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भर्तियों के दावों की चमकती होर्डिंग्स और दफ्तरों में सिसकती 125 जिंदगियां

Glittering hoardings proclaiming recruitment vs. 125 lives languishing in offices - Jaipur News in Hindi

जयपुर। राजस्थान में इन दिनों विज्ञापनों और सरकारी तकरीरों का मौसम शबाब पर है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के मंचों से जब सुशासन, युवाओं के स्वर्णिम भविष्य और पारदर्शी भर्ती प्रक्रियाओं के दावे गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो सूबे के हर नौजवान के मुकद्दर का ताला खुल चुका है। सरकार का प्रचार तंत्र यह साबित करने में पूरी ताकत झोंक देता है कि अब न पेपर लीक का डर है, न तारीखों का अंतहीन फेर। मगर इन सरकारी दावों की चमचमाती होर्डिंग्स के ठीक पीछे का सच देखना हो, तो आपको उन 125 नौजवानों के चेहरे देखने होंगे, जो पिछले एक साल से 'सहायक कृषि अधिकारी' (AAO) बनने की आस में अपनी जवानी के सबसे कीमती दिन दफ्तरों के चक्कर काटते हुए गंवा रहे हैं।

दावों और हकीकत के बीच की यह खाई कितनी चौड़ी और अमानवीय है, इसका सटीक दस्तावेज है—सहायक कृषि अधिकारी भर्ती 2024। तारीखों के आईने में इस व्यवस्था की संवेदनहीनता को तौलिए। परीक्षा का आयोजन हुआ था 12 और 13 अक्टूबर 2025 को। कैलेंडर के पन्ने पलटते-पलटते अब पूरा एक साल बीतने को आ गया है। महज 125 पदों की एक अदद भर्ती, जिस पर न कोई कानूनी पेंच फंसा है, न ही अदालत की किसी चौखट से कोई स्थगनादेश (Stay) जारी हुआ है। यानी रास्ता पूरी तरह साफ और खुला था। लेकिन जब नीयत में तत्परता न हो, तो साफ सड़कें भी दलदल में तब्दील हो जाती हैं।
पहले राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) ने अपनी पुरानी रिवायत को निभाते हुए प्रोविजनल परिणाम जारी करने में महीनों की सुस्ती ओढ़ ली। जैसे-तैसे जब मामला आगे बढ़ा, तो फाइल कृषि विभाग की ठंडी अलमारियों में जाकर अटक गई। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए—विभाग ने नौजवानों को आदेश दिया कि वे महज 3 दिन के भीतर अपने तमाम दस्तावेज जमा करवाएं। बेरोजगार लड़के-लड़कियां दूर-दराज के गांवों से भागे-भागे पहुंचे, जेब का आखिरी पैसा खर्च कर फाइलें जमा कराईं। मगर जिस विभाग ने अभ्यर्थियों को 3 दिन की मोहलत दी थी, वह खुद पिछले 4 महीनों में उन 125 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच तक पूरी नहीं कर पाया है।
चार महीने में 125 फाइलों की जांच न हो पाना—यह प्रशासनिक अक्षमता है या युवाओं के धैर्य का क्रूर इम्तिहान?
गांधी जयंती और बड़े जलसों पर किसानों और गांवों की तकदीर बदलने के भाषण खूब दिए जाते हैं। कृषि मंत्री भी समय-समय पर अपने विभागों की पीठ थपथपाते नजर आते हैं। मगर सवाल यह है कि खेतों तक वैज्ञानिक तकनीक और सरकारी योजनाएं पहुंचाने वाले 'सहायक कृषि अधिकारी' जब सिस्टम की लालफीताशाही की भेंट चढ़ जाएंगे, तो खेती का कायाकल्प कौन करेगा? क्या 125 युवाओं का अंतिम परिणाम जारी करने के लिए भी किसी बड़े जनांदोलन, लाठीचार्ज या चुनावी मजबूरी का इंतजार किया जाएगा?
एक साल का यह अंतहीन इंतजार केवल उन 125 अभ्यर्थियों का नहीं है, यह उन 125 परिवारों की उम्मीदों का टूटना है, जिन्होंने अपने खेत गिरवी रखकर या पेट काटकर अपने बच्चों को इस मुकाम तक पहुंचाया था। वे आज भी हर सुबह आरपीएससी और कृषि विभाग की वेबसाइट पर 'फाइनल रिजल्ट' का लिंक तलाशते हैं और शाम को मायूसी के अंधेरे में डूब जाते हैं।
सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-नियंताओं को यह समझना होगा कि भाषणों से बेरोजगारी का दर्द कम नहीं होता। अगर मुख्यमंत्री वास्तव में 'संकल्प पत्र' और युवाओं के सम्मान की बात करते हैं, तो उन्हें कृषि विभाग और RPSC के अफसरों से सीधे जवाब तलब करना चाहिए। महज 125 पदों की फाइल को ठंडे बस्ते से निकालकर अगर यह सरकार अंतिम परिणाम जारी नहीं करवा सकती, तो फिर सुशासन के तमाम दावे महज कागजी जुमले बनकर रह जाते हैं।

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Web Title-Glittering hoardings proclaiming recruitment vs. 125 lives languishing in offices
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