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बिजली क्षेत्र के विकास के लिए कॉस्ट लेंस को समझना जरूरी, ऊर्जा सचिव अजिताभ शर्मा ने साझा किए महत्वपूर्ण अनुभव

Understanding the cost lens is crucial for the development of the power sector. - Jaipur News in Hindi

जयपुर। राजस्थान सरकार के ऊर्जा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अजिताभ शर्मा ने बिजली क्षेत्र की तीन प्रमुख कड़ियों—उत्पादन (GENCO), प्रसारण (TRANSCO) और वितरण (DISCOM)—के बीच लागत (Cost) को देखने के अलग-अलग नजरिए पर अपने अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि कैसे एक ही प्रोजेक्ट को ये तीनों इकाइयां अपने-अपने संस्थागत हितों के आधार पर अलग-अलग तरह से देखती हैं। सोशल साइट लिंक्डइन पर अजिताभ शर्मा ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि अक्सर बैठकों में इन तीनों कंपनियों के प्रबंधकों के बीच एक ही समस्या को लेकर अलग-अलग तर्क होते हैं। उन्होंने इसे 'संस्थागत लेंस' (Institutional Lens) का नाम दिया है। डिस्कॉम (DISCOM) : उपभोक्ता का हित सर्वोपरि
बिजली वितरण कंपनियां सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ी होती हैं। इनका मुख्य सरोकार यह होता है कि उनके द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय का रिटेल टैरिफ (बिजली दर) पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
चिंता : डिस्कॉम हमेशा अनावश्यक लंबी अवधि की देनदारियों से बचना चाहती है ताकि उपभोक्ताओं पर बिजली के बिल का बोझ न बढ़े। इनके लिए लागत का मतलब है—'जनता के लिए वहनीयता'।
जेनको (GENCO) : निवेश की सुरक्षा
बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों का ध्यान इस बात पर होता है कि क्या बिजली बेचने से होने वाली आय उनके प्लांट बनाने और चलाने की लागत को कवर कर पाएगी।
चिंता: जेनको के लिए मुख्य सवाल यह है कि क्या अपेक्षित टैरिफ या बाजार मूल्य उनके निवेश पर उचित रिटर्न देगा? वे इस बात को लेकर सतर्क रहते हैं कि उनका भारी-भरकम निवेश कहीं 'फंसा हुआ निवेश' (Stranded Asset) न बन जाए।
ट्रांसको (TRANSCO): नियामक मंजूरी और बुनियादी ढांचा
प्रसारण कंपनी सीधे बिजली नहीं बेचती, बल्कि नेटवर्क पर भारी निवेश करती है। इनका पूरा ध्यान ग्रिड की मजबूती पर होता है।
चिंता : ट्रांसको यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके द्वारा बनाए गए एसेट्स की लागत को नियामक (Regulator) मान्यता दे और उसे ट्रांसमिशन टैरिफ के जरिए वसूलने की अनुमति मिले। उन्हें डर रहता है कि बिना नियामक बैकअप के किया गया निवेश कहीं घाटे का सौदा न बन जाए।
बेहतर नीति निर्माण के लिए समन्वय जरूरी
अतिरिक्त मुख्य सचिव ने निष्कर्ष निकाला कि ये तीनों इकाइयां एक ही क्षेत्र में काम करती हैं, लेकिन लागत को लेकर उनकी परिभाषाएं अलग हैं:
डिस्कॉम लागत के 'टैरिफ प्रभाव' को लेकर चिंतित है।
जेनको 'राजस्व के माध्यम से लागत वसूली' को लेकर फिक्रमंद है।
ट्रांसको 'नियामक अनुमोदन और लागत की सुरक्षा' पर ध्यान देता है।
अजिताभ शर्मा के अनुसार, ऊर्जा क्षेत्र में बेहतर नीतिगत निर्णय लेने और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए इन तीनों के दृष्टिकोणों के बीच के इस सूक्ष्म अंतर को पहचानना और उनमें समन्वय स्थापित करना अनिवार्य है। तभी राज्य में बिजली की कीमतों को स्थिर और आपूर्ति को विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

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