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राजस्थान में मजाक सी बनती जा रही हैं जनसुनवाई, आखिर क्यों, यहां पढ़ें

Public hearings are becoming a joke in Rajasthan - Jaipur News in Hindi


-गिरिराज अग्रवाल-
जयपुर । केंद्र सरकार चाहती है कि राज्यपाल राजभवनों से निकलकर ग्रामीण इलाकों में जाएं और उनकी समस्याएं सुनकर जल्द समाधान कराएं। गोवा के राज्यपाल इसकी शुरुआत कर चुके हैं। पिछले 15 महीने के दौरान वे सभी 40 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं। राजस्थान में भी तत्कालीन राज्यपाल मदनलाल खुराना और अंशुमान सिंह ने इसी तरह की जन सुनवाइयां की थीं। उनसे काफी संख्या में लोगों को राहत भी मिली। लेकिन, ढेरों उम्मीदों भरी अर्जियां रद्दी के भाव बाजार में बिक गईं थीं। अगर राज्यपाल शासन-प्रशासन में विभिन्न स्तरों पर पेंडिंग जन समस्याओं-शिकायतों की मॉनीटरिंग शुरू कर दें तो उन्हें खुद जन सुनवाई करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। शिकायतों के निस्तारण में लापरवाही पाए जाने संबंधित अधिकारी-कर्मचारी पर सख्त एक्शन लिया जाना चाहिए। इससे वे वास्तव में जनता को रिलीफ दे पाएंगे।

शासन-प्रशासन के प्रति लोगों का गुस्सा कम करने के लिए जन सुनवाई जैसी कई तरह की व्यवस्थाएं की जाती रही हैं। इनमें जिला कलेक्टरों का गांवों में रात्रि चौपाल, ऑनलाइन ग्रिवांस रिड्रेसल सिस्टम, जन सुनवाई जैसे कई स्वरूप सामने आए। ये सब व्यवस्थाएं तब की गईं जबकि सरकार में इसके लिए पूरा एक जन अभाव अभियोग विभाग बना हुआ है। इसकी जिला स्तर तक समितियां बनी हुई हैं। जिला कलेक्टर इनके अध्यक्ष हैं । लोगों के काम तय समय पर बिना किसी रिश्वत के हों, इसके लिए राजस्थान सरकार ने तो सिटीजन चार्टर (नागरिक अधिकार पत्र) तक जारी किए । लेकिन, इन सबका जैसा लाभ लोगों को मिलना चाहिए था। वैसा नहीं मिला। अब कई विभागों अथवा कार्यालयों में जाकर देखिए नागरिक अधिकार पत्र (सिटीजन चार्टर) लगभग गायब हो चुके हैं।
राजस्थान में एक बार समस्याओं का अंतिम पड़ाव जैसा सिस्टम भी लागू किया जा चुका है। इसमें मुख्य सचिव से लेकर प्रिसिंपल सेक्रेटरी, सभी विभागाध्यक्ष और कलेक्टरों की टेबल पर लिखकर भी लगाया गया था। लेकिन, समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ी ही हैं। इसके पीछे एक ही कारण है प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही। हालांकि स्टाफ की कमी भी इसका बड़ा कारण हो सकती है। अब राज्य सरकार नागरिकों के सेवाओं के अधिकार की गारंटी देने के लिए राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी और जवाबदेही कानून बनाने जा रही है। इसका प्रारूप भी जारी कर दिया गया है। लेकिन, इसमें भी समय पर लोगों को सेवाएं मिल पाएंगी, इसकी गारंटी नहीं है। आशंका है कि इसका हाल भी कहीं सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान निषेध जैसा ना हो जाए।

मजाक सी बनती जा रही हैं जनसुनवाई

वर्तमान में भी उपखंड स्तर से लेकर जिला कलेक्टर, संभागीय आयुक्त, विधायक, प्रभारी मंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री तक सभी जन सुनवाई कर रहे हैं। लोग किराया-भाड़ा खर्च करके इस उम्मीद के साथ शिकायत लेकर आते हैं कि शायद इस बार उनकी समस्या का समाधान हो जाएगा। घंटों लाइन में खड़े होकर अथवा किसी हॉल में अपनी बारी का आने का इंतजार करते हैं। कागज लेकर रख लिया जाता है। बाद में उस शिकायत का क्या हुए उसे पता ही नहीं चलता। ब्यूरोक्रेसी का मैजिक तंत्र बिना वास्तविकता के बजाय कागजों में समस्या का समाधान दिखा देता है। इस व्यवस्था से राज्य के पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्री विश्वेंद्र सिंह एकबारगी तो इतने खफा हुए कि उन्होंने जन सुनवाई ही स्थगित कर दी थी। उनका आरोप था कि अफसर जन सुनवाई में केवल कागज इकट्ठे करते हैं। उन पर कार्रवाई नहीं होती। अब हालत यह हो गई है कि एसडीएम से लेकर कलेक्टर, संभागीय आयुक्त और मंत्रियों के पास एक ही तरह की समस्याएं बार-बार आ रही हैं। लेकिन, उनका समाधान नहीं हो पा रहा है।

पब्लिक पॉलिसी ही समस्याओं का समाधान
गांव-कस्बों में आम तौर पर जलभराव, टूटी हुई सड़़कें, पेयजल, बदहाल स्कूल-अस्पताल, खाद्य सुरक्षा, बीपीएल सूची में नाम जुड़वाने, रास्तों और सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण जैसी ही समस्याएं प्रमुखता से आती हैं। अगर, राज्य सरकार के स्तर पर इनका अध्ययन कराया जाए और समान प्रकृति वाली समस्याओं को आधार बनाकर पॉलिसी उनका समाधान किया जाए तो बड़े स्तर पर अनेक समस्याएं एक साथ निबट सकती हैं।

हेल्प डेस्क सिस्टम लागू हो
जन समस्याओं के समाधान की दिशा में दिल्ली सरकार की तर्ज पर हेल्प डेस्क सिस्टम लागू करना चाहिए। भले ही इसके लिए न्यूनतम शुल्क तय कर दिया जाए। लेकिन, लोगों को घर बैठे ड्राइविंग लाइसेंस, विवाह पंजीयन प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, वोटर कार्ड, जन्म- मृत्यु, हैसियत, मूल निवास, जाति, आय प्रमाण-पत्र जैसी कई सेवाएं मिलनी चाहिए। इससे जहां एक ओर कुछ युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं लोगों के घर बैठे काम होने से जन समस्याओं भी कमी आएगी। लोगों का शासन-प्रशासन के प्रति गुस्सा कम होगा। राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी और जवाबदेही कानून के संबंध में बनी कमेटी की रिपोर्ट में भी दिल्ली सरकार जैसा सिस्टम लागू करने का सुझाव दिया गया है।

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Web Title-Public hearings are becoming a joke in Rajasthan
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