• Aapki Saheli
  • Astro Sathi
  • Business Khaskhabar
  • ifairer
  • iautoindia
1 of 1

जवाहर सर्किल पार्क या कमाई की मंडी? JDA की व्यावसायिक साजिश पर उठे गंभीर कानूनी सवाल; सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की हो रही है खुली अनदेखी

Jaipur JDA, Jawahar Circle Commercialization, Supreme Court Public Trust - Jaipur News in Hindi

जयपुर। जयपुर की पहचान, उसकी उस सांस लेने वाली हरी-भरकरी छाती यानी ‘जवाहर सर्किल’ को लेकर जिस तरह की व्यावसायिक गतिविधियों—हॉर्स राइडिंग, बैटरी कार, स्केटिंग और फोटोग्राफी परमिट के नाम पर लीज और परमिशन की पटकथा बुनी जा रही है, वह केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना के साथ एक खतरनाक खिलवाड़ है। सवाल यह है कि क्या जयपुर के इस प्रमुख हरित क्षेत्र को किसी कॉरपोरेट थीम पार्क या कमाई की मंडी में बदलने की पूरी तैयारी हो चुकी है?

आइए, जरा इस तथाकथित ‘विकास’ के कागजों और उसकी वैधानिक चौहद्दी को खंगालकर देखें। राजस्थान सार्वजनिक पार्क अधिनियम, 1956 का पन्ना पलटिए। इस कानून का जन्म ही इसलिए हुआ था कि पार्कों की स्थापना हो, उनका संरक्षण हो, उनका परिरक्षण हो। इस अधिनियम की धारा 3 के तहत यदि जवाहर सर्किल एक अधिसूचित सार्वजनिक पार्क है, तो इसकी धारा 4 चीख-चीखकर कहती है कि पार्क में किसी भी तरह के निर्माण, सड़क, बाड़ या दुकानों जैसी व्यावसायिक इकाइयों की अनुमति बिना किसी निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया और कड़ी सरकारी स्वीकृति के नहीं दी जा सकती। और धारा 5(c) तो सीधे तौर पर उन लोगों या व्यवस्थाओं को चेतावनी देती है जो पार्क की संपदा को नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन यहां तो नुकसान बाहर से नहीं, बल्कि भीतर बैठे सत्ता के संरक्षकों की नीतियों से पहुंच रहा है। अब जरा जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) के कंधों पर लदे उस भारी-भरकम वैधानिक बोझ को भी टटोल लेते हैं, जिसकी दुहाई देकर विकास के तमाम फव्वारे छोड़े जा रहे हैं। JDA अधिनियम, 1982 की धारा 16 साफ निर्देश देती है कि प्राधिकरण का मुख्य दायित्व इस क्षेत्र का समेकित और नियोजित विकास करना है। इस विकास में पर्यावरण, पारिस्थितिकी (ecology) और खुले स्थान (open spaces) की हिफाजत सर्वोपरि है। केवल यह कागजी अधिकार मिल जाना कि जमीन JDA के नाम पर दर्ज है, उसे इस बात की खुली छूट नहीं देता कि वह जब चाहे, जिस मास्टर प्लान के पन्ने को चाहे, उसे मुनाफे के तराजू पर तौल दे।
धारा 54 के तहत भी भूमि का उपयोग या निपटान राज्य सरकार द्वारा तय शर्तों और मास्टर प्लान के सख्त दायरे में बंधा होता है। मास्टर प्लान में पार्क या ओपन स्पेस के रूप में दर्ज जमीन को रातों-रात कमर्शियल हब या रेवेन्यू जनरेटिंग मशीन में तब्दील कर देना कौन सा नियोजित विकास है? यदि पार्क के किसी हिस्से के मूल चरित्र (character) या भू-उपयोग (land use) में बड़ा बदलाव लाना ही है, तो धारा 25 के तहत राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी और आम जनता से आपत्तियां व सुझाव मांगने की जो अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया है, क्या उसकी औपचारिकता भी पूरी की गई है? या फिर सब कुछ चुपचाप फाइलों के गलियारों में तय हो रहा है?
यहीं पर देश की सर्वोच्च अदालत की वह वैचारिक और विधिक गूंज सुनाई देती है, जिसे देश के हुक्मरानों और विकास प्राधिकरणों को सोने से पहले हर रोज पढ़ना चाहिए। लाल बहादुर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अकाट्य और ऐतिहासिक फैसला दिया था। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा था कि पार्कों, ग्रीन बेल्ट्स और खुले स्थानों को मनमाने ढंग से आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में बदलना वैधानिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग (abuse of statutory powers) है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया था कि ये स्थान केवल कंक्रीट के जंगल के बीच कुछ खाली छोड़ी गई जमीन के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि ये शहरवासियों के लिए शुद्ध हवा, मनोरंजन और स्वस्थ पर्यावरण का अनिवार्य जरिया हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘पब्लिक ट्रस्ट डॉट्राइन’ (Public Trust Doctrine) की याद दिलाते हुए साफ किया था कि सरकारें या विकास प्राधिकरण इन जमीनों के ‘मालिक’ नहीं, बल्कि केवल ‘ट्रस्टी’ हैं। जनता द्वारा जनता के लिए छोड़ी गई इस थाती को लीज पर देना या बेचने के रास्ते तलाशना उस ‘विधायी मंशा’ (legislative intent) की पीठ में छुरा घोपना है, जिसके तहत इन स्थानों को सुरक्षित किया गया था। अदालत ने तो यहां तक आदेश दिया था कि यदि कहीं ग्रीन बेल्ट को भी छेड़ा गया है, तो उसे वापस उसके मूल स्वरूप यानी पार्क के रूप में ही बहाल किया जाए।
आज हुक्मरानों से यह सवाल पूछना लाजिमी है कि क्या ‘पर्यटन को बढ़ावा देने’ या ‘बच्चों के मनोरंजन’ का मुखौटा पहनकर आप सार्वजनिक पार्कों के मूल चरित्र की हत्या करने का परमिट बांट रहे हैं? हॉर्स राइडिंग या स्केटिंग अपने आप में कोई गुनाह नहीं है, लेकिन गुनाह यह है कि उन खेलों के नाम पर पार्क के हरित क्षेत्र को निजी संचालकों के हवाले कर दिया जाए, आम नागरिकों के स्वतंत्र प्रवेश और विचरण पर पाबंदियां लग जाएं, और सुबह-शाम ठंडी हवा में सांस लेने आने वाले आम आदमी की जेब पर पहरा बैठ जाए।
यह मसला अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय का नहीं रह गया है, बल्कि यह JDA अधिनियम, राजस्थान सार्वजनिक पार्क अधिनियम, मास्टर प्लान, संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) और पब्लिक Trust Doctrine के सीधे-सीधे उल्लंघन का एक जीवंत दस्तावेज बन चुका है।
जयपुर के इस ‘ग्रीन लंग’ यानी जवाहर सर्किल को सांस लेने दीजिए, इसे तिजोरी भरने का अड्डा मत बनाइए। अदालतें चीख-चीख कर कह चुकी हैं कि सार्वजनिक पार्क जनता द्वारा खुद को दिया गया वह अनमोल उपहार है, जिसे सरकारें अपनी बपौती समझकर नहीं, बल्कि अमानत समझकर संभालती हैं। यदि आज इस प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगी, तो कल शहर का हर पार्क कंक्रीट के रेस्टोरेंट और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में बदल चुका होगा। वक्त आ गया है कि जनता पूछे—इस शहर के फेफड़ों को कुतरने का यह लाइसेंस किसने दिया है?

ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे

यह भी पढ़े

Web Title-Jaipur JDA, Jawahar Circle Commercialization, Supreme Court Public Trust
खास खबर Hindi News के अपडेट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो करे!
(News in Hindi खास खबर पर)
Tags: jaipur jda, jawahar circle commercialization, supreme court public trust doctrine, lal bahadur vs state of up, urban green spaces rajasthan, hindi news, news in hindi, breaking news in hindi, real time news, jaipur news, jaipur news in hindi, real time jaipur city news, real time news, jaipur news khas khabar, jaipur news in hindi
Khaskhabar.com Facebook Page:
स्थानीय ख़बरें

राजस्थान से

प्रमुख खबरे

आपका राज्य

Traffic

जीवन मंत्र

Daily Horoscope

वेबसाइट पर प्रकाशित सामग्री एवं सभी तरह के विवादों का न्याय क्षेत्र जयपुर ही रहेगा।
Copyright © 2026 Khaskhabar.com Group, All Rights Reserved