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जोधपुर : गलत पैर का ऑपरेशन या व्यवस्था का 'बलि का बकरा' अभियान? जांच कमेटी की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

Jodhpur: Surgery on the Wrong Leg—Or the System Scapegoat Hunt - Jodhpur News in Hindi

जोधपुर। चिकित्सा क्षेत्र में लापरवाही की खबरें अक्सर आती हैं, लेकिन हाल ही में सामने आया 'गलत पैर के ऑपरेशन' का मामला सिर्फ एक चिकित्सीय चूक नहीं, बल्कि हमारे पूरे हेल्थ सिस्टम की संवेदनहीनता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का लाइव एक्स-रे है। इस पूरे मामले में न्याय के नाम पर जो प्रशासनिक लीपापोती देखने को मिली है, उसने न्याय व्यवस्था और जांच कमेटियों की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

जो ऑपरेशन टीम में था ही नहीं, गाज उसी पर गिरी
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और हैरान करने वाला पहलू यह है कि कार्रवाई उस डॉक्टर पर की गई है, जो ऑपरेशन करने वाली टीम का हिस्सा था ही नहीं। जांच कमेटी की कार्यशैली को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने मेडिकल रिपोर्ट खंगालने के बजाय "बलि का बकरा खोज अभियान" चलाया हो।
क्या सिर्फ पद होना ही गुनाह है? यदि केवल "यूनिट हेड" होने के नाते किसी डॉक्टर को एपीओ (APO) किया जा सकता है, तो फिर जिम्मेदारी की यह चेन ऊपर तक क्यों नहीं जाती?
बड़े पदों पर बैठे लोग क्यों मौन? अगर यूनिट हेड जिम्मेदार है, तो अस्पताल अधीक्षक, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इस जवाबदेही से बाहर कैसे हो सकते हैं? क्या नियम-कायदे सिर्फ निचले और मध्यम स्तर के कर्मचारियों को फंसाने के लिए बने हैं?
असली गुनहगार पर सिस्टम की अदृश्य ढाल
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस डॉक्टर या स्टाफ ने वास्तव में गलत पैर पर चीरा लगाया, जिसने सीधे तौर पर लापरवाही की, वह आज भी व्यवस्था की अदृश्य ढाल के पीछे सुरक्षित क्यों छिपा हुआ है?
बड़ा सवाल: क्या इस पूरी जांच का उद्देश्य सच को सामने लाना और मरीज को न्याय दिलाना था, या फिर सिर्फ सोशल मीडिया और जनता के गुस्से को शांत करने के लिए एक दिखावे की कार्रवाई करना था? फाइलों में बंद यह प्रबंधन साफ इशारा करता है कि असली दोषियों को बचाकर सिर्फ एक प्रेस नोट जारी करने तक ही न्याय को सीमित कर दिया गया है।
एक दूसरा पहलू : दोनों पैर फ्रैक्चर थे, तो फिर यह बवाल किसके इशारे पर?
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बेहद रहस्यमयी एंगल सामने आ रहा है, जो मामले को और उलझाता है। सूत्रों और मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि मरीज के दोनों ही पैरों में फ्रैक्चर था, तो फिर इस मामले को लेकर इतना बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक बवाल क्यों खड़ा किया गया?
कंधा मीडिया का, बंदूक किसी और की: सवाल यह उठ रहा है कि आखिर वह कौन सी ताकत या अंदरूनी लॉबी है, जिसने मीडिया के कंधे पर बंदूक रखकर यह सुनियोजित फायर किया है?
षड्यंत्र का शिकार: इस आपसी खींचतान और आंतरिक राजनीति की फायरिंग का शिकार वह निर्दोष डॉक्टर हो गया, जिसका इस विवादित ऑपरेशन से सीधे तौर पर कोई लेना-देना ही नहीं था।
मरीज का शरीर कोई प्रयोगशाला नहीं
स्वास्थ्य विभाग और सरकार को यह समझना होगा कि मरीज का शरीर कोई प्रयोगशाला नहीं है जहाँ गलतियों को फाइलों के नीचे दबा दिया जाए। जनता अब इतनी नासमझ नहीं है कि "किसी को भी सस्पेंड या एपीओ कर दो" जैसी खानापूर्ति को सच्चा न्याय मान ले। यदि चिकित्सा तंत्र को अपनी साख बचानी है, तो दिखावे की कार्रवाई बंद कर असली दोषियों और इस साजिश के पीछे छिपे चेहरों को बेनकाब करना होगा।

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Web Title-Jodhpur: Surgery on the Wrong Leg—Or the System Scapegoat Hunt
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