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JLN मार्ग की अरबों की प्राइम लैंड पर बड़ा सेटलमेंट फ्रॉड : सरकार ने हाईकोर्ट में कहा JDA अफसरों की मिलीभगत से लोक अदालत में हुआ अवैध समझौता

Major Settlement Fraud Involving Prime Land Worth Billions on JLN Marg - Jaipur News in Hindi

WTP के सामने 23,600 वर्गगज प्राइम लैंड का मामला सरकार ने 2023 के लोक अदालत अवार्ड और सेटलमेंट डीड को बताया ‘धोखाधड़ी’, कहा बिना सरकारी मंजूरी निजी पक्षों को पहुंचाया गया फायदा। जयपुर। जयपुर के सबसे महंगे इलाकों में शामिल जेएलएन मार्ग स्थित वर्ल्ड ट्रेड पार्क (WTP) के सामने की 23,600 वर्गगज से अधिक प्राइम लैंड को लेकर बड़ा कानूनी विवाद सामने आया है। राजस्थान सरकार ने स्वयं राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया है कि JDA के तत्कालीन अधिकारियों ने निजी पक्षों से मिलीभगत कर राज्य सरकार को अंधेरे में रखकर राष्ट्रीय लोक अदालत से अवैध तरीके से समझौता कराया और उसके आधार पर अवार्ड पारित करा लिया। UDH विभाग की ओर से दायर याचिका में 25 अगस्त 2023 की सेटलमेंट डीड तथा 9 सितंबर 2023 के राष्ट्रीय लोक अदालत अवार्ड को अवैध, शून्य, जनहित के विरुद्ध और कथित धोखाधड़ी का परिणाम बताया गया है। सरकार ने हाईकोर्ट से दोनों को निरस्त करने की मांग की है।
क्या है पूरा मामला
विवाद 23,633 वर्गगज प्राइम लैंड का है, जिसे वर्ष 2003 में ग्रीन फायर हॉस्पिटल प्रा. लि. को रियायती दर पर मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल स्थापित करने के उद्देश्य से आवंटित किया गया था। बाद में शर्तों के उल्लंघन के आधार पर वर्ष 2015 में यह आवंटन रद्द कर दिया गया और जमा राशि का अधिकांश हिस्सा भी लौटा दिया गया।
लेकिन वर्ष 2023 में हुए एक सेटलमेंट के आधार पर राष्ट्रीय लोक अदालत ने ऐसा अवार्ड पारित किया, जिससे 17,433 वर्गगज भूमि फिर से ग्रीन फायर हॉस्पिटल को मिलने का रास्ता खुल गया। साथ ही 6,200 वर्गगज भूमि जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति और रतन प्रभा जैन को लौटाने का आदेश भी पारित हुआ।
सरकार का दावा है कि यह पूरा समझौता राज्य सरकार की जानकारी और मंजूरी के बिना किया गया।
सरकार के प्रमुख आरोप
सरकार का कहना है कि न तो कैबिनेट की मंजूरी ली गई, न UDH विभाग की अनुमति प्राप्त की गई और न ही राज्य सरकार का कोई अधिकृत प्रतिनिधि इस समझौते का पक्षकार था। याचिका के अनुसार JDA अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की और राज्य सरकार को पूरी तरह दरकिनार कर दिया।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि तत्कालीन JDA आयुक्त और जोन-4 के उपायुक्त को ऐसा समझौता करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने निजी पक्षों के साथ मिलकर सरकारी हितों को नुकसान पहुंचाने वाली कार्रवाई की।
लोक अदालत की प्रक्रिया पर भी सवाल
याचिका में राष्ट्रीय लोक अदालत द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर अवार्ड पारित करने का मुद्दा भी उठाया गया है।
सरकार का कहना है कि लोक अदालत ने यह सत्यापित ही नहीं किया कि सभी आवश्यक पक्षकार, विशेषकर राज्य सरकार, समझौते का हिस्सा हैं या नहीं। इसके बावजूद अवार्ड पारित कर दिया गया।
सूत्रों के अनुसार, उक्त राष्ट्रीय लोक अदालत के अवार्ड से संबंधित कॉज लिस्ट को लेकर भी संशय है।
रद्द हो चुका आवंटन फिर से प्रभावी करने का आरोप
याचिका के अनुसार वर्ष 2015 में समाप्त किए जा चुके आवंटन को लोक अदालत के अवार्ड के माध्यम से पुनः प्रभावी बना दिया गया।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि ग्रीन फायर हॉस्पिटल और अपोलो हॉस्पिटल्स के बीच हुआ मूल MOU केवल 18 माह के लिए था। उसके समाप्त होने के बाद रियायती दर पर आवंटित भूमि पर दावा बनाए रखने का कोई वैधानिक आधार शेष नहीं बचता था। सरकार का कहना है कि मूल परियोजना का आधार ही समाप्त हो चुका था।
सरकार को मामले की जानकारी कैसे मिली?
सरकार का दावा है कि पूरे मामले की जानकारी उसे तब हुई जब ग्रीन फायर हॉस्पिटल ने वर्ष 2026 में लोक अदालत के अवार्ड की पालना नहीं होने का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दायर की। नोटिस मिलने के बाद सरकार ने रिकॉर्ड की जांच कर राजस्थान हाईकोर्ट में नई रिट याचिका दाखिल की।
सरकार का आरोप है कि लोक अदालत के समक्ष लंबित मुकदमों की जानकारी छिपाई गई और अधूरे एवं भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किए गए। साथ ही JDA ट्रिब्यूनल में लंबित मामलों को जल्दबाजी में वापस लेकर आगे की न्यायिक जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। याचिका में पूरे घटनाक्रम को निजी पक्षों और कुछ अधिकारियों की कथित मिलीभगत का परिणाम बताया गया है।
अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने मामले से संबंधित आवंटन और सेटलमेंट के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। इस प्रकरण से जुड़ी अवमानना याचिका, दोनों जनहित याचिकाओं तथा अन्य संबद्ध मामलों की 20 जुलाई को संयुक्त सुनवाई निर्धारित है।

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