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साप्ताहिक कॉलमः दीवारों के कान

Weekly Column - Ears to the Walls - Jaipur News in Hindi

सावधान ! कार्यकर्ता सब देख रहा हैः
विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ दो महीने बचे हैं। राजनीतिक दलों ने बिसात बिछा दी है। नेता और हाईकमान अपने-अपने तरीके से रणनीति बनाने में जुटे हैं। जिताऊ और टिकाऊ उम्मीदवारों की तलाश शुरू हो गई। वहीं दावेदार भी टिकट पाने का जुगाड़ खोजने में जुट गए हैं। फीडबैक लेने के नाम पर कार्यकर्ताओं को केवल ज्ञान पेला जा रहा है और उपदेश दिए जा रहे हैं। लेकिन, कार्यकर्ता भी पार्टी हाईकमान, प्रदेश नेतृत्व औऱ उम्मीदवारों की हर चाल और हर मूवमेंट पर नजर बनाए हुए है। वह भी पल-पल अपनी रणनीति बदल रहा है। एक छोटे नेताजी ने बातों-बातों में कह ही दिया कि अब विचारधारा का कोई मतलब नहीं रह गया है। सारे काम गांधी जी करते हैं। सरकारी सिस्टम में बिना गांधी जी की अप्रुवल के कोई काम नहीं होता। इसी तरह चुनाव में भी बिना गांधी जी के कोई काम नहीं होगा। जो गांधी जी की उपेक्षा करेगा, उसे यह चुनाव बहुत महंगा पड़ेगा।

दिल के अरमां बस प्रचार में बह गएः

कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी संगठन और चुनाव में युवाओं को ज्यादा महत्व दिए जाने का दावा कर रहे हैं। वहीं राजस्थान की गहलोत सरकार ने इस साल के लिए छात्र संघ चुनावों पर रोक लगाकर युवाओं के सपनों को चकनाचूर कर दिया है। राजनीति की पहली सीढ़ी माने जाने वाले इन छात्र संघ चुनावों के जरिए राजस्थान में बहुत सारे युवा नेता बनने का सपना संजोए हुए थे। इसके लिए बहुत सारे छात्र नेताओं ने पोस्टर-बैनर छपवाकर गली-मौहल्लों औऱ गांव-गांव प्रचार भी शुरू कर दिया था। टीम बनाने से लेकर संसाधन जुटाने में काफी पैसा भी खर्च कर दिया। लेकिन, ऐनवक्त पर गहलोत सरकार के एक फैसले ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। इधर, बेरोजगारी, पेपरलीक और भर्तियां नहीं होने से राज्य के युवा गहलोत सरकार के खिलाफ पहले से ही आंदोलनरत हैं। उधर, वोटरलिस्टों में युवा मतदाताओं की संख्या भी बहुत ज्यादा है। खास बात ये कि फ्री मोबाइल का प्रलोभन भी युवाओं को नहीं लुभा पा रहा है। दावा किया जा रहा है कि इस बार युवा चुनाव में उम्मीदवारों के पसीने लाएगा।


घोषणा करते-करते थक गए मुखिया जी, अब देने लगे गारंटी
राजस्थान विधानसभा चुनाव लगभग सिर पर हैं। मुखिया जी समझ गए हैं कि अब घोषणाएं करने का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि अफसर चुनाव से 2 महीने पहले नेताओं की बात सुनना बंद कर देते हैं। इसलिए मुखिया जी अब गारंटी देने लगे हैं। क्योंकि चुनाव के ऐन मौके पर की गई घोषणाओं पर मतदाता भरोसा नहीं करते हैं। लालफीताशाही भी घोषणाओं को आसानी से लागू नहीं देती है। तभी तो डिजिटल मीडिया पॉलिसी और सोशल मीडिया पॉलिसी में किसी भी स्थानीय मीडिया को कहां फायदा मिला। गुजरात, दिल्ली समेत दूसरे राज्यों के मीडिय को लाखों रुपए के विज्ञापन जारी हो गए। खास बात यह कि गारंटी शब्द राजस्थान की राजनीति में नया आया है। गलियारों में सवाल घूम रहा है कि क्या अब कांग्रेस पार्टी घोषणा पत्र को गारंटी पत्र का नाम देगी। विपक्षी पार्टी ने तो संकल्प पत्र बनाने के लिए समिति का गठन कर दिया है। अब विधानसभा चुनाव में गारंटी और संकल्प के बीच सीधी लड़ाई होगी। आम जनता को गारंटी वाले नेता जी पसंद आयेंगे या संकल्प पत्र वाले, यह विधानसभा चुनाव के नतीजे बताएंगे । लेकिन मुखिया जी ने अब यह भी बोलना बंद कर दिया है आप मांगते-मांगते थक जाओगे, लेकिन मैं देता-देता नहीं थकूंका।


सरकारी बाबुओं के सामने मुखिया जी भी हुए फेलः
महंगाई राहत शिविर में आम जनता को राहत देने का दावा करने वाले मुखिया जी अपने ही सरकारी कर्मचारियों के आगे बेबस नजर आ रहे हैं। चुनाव आचार संहिता लगने में डेढ़ महीने से भी कम वक्त है। लेकिन इससे पहले बिजली, पानी, स्वास्थ्य विभाग के सरकारी कर्मचारियों समेत बेरोजगारों ने मुखिया जी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। लगातार धरना-प्रदर्शन चल रहे है। आंदोलनकारी सरकारी कर्मचारी कह रहे हैं मुखिया जी ने वादाखिलाफी की है, अभी तक एक भी वादे पर अमल नही हुआ है। मुखिया जी भी अपनी अफसरशाही की तरफ देख रहे हैं आखिर क्यों वादे पूरे नहीं हुए। चुनाव का वक्त है, दो सिर्फ शासन सचिवालय को छोड़कर मंत्रालयिक कर्मचारियों के अलग-अलग संगठन, नर्सिंग कर्मचारी, संविदाकर्मचारी और बेरोजगारों ने मुखिया जी के खिलाफ ताल ठोककर खड़े हुए है। अब मुखिया जी का चुनाव जीतने के लिए मुफ्त वाला फंडा जैसे 500 रुपए में सिलेंडर , अन्नपूर्णा किट, फ्री मोबाइल योजना कहीं फेल नहीं हो जाए।

जिताऊ नहीं कमाऊ प्रत्याशियों की तलाशः
विधानसभा चुनाव को लेकर भले ही राजनीतिक दल टिकट का एक ही फार्मूला कि जिताऊ प्रत्य़ाशी को ही टिकट देेने का बना रहे हों। लेकिन, वास्तविकता यह है कि प्रभारी से लेकर पर्यवेक्षक तक को जिताऊ से ज्यादा कमाऊ प्रत्याशियों की तलाश है। टिकट के दावेदारों ने भी ऐसे जुगाड़ खोजने शुरू कर दिए हैं जो उन्हें टिकट मिलने की गारंटी दे सकें। उसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। टिकटों के ब्रोकरों ने अपना काम शुरू कर दिया है। इसके लिए कुछ छुटभैये नेता तो अपना प्रभाव जमाने के लिए बड़े नेताओं के साथ खुद के फोटो भी सोशल मीडिया में वायरल करने लगे हैं। जबकि राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी में तो वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने नेताजी से मीटिंग कराने की सुपारी लेनी शुरू कर दी है। टिकट तो जब मिलेगा, तब मिलेगा। लेकिन नेताजी ने भी दावेदारों को परखने के लिए बेगार बताना जरूर शुरू कर दिया है।



-खास खबरी


(नोटः इस कॉलम में हर सप्ताह खबरों के अंदर की खबर, शासन-प्रशासन की खास चर्चाएं प्रकाशित की जाती हैं)

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