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बिजली चोरी का काला सच : सीएम भजनलाल शर्मा व पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के गृहनगर बिजली चोरी के गढ़

The dark truth about power theft: The hometowns of CM Bhajanlal Sharma and former CM Vasundhara Raje are hotbeds of power theft. - Jaipur News in Hindi

जयपुर। राजस्थान की राजनीति खुद को कितनी भी ईमानदार और पारदर्शी बताने की कोशिश करे, लेकिन सच्चाई यही है कि सीएम भजनलाल शर्मा और पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के गृहनगर में ही बिजली चोरी के सबसे ज्यादा मामले सामने आना पूरे सिस्टम पर करारा तमाचा है। सवाल साफ है—जब सत्ता के केंद्र और नेताओं के गढ़ में ही कानून और व्यवस्था तार-तार हो रही हो, तो बाकी प्रदेश से क्या उम्मीद की जाए? बीते दिनों राष्ट्रीय लोक अदालत में हज़ारों मामलों का निपटारा हुआ। और क्या पता चला? सबसे ज़्यादा लंबित मामले बिजली चोरी, कनेक्शन काटे जाने और बिजली बिल बकाया से जुड़े थे। यानी प्रदेश का आधा तंत्र सालों से आंख मूंदकर बैठा रहा और लोगों ने खुलेआम बिजली चोरी की। 25 करोड़ की वसूली – मगर ये जश्न क्यों?
जयपुर विद्युत वितरण निगम (JVVNL) अब यह दावा कर रहा है कि उन्होंने 18 हज़ार से ज्यादा मामलों का निपटारा कर करीब 25 करोड़ रुपए वसूल लिए। लेकिन सवाल उठता है—क्या 25 करोड़ की वसूली ही बड़ी उपलब्धि है, या ये इस बात का सबूत है कि प्रदेश में बिजली चोरी और बकाया वसूली का दलदल कितना गहरा है?
असल में ये आंकड़े किसी सफलता के नहीं, बल्कि सरकार की नाकामी और ढीली कार्यप्रणाली का सबूत हैं। जब बिजली चोरी का पैसा लोक अदालत के जरिए वसूला जाता है, तो यह साफ दिखता है कि प्रशासन सालों तक इस गड़बड़ी को बढ़ने देता है और फिर “समझौते” के नाम पर वसूली करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है।
भरतपुर ज़ोन : सबसे बड़ा गढ़ बिजली चोरों का
भरतपुर ज़ोन के आंकड़े तो और भी चौंकाने वाले हैं। यहां हजारों उपभोक्ताओं ने मौके पर ही करोड़ों रुपये जमा कराए। करौली सर्किल – 5.27 करोड़, धौलपुर – 3.19 करोड़, सवाई माधोपुर – 2.27 करोड़, डीग – 2.35 करोड़, भरतपुर – 1.25 करोड़।
यानी हजारों लोग सालों से बिजली चोरी या बकाया के मामले लटकाए बैठे थे। अब सवाल ये है—अगर इतने बड़े पैमाने पर बिजली चोरी चल रही थी तो डिस्कॉम और पुलिस आंख बंद करके बैठे थे क्या? या फिर नेताओं के संरक्षण में यह धंधा फल-फूल रहा था?
2.30 लाख नोटिस, लेकिन कार्रवाई के नाम पर दिखावा
जयपुर डिस्कॉम ने कुल 2 लाख 30 हज़ार प्रकरणों में नोटिस भेजे। लेकिन लोक अदालत में पहुंचे कितने? महज़ 20 हज़ार। बाकी का क्या हुआ? क्या उन पर कोई कार्रवाई होगी या फिर यह भी नेताओं के गृहनगर की तरह रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाएगा?
“ऑपरेशन ऊर्जा प्रहार”: क्या ये सिर्फ़ दिखावा है?
झालावाड़ जिले में डिस्कॉम और पुलिस की 48 टीमों ने आधी रात से लेकर 10 घंटे तक अभियान चलाया। 700 जगहों पर कार्रवाई हुई और 371 मामलों में 1.20 करोड़ रुपए की वसूली की गई। इसे नाम दिया गया—ऑपरेशन ऊर्जा प्रहार।
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि अगर वाकई इतनी “सख्ती” है, तो फिर चोरी कैसे पनपती है? क्या ये अभियान महज़ मीडिया की सुर्खियों और दिखावे के लिए किए जाते हैं? क्योंकि जिन इलाकों में कार्रवाई की गई, वहां चोरी सालों से चल रही थी। और अब अचानक पुलिस-डिस्कॉम मिलकर नाटक कर रहे हैं मानो उन्होंने “बड़ा ऑपरेशन” कर दिया।
नेताओं और प्रशासन की मिलीभगत का खेल
बिजली चोरी कोई “छोटा अपराध” नहीं है। ये सीधे-सीधे सरकारी राजस्व पर डाका है। और जब यह सब सीएम और पूर्व सीएम के गृहनगर में हो रहा है, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सत्ता और प्रशासन की मिलीभगत इसमें गहरी जड़ें जमा चुकी है।
झालावाड़, भरतपुर, जयपुर और कोटा—हर जगह यही कहानी है। लाखों नोटिस भेजे जाते हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में “समझौते” कर दिए जाते हैं। चोरी पकड़ में आती है, पैसे का कुछ हिस्सा वसूला जाता है और बाकी मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
नतीजा : जनता लूटती है, सरकार चुप रहती है
आज बिजली चोरी की वजह से ईमानदार उपभोक्ता महंगे बिल भरते हैं। गरीब किसान और आम आदमी बेहिसाब जुर्माने और बिजली कटौती का सामना करते हैं। लेकिन जो लोग राजनीतिक ताकत और अपराधी नेटवर्क के साथ संगठित रूप से चोरी करते हैं, वे लोक अदालत में दो पैसे देकर बरी हो जाते हैं।
यानी पूरा सिस्टम बिजली चोरी का संरक्षक बन चुका है। सरकार और नेता चाहे जितने दावे करें, लेकिन असलियत यही है कि राजस्थान का बिजली तंत्र भ्रष्टाचार और लापरवाही का अड्डा बन चुका है।
असली सवाल यह है—क्या राजस्थान सरकार और डिस्कॉम अब इस गंदगी को स्थायी तौर पर खत्म करने की हिम्मत दिखाएंगे, या फिर आने वाले दिनों में यह भी एक और “ऑपरेशन प्रहार” बनकर अखबारों तक ही सीमित रह जाएगा?

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