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जेएसजी-स्वास्तिक द्वारा "एक कदम जिनालय की ओर" के तहत भव्य तीर्थ यात्रा

Grand Pilgrimage under One Step towards Jinalaya by JSG-Swastik - Udaipur News in Hindi

उदयपुर। जैन सोशल ग्रुप स्वास्तिक के बहुचर्चित कार्यक्रम एक कदम जिनालय की ओर के ग्यारहवें चरण में उदयपुर शहर से बाहर द ट्रैवल हाउस बस द्वारा प्रसिद्ध देव नगरी सिरोही में स्थित विभिन्न प्राचीन तीर्थों की यात्रा कराई गई। स्वास्तिक ग्रुप के संस्थापक अध्यक्ष धीरज छाजेड़ ने बताया कि श्रीबामनवाड जी का मंदिर अत्यंत प्राचीन है। किंवदंती है कि भगवान महावीर स्वामी का विचरण क्षेत्र सिरोही देवनगरी भी रहा था। इसी सिरोही देवनगरी में श्रीबामनवाड तीर्थ में जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के कानों में किले ठोकने वाला उपसर्ग हुआ था। इस उपसर्ग के कारण महावीर स्वामी के जोर से कराहने के कारण वहां स्थित पहाड़ी में दरार पड़ गई थी, जिसका प्रमाण आज भी प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। इसी जगह पर महावीर स्वामी के पद चिन्ह भी मौजूद है। यह मंदिर लगभग 2600 साल पुराना है। इसका प्रमाण यहां पर मौजूद 750 वर्ष पूर्व 1292 ई. में लिखे गए शिलालेख में भी मिलता है। यहां पर स्वर्णाक्षरों से लिखा गया नवनिर्मित आगम जैन मंदिर भी है, जिसमें मंदिर की सभी दीवारों पर आगम सूत्र उकेरा गया है।
स्वास्तिक ग्रुप के मीडिया प्रभारी संजय धाकड़ ने बताया कि सिरोही में ही स्थित जीरावला पार्श्वनाथ तीर्थ में सभी सदस्यों ने अति प्राचीन चमत्कारी मूर्ति के दर्शन किए। उन्होंने बताया कि प्राचीन समय में एक ब्राह्मण लड़के की गाय हर दिन जीरावाला में एक गुफा के पास अपना दूध गिराती थी। ब्राह्मण लड़के से इस बारे में सुनने पर, जैन सेठ धन्ना शाह ने एक पार्श्वनाथ की मूर्ति का सपना देखा, जहां गाय दूध डालने जाती थी। खोज के बाद, मूर्ति उसी स्थान से मिली और मूर्ति को आचार्य देवगुप्त सूरी ने 894 ई. में स्थापित किया।
ग्रुप के सचिव गौरव सुराणा ने माउंट आबू पहाड़ी की तलहटी में निर्मित भेरूतारक जैन तीर्थ की प्राचीनता एवं भव्यता के बारे में सदस्यों को विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने बताया कि भेरूतारक तीर्थधाम प्राचीन अर्बुध, नंदगिरि की घाटी में स्थापित है। पूरी घाटी ऋषि मुनियों के आश्रमों की एक अच्छी बस्ती का प्रतिनिधित्व करती है। इस घाटी से पहाड़ी रास्ता माउंट आबू की नक्की झील तक जाता है। इस मार्ग का प्रयोग प्राचीन काल में राजाओं, ऋषि मुनियों के साथ अंग्रेज कर्नल जेम्स टॉड द्वारा भी किया जाता रहा था। यह मंदिर सफेद संगमरमर से बना है और पार्श्वनाथ के शहस्त्र फना (नाग के एक हजार फन) को समर्पित है।
यात्रा संयोजक पंकज जैन ने सम्पूर्ण यात्रा की जानकारी एवं जैन इतिहास की विशालता के बारे में सदस्यों को विस्तार से बताया। पावापुरी तीर्थ में प्रभु दर्शन के पश्चात गौशाला में वीरेंद्र कावड़िया, यशवंत तलेसरा, कुशल प्रकाश लोढ़ा, संजय कावड़िया, राजेश सिसोदिया, राजेंद्र हिंगड़, जितेंद्र कोठारी, विनीत पामेचा, नवीन सुराणा आदि के नेतृत्व में गायों को हरा चारा एवं रोटियों का आहार करवाया।
ग्रुप उपाध्यक्ष विमलचंद कटारिया ने नवनिर्मित विजयपताका तीर्थ में मां सरस्वती के उकेरे गए सम्पूर्ण सूत्रों, मंत्रों के बारे में सभी को जानकारी दी। कविता सुराणा, चंचल छाजेड़, भावना कावड़िया, अनिता धाकड़, शीला लोढ़ा, सरिता कटारिया, रश्मि कोठारी, सीमा कावडिया, माधवी हिंगड़, विजया सुराणा आदि ने विभिन्न तीर्थों में भजन, स्तवन द्वारा भक्तिरस की धारा बहा दी। पांचों तीर्थ दर्शन करने के बाद सदस्य इतने भाव विभोर हुए की उन सभी ने आने वाले समय में इन तीर्थों में कुछ दिन रुक कर सेवा पूजा करने का प्रण लिया।

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Web Title-Grand Pilgrimage under One Step towards Jinalaya by JSG-Swastik
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