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हाथ-पैरों में नहीं हैं पूरी उंगलियां, फिर भी हौसले से तकदीर रच रही है रचना

कोटा। प्रतिभा किसी के रोके नहीं रुकती, हालात विपरित हों तो भी हिम्मत और हौसले से हर मंजिल पाई जा सकती है। समय-समय पर ऐसे उदाहरण सामने आते भी रहे हैं। ऐसी ही प्रतिभा है रचना चौधरी। जो हौसले से खुद अपनी तकदीर रच रही है। जहां एक तरफ इंजीनियरिंग में छात्राओं का रुझान कम है वहीं दूसरी ओर हाथ-पैरौ से अल्पविकसित रचना ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। रचना के हाथ व पैरों में अंगुलियां पूरी नहीं हैं। जन्म के साथ ही इस विकार के साथ जी रही रचना दिव्यांग तो है, लेकिन हौसला सामान्य विद्यार्थियों से ज्यादा है। यही कारण है कि शारीरिक अपूर्णता, पारिवारिक परेशानियां होने के बावजूद रचना पढ़ रही है और आगे बढ़ रही है। कोटा में एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट से जेईई-मेन की तैयारी की। हाल ही जेईई-मेन के परिणामों में रचना ने जेईई-एडवांस के लिए क्वालीफाई किया। रचना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को आदर्श मानती है। आर्थिक स्थिति से संघर्ष और कमजोर स्वास्थ्य से हार न मानते हुए रचना इंजीनियरिंग करना चाहती है। इन दिनों एडवांस की तैयारी कर रही है।

बीमारी ने जकड़ा
संघर्ष रचना का पीछा नहीं छोड़ रहा। सालभर कोटा रहकर तैयारी करने वाली रचना को बीमारी ने भी घेरा। फरवरी के मध्य में रचना गंभीर बीमार हो गई। लगातार खांसी के चलते हालत गंभीर हुई तो मां लेने आई। वह जैसे-तैसे दिल्ली पहुंची और इलाज करवाया तो पता चला कि बाएं फेफड़े में पानी भर गया। डॉक्टर्स ने बताया कि टायफाइड बिगड़ गया है। अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। परीक्षा तक यही हाल रहा। परीक्षा से पहले भी डॉक्टर से निवेदन किया और डॉक्टर ने स्पेशल ट्रीटमेंट देते हुए परीक्षा में बैठने की स्थिति में ला दिया। इसके बाद फिर बीमार हुई और अभी भी इलाज जारी है। दिल्ली के सरकारी अस्पताल से कुछ दिनों पहले ही छुट्टी मिली है।

कोटा में मिली हर मदद
नोएडा में पढ़ाई के दौरान साथी विद्यार्थियों से कोटा के बारे में सुना। 10वीं कक्षा के बाद ही कोटा आने के लिए मां से कहा, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण मां ने कोटा भेजना मुनासिब नहीं समझा। 12वीं के बाद रचना ने फिर कोटा आने की बात कही तो मां तैयार हो गई। कोटा में एलन को पढ़ाई के लिए चुना। यहां निदेशक नवीन माहेश्वरी से मिले, उन्होंने शुल्क आधा कर दिया। इसके बाद हॉस्टल में जाकर पीड़ा बताई तो वहां भी आधी राशि में ही सभी सुविधाएं मिल गईं।

छोड़ दिया गांव जाना




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