniversary of Janardan Rai Nagar - Udaipur News in Hindi

तीन रुपये से शुरू हुआ संस्थान आज ₹70 करोड़ के बजट तक पहुंचा, कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर और कुलपति प्रो. मंजु मांडोत ने जनुभाई के शैक्षिक व युगांतकारी विचारों को किया याद उदयपुर। जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) के संस्थापक, मूर्धन्य साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी मनीषी जनार्दनराय नागर (जनुभाई) की 29वीं पुण्यतिथि रविवार को श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर विद्यापीठ के सभी संघटक महाविद्यालयों, प्रतापनगर परिसर, माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय तथा फतेहसागर पाल स्थित दर्शक दीर्घा में स्थापित उनकी आदमकद प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया गया। प्रतापनगर परिसर में आयोजित मुख्य समारोह में कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर, कुलपति प्रो. मंजु मांडोत, प्रो. हेमेंद्र चण्डालिया, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. पारस जैन, प्रो. हेमेंद्र चौधरी और अध्यक्ष डॉ. प्रकाश धाकड़ सहित संकाय सदस्यों व कार्यकर्ताओं ने पुष्पांजलि अर्पित की।
जनुभाई के जीवन मूल्यों को आत्मसात करने की जरूरत: कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जरकुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए संस्थापक जनार्दनराय नागर के संघर्ष और संस्थान की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला:
आजादी की अलख और स्थापना: उन्होंने बताया कि साधारण परिवार में जन्मे जनुभाई को तत्कालीन मेवाड़ महाराणा ने अध्ययन के लिए बनारस भेजा था। वहां वे स्वतंत्रता आंदोलनकारियों के संपर्क में आए और देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। आजादी से ठीक 10 वर्ष पूर्व, 1937 में विषम परिस्थितियों के बीच उन्होंने विद्यापीठ की नींव रखी।
₹3 से ₹70 करोड़ का सफर: उन्होंने कहा कि मात्र तीन रुपये के अल्प सहयोग से शुरू हुआ यह संस्थान आज ₹70 करोड़ के वार्षिक बजट और विशाल शैक्षणिक तंत्र तक पहुंच चुका है।
अंतिम छोर तक शिक्षा: गुर्जर ने कहा कि हर समाज और हर तबके तक अनिवार्य शिक्षा पहुंचाने की उनकी सोच थी। कार्यकर्ताओं को विद्यापीठ के संघर्षपूर्ण इतिहास को पढ़ना चाहिए और संस्था की मूल वैचारिक धारा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एकजुट होकर कार्य करना चाहिए।
जनुभाई केवल साहित्यकार नहीं, युगदृष्टा थे: कुलपति प्रो. मंजु मांडोतकुलपति प्रो. मंजु मांडोत ने कहा कि जनुभाई एक प्रखर साहित्यकार होने के साथ-साथ युगांतकारी समाज सुधारक थे:
युवावस्था में बड़ा संकल्प: उन्होंने मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा का उजियारा पहुंचाने के लिए राजस्थान विद्यापीठ की स्थापना की थी।
साहित्य और सामाजिक चेतना: उन्होंने रेखांकित किया कि जनुभाई के साहित्य और चिंतन में 'सर्वजन हिताय' और वैचारिक स्वतंत्रता का भाव सर्वोपरि था। साहित्य जनमानस की संवेदनाओं को प्रकट करता है और सामाजिक परिवर्तन का आधार बनता है, जिसे जनुभाई ने अपने साहित्य और शिक्षा दर्शन के माध्यम से समाज के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
श्रद्धांजलि सभा में प्रो. अवनिश नागर, प्रो. युवराज सिंह राठौड़, डॉ. अमीया गोस्वामी, डॉ. भवानपीपाल सिंह राठौड़, प्रो. बलिदान जैन, डॉ. दिलीप सिंह चौहान, डॉ. हीना खान, प्रो. रचना राठौड़, प्रो. अमी राठौड़, डॉ. भारत सिंह देवड़ा, प्रो. सुनीता मुर्डिया, डॉ. मनीष श्रीमाली, डॉ. एस.बी. नागर, डॉ. दिनेश श्रीमाली, प्रो. लालराम जाट, डॉ. धीरज प्रकाश, डॉ. सपना श्रीमाली, डॉ. भूरालाल श्रीमाली, किशन सिंह राव, आरिफ मोहम्मद, डॉ. आशीष नंदवाना, डॉ. धर्मेंद्र राजौरा, डॉ. चंद्रेश छतलानी, उमराव सिंह राणावत, डॉ. संजीव राजपुरोहित, डॉ. अपर्णा श्रीवास्तव, डॉ. कुल शेखर व्यास, डॉ. नजमुद्दीन, डॉ. उदयभान सिंह और डॉ. गुणबाला आमेटा सहित विभिन्न संकायों के डीन, निदेशक, प्राध्यापक, कार्यकर्ता और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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Web Title-Heartfelt Tributes on the 29th Death Anniversary of Janardan Rai Nagar
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