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राजस्थान का निकाय दंगल : ओम बिड़ला को छोड़ भाजपा के बड़े-बड़ों के गढ़ ध्वस्त, कांग्रेसी भी नहीं दिखा सके करिश्मा, निर्दलीयों की ऐतिहासिक सेंध

Rajasthan Nikay Chunav Analysis, Ved Pratap Vaidik Style Commentary, Bhajan Lal Sharma Bharatpur - Jaipur News in Hindi

गिरिराज अग्रवाल, जयपुर

राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों के जो नतीजे आए हैं, वे किसी एक दल की जय-पराजय से कहीं ज्यादा हमारे राजनीतिक अभिजात्य वर्ग के मुंह पर करारा तमाचा हैं। हमारे देश में एक सड़ी-गली रवायत बन चुकी है कि जो दल सूबे की गद्दी पर बैठा हो, स्थानीय निकायों में उसकी जीत मानों तयशुदा मान ली जाती है। मगर इस बार राजस्थान के प्रबुद्ध और खासकर नौजवान ‘जेन-जी’ मतदाताओं ने इस दंभी मुगालते की धज्जियां उड़ा दी हैं। जरा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अहंकार का आलम देखिए! महज एक नगर निकाय चुनाव को जीतने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी गई। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से लेकर प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ तक ने गलियों में धूल फांकी, सांसदों-विधायकों को थानेदारों की तरह वार्डों में तैनात किया गया और दिल्ली से राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष को रणनीति का पहिया घुमाने जयपुर आना पड़ा। जयपुर, जोधपुर, कोटा जैसे बड़े शहरों में दो-दो निगमों को जबरन एक बनाकर, मनमाना परिसीमन थोपकर बाजी पलटने की पूरी जुगत भिड़ाई गई।
मगर नतीजा क्या निकला? 'खोदा पहाड़ और निकली चुहिया!' पाली में खुद भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ का पसीना छूट गया, भरतपुर में खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का गृह क्षेत्र हाथ से खिसक गया, झालावाड़ में वसुंधरा राजे का तिलिस्म बेअसर रहा, बीकानेर में अर्जुनराम मेघवाल और अजमेर में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी अपनी ही चौखट नहीं बचा पाए। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी जोधपुर में साख बचाने को तरस गए। गनीमत रही कि कोटा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपनी साख बचा ली, वरना सत्ता पक्ष के पास मुंह छिपाने की जगह नहीं बचती। इसे नेतृत्व की विफलता कहें या जनता की खुली बगावत?
लेकिन ठहरिए, क्या इस पर कांग्रेस को बगलें बजानी चाहिए? कतई नहीं! कांग्रेस की हालत तो उस निठल्ले मुसाफिर जैसी है जिसे रास्ते में पड़ी कोई चीज बिना मेहनत के मिल जाए और वह उसे अपनी कमाई समझ बैठे। अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली केवल अपने-अपने सीमित प्रभाव वाले इलाकों की चारदीवारी में कैद रहे। सचिन पायलट का कहीं अता-पता नहीं था। गुटबाजी और सुस्ती का यह आलम था कि कांग्रेस दर्जनों वार्डों में उम्मीदवार तक नहीं खोज पाई।
यही वजह है कि जनता ने जब भाजपा के अहंकार को नकारा, तो उसने लाचारी में कांग्रेस की झोली भरने के बजाय 21 फीसदी से ज्यादा सीटों पर निर्दलीयों को सिर-आंखों पर बिठाया। यह जनादेश किसी दल का नहीं, बल्कि आम शहरी मतदाता की बेबसी और गुस्से की चीख है।
नेताओं को समझ लेना चाहिए कि जनता अब भाषणों, खोखले वादों और बड़े चेहरों की बंधक नहीं रही। शहर की टूटी सड़कें, बजबजाती नालियां और बारिश में गुल होती बत्तियां अब वोटर के सब्र का इम्तिहान ले रही हैं। यदि सत्ता और विपक्ष ने इस बगावत से सबक नहीं सीखा, तो आने वाले कल में बड़े-बड़े सियासी किले ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएंगे।

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Web Title-Rajasthan Nikay Chunav Analysis, Ved Pratap Vaidik Style Commentary, Bhajan Lal Sharma Bharatpur
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