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भारतीय संस्कृति में संतों का त्याग काफी महत्व, नियम और तपस्या ही जीवन का आधार

The renunciation of saints is of great importance in Indian culture; discipline and austerity are the foundation of life. - Tonk News in Hindi

टोंक। श्री दिगंबर जैन नसिया में अमीरगंज टोंक में वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर महाराज के ससंघ 33 पिच्छिका विराजमान है जो पूर्ण रूप से इन नियमों का पालन करते हैं। भारतीय संस्कृति में संतों का त्याग काफी महत्त्व रखता है। आधुनिक जीवन की चकाचौंध से दूर दिगंबर जैन संत आज भी उसी परंपरा का पालन करते हैं, जिसमें संयम, नियम और तपस्या ही जीवन का आधार है। वे कई दिन तक निर्जल और निराहार रहकर तपस्या करते हैं। आहारचर्या के नियम भी कठिन है। 24 घंटे में एक बार भोजन, खाने के बाद एक बार ही पानी पीना। जरा सी चूक पर उपवास, ऐसी तपस्या के बारे में गृहस्थ तो सोचकर भी घबरा जाता हैं। यह चर्या अत्यंत कठिन और अनुशासन से पूर्ण होती है। इसका उद्देश्य सिर्फ शरीर का पोषण नहीं, आत्मा की साधना में सहायता करना होता है। कैसे आहार चर्या करते हैं जैन संत
दिन में एक बार भोजन: आहार (भोजन) लेना दिगंबर मुनियों की दिनचर्या का अति लघु भाग होता है। वे दिन में केवल एक ही बार भोजन करते है।
नियम: भगवान के सामने जो संकल्प लिया, नहीं मिला तो उपवास, खाना बनाने की प्रकिया में भी शुद्धता के साथ कई परंपराओं का पालन दिगंबर संतों की ऐसी तपस्वी आहारचर्या, जिसमें नियम ही जीवन है। आहार चर्या पूर्व संतों को आहर के लिए पडग़ाहन के लिए कतारबद्ध आवक करवाने से पूर्व श्रावक-श्राविकाएं उसे बनाने में जुटते हैं। संतों का आहार भी नियमों के अनुरूप ही बनता है। इसमें जमीकद, कंद-मूल आदि का उपयोग नहीं होता। आहार बनने में उपयोग की जाने वाली सामग्री तीन दिन में ही करते हैं। आहार ग्रहण का समय सूर्योदय के बाद से लेकर सूर्यास्त से पूर्व होता है। सूर्यास्त के बाद वे कुछ भी नहीं खाते-पीते।
ऐसे बनता है संतों का भोजन
संतों के लिए भोजन सिगड़ी पर बनता है। बनाने से पहले रसोई की छत पर सूती कपड़ा बांधा जाता है। बनाने वाले आवक-श्राविका को शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखना पड़ता है। नहाकर स्वच्छ कपड़े पहनने के बाद हीभोजन तैयार किया जाता है। उदाहरण लिए मसालों और आटे भी आज के युग में हाथ से पीसा जाता है। इसके साथ ही भोजन बनाने के लिए कुएं का ताजा पानी भी उबलाकर प्रयोग में लिया जाता है।
मुनियों का पडग़ाहन कैसे
श्रावकों से आहार के लिए निकलने से पहले मुनि भगवान के सामने प्रण लेते हैं। इसमें कलश, श्रीफल, अनार, अष्ट दव्य या श्रावक के खाली हाथ मिलने पर भोजन का संकल्प लेते हैं। मुनि वायां हाथ वाएं कंधे पर रखकर निकलते हैं। आवक हाथों में सामग्री लेकर खड़े रहते हैं। ‘अत्र, अत्र, तिष्ठ, तिष्ठ’ से उन्हें आमंत्रित करते हैं। इसका अर्थ है ‘यहाँ, यहां, ठहरो, ठहरो। प्रण के अनुसार वस्तु मिलने पर रुक जाते हैं। आवक आविकाएं उन्हें घर ले जाते हैं। कठोर अंतराय नियम: संत आहार चर्या में 32 तरह के अंतराय का पालन करते हैं। इनमें भोजन के समय विहार करते समय मृत जीव दिखना, भोजन में बाल जाना आदि।
श्रावक के घर भोजन विधि
संत को भोजन देने से पहले श्रावक अपने शुद्ध संकल्प की घोषणा करते हैं। संत को जमीन से 3 इंच ऊपर लकड़ी के पटिये पर खड़ा किया जाता है। भोजन अंजुलि में ही दिया जाता है, बर्तन का उपयोग नहीं होता। दिन भोजन त्याग कर देते हैं। कुछ संत आहर देने वाले श्रावकों से प्रण भी करवाते हैं। इसमें रात्रि भोजन, कंद मूल, जमीकंद, बाहर के भोजन-पानी का त्याग और ब्रह्मचर्य जैसे व्रत शामिल है।

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Web Title-The renunciation of saints is of great importance in Indian culture; discipline and austerity are the foundation of life.
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