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मोमासर उत्सव का हुआ संगीतमय आगाज, देखें तस्वीरें

जयपुर । तारपी, घीया से बनने वाला और पूंगी जैसा दिखने वाला एक राजस्थानी वाद्य यंत्र, जब इसकी अनोखी धुन कानों में गई तो दर्शक कह उठे ‘भई वाह, यो तो पहळी बार अठे ही देख्यो है‘। दर्षकों को कुछ ऐसे ही पारम्परिक लुप्त होते जा रहे वाद्य यंत्र पहली बार सुनने, देखने और समझने का अवसर मिला।

मौका था मोमासर उत्सव में कथोड़ी जनजाति संगीत कार्यक्रम का। जहां तारपी के साथ ही थालीसर, पावरी, टापरा, गोड़लिया की धुनों ने भी दर्षकों को आष्चर्यचकित कर दिया। उदयपुर ज़िले से 300 किमी दूर अम्बासा गांव से आये ये कलाकार अपने इन वाद्य यंत्रों को कई-पीढ़ियों से खुद अपने हाथों से तैयार करते आये हैं।

कथोड़ी जनजाति के लोग इन वाद्यों से नवरात्रि में अम्बे मां की कथा गाते हैं। थालीसर को किसी की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के समय बजाया जाता है। तारपी को बनाने में घीया, लकड़ी और मृत भैंस के सींग का इस्तेमाल किया जाता है। थालीसर में पीतल की थाली काम में ली जाती है और अन्य यंत्र बांस की लकड़ी के बने होते हैं। इनके द्वारा गाये जाने वाले गीत मूलतः मराठी भाषा में होते हैं जिसमें ये अम्बे मां को ‘भुरेसई‘ बोलते हैं। इस जनजाति का राजस्थान प्रवास बरसों पहले कत्था बनाने के उद्देष्य से हुआ था, इसलिए इस जनजाति का नाम कथोड़ी पड़ा।


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Web Title-Musical debut of momasar festival
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