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ध्वजारोहण के साथ दो दिवसीय मंडलनाथ मेला शुरू...

Two-Day Mandalnath Fair Begins with Flag Hoisting Ceremony... - Jodhpur News in Hindi

जोधपुर। शहर से 22 किलोमीटर दूर दईजर-ओसियां मार्ग पालडी गांव के पास भोगीशैल पहाड़ियों मे स्थित ऐतिहासिक अतिप्राचीन मंडलनाथ महादेव का दो दिवसीय मेला ध्वजारोहण के साथ आज शुरू हुआ। मंडलनाथ महादेव मंदिर के ट्रस्ट सचिव प्रेमकुमार जोशी और कोषाध्यक्ष गुरुदत्त पुरोहित ने बताया कि दो दिवसीय मंडलनाथ मेले के पहले दिन सवेरे जेडीए के पूर्व चैयरमैन महेन्द्र सिंह राठौड़ ने मंत्रोच्चार के बीच मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण कर विधिवत रूप से दो दिवसीय मेले का शुभारंभ किया। इसके पश्चात विद्वान रूद्रीपाठीयो द्वारा मंडलनाथ महादेव का पंचवक्रीय पूजन के साथ दूध, दही, शहद, इत्र इत्यादि से महाभिषेक किया गया। उन्होंने बताया कि रात्रि को मुख्य अतिथि न्यायाधिपति सजिंत पुरोहित, विधायक देवेंद्र जोशी, एडिशनल सालिसिटर जनरल भरत व्यास, उद्धमी राधेश्याम रंगा, दिनेश पुरोहित, मनीष व्यास के आतिथ्य में विशाल भजन संध्या का आयोजन किया जाएगा जिसमें महादेव, दीपक जोशी सहित नामचीन भजन गायक अपनी सुमधुर वाणी से श्रद्धालुओं को झूमने पर मजबूर कर देंगे।
मंडलनाथ महादेव मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष मंडल पुरोहित,ट्रस्टी एस. पी. थानवी और प्रदीप कुमार जोशी ने बताया कि मेले मे श्रद्धालुओं के लिए रात्री मे विभिन्न स्टालों पर कम लागत पर विभिन्न प्रकार के व्यंजनो की व्यवस्था की गई है। दूसरे दिन प्रातः महाआरती के बाद हजारों श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी का आयोजन किया जाएगा। गोविंद दत पुरोहित ने बताया कि मेले में आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए जोधपुर के विभिन्न क्षेत्रों से बसो का संचालन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि मेले मे विपिन पुरोहित, उदय वल्लभ, ललित, किशोर, कुणाल, पप्पू सहित अन्य कार्यकर्ता जोरशोर से मेले को भव्य रूप देने मे लगे है।
जहाँ भगवान श्री राम ने स्वयं किया था रूद्राभिषेक...
कहा जाता है कि माण्डव्य ऋषि इन पहाड़ियों मे तपस्या किया करते थे। एक दिन उन्हें भगवान महादेव का स्वयंभू लिंग दिखाई पड़ा जिसकी उन्होंने पूजा-अर्चना कर दी। यही बाद मे मंडलनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
"नैणसी री ख्यात" नामक पुस्तक के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, जानकी और लक्ष्मण लंका विजय के उपरांत अयोध्या लौटते समय अपनी वानर सेना सहित इस पहाड़ी पर रूके थे। यहां बहने वाली नदी के किनारे भगवान राम और उनकी वानर सेना ने रात्रि विश्राम किया तथा यहां स्थित शिव के स्वयंभू शिवलिंग की पूजा की। वानर सेना बहुत विशाल थी भगवान राम जब रूद्राभिषेक कर रहे थे तो सभी को दर्शन लाभ प्राप्त नही हो रहा था इस कारण महादेव की अनुकम्पा से पहाड़ियों के छोटे - बड़े सारे पत्थर शिवलिंग बन गए और सभी ने आनन्दपूर्वक भगवान के दर्शन किए। वही स्कंदपुराण के अनुसार प्राचीन मरूदेश मे वच्छम गोत्रीय ज्ञानी और यशस्वी मण्ड शर्मा नामक ब्राह्मण रहता था जो शिव का परमभक्त था उसने निश्चय किया कि कैलाश से शिवलिंग लाकर भौगीशैल पर्वत पर स्थापित करूंगा। उसने इसी पर्वत पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
शिवजी प्रकट हुए तो मण्ड शर्मा ने कहा कि कैलाश पर्वत पर ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित आपका लिंग यहां स्थापित किजिए ताकि में उसकी पूजा कर सकूं। शिवजी ने कहा कि मेरा वह शिवलिंग अचल रहता है अतः उसे यहां लाना तो संभव तो नहीं है किंतु यदि तू इस पर्वत पर स्वर्ण लिंग स्थापित कर चैत्र की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तथा सोमवार को मेरी पूजा करेगा तो कैलाश पर स्थापित मेरे लिंग की पूजा का फल प्राप्त होगा। मण्ड शर्मा ने उसी पर्वत पर एक भव्य महल बनवाया तथा स्वर्ण लिंग की स्थापना की।

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