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चुनावी शुचिता, आंतरिक असहमति और 'वोट चोरी' का नैरेटिव

Electoral integrity, internal dissent and the vote theft narrative - Jaipur News in Hindi

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आयोग की साख स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की धुरी रही है, लेकिन जब आयोग के भीतर से ही प्रक्रियागत फैसलों पर गंभीर सवाल उठने लगें, तो चुनावी पारदर्शिता पर बहस छिड़ना स्वाभाविक है। हाल ही में सामने आई एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने लगभग 10 महीनों के भीतर आयोग के फैसलों और कार्यप्रणाली को लेकर 14 बार औपचारिक लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। यह मामला सामने आते ही राजनीतिक हलकों में 'वोट चोरी' और 'संस्थागत हेरफेर' के तीखे आरोप लगने लगे। हालांकि, इन राजनीतिक बयानों के बीच प्रशासनिक वास्तविकताओं, तकनीकी खामियों और कानूनी प्रक्रियाओं का एक संतुलित व तथ्यात्मक विश्लेषण करना आवश्यक है ताकि यह समझा जा सके कि विवाद का वास्तविक धरातल क्या है।
इस पूरे प्रकरण की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि को देखें तो दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां मुख्यतः प्रक्रियात्मक उल्लंघनों, मतदाता सूची संशोधन (SIR) और तकनीकी प्रणालियों के केंद्रीकरण से जुड़ी थीं। मुख्य आपत्तियों में से एक वैधानिक 'फॉर्म 6' में किए गए एकतरफा बदलाव से संबंधित थी, जिसका उपयोग नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए होता है।
नियमों के अनुसार किसी भी वैधानिक फॉर्म में बदलाव 'पंजीकरण मतदाता नियम, 1960' के तहत उचित विधायी प्रक्रिया का पालन करके ही किया जा सकता है। दोनों आयुक्तों ने दर्ज किया कि आयोग की औपचारिक सहमति या कानूनी संशोधन के बिना फॉर्म में बदलाव किए गए, जिसके तहत पहली बार आवेदन करने वालों से पिछली मतदाता सूचियों में अपने या अपने पूर्वजों के नाम होने संबंधी घोषणा मांगी गई।
आयुक्तों का स्पष्ट तर्क था कि यह बदलाव प्रक्रियात्मक रूप से गलत है और पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के लिए अनावश्यक बाधा बन सकता है। इसके अलावा, तकनीकी ढांचे और मतदाता सूची के केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर 'ERONet' के संचालन को लेकर भी गंभीर मतभेद सामने आए। दोनों आयुक्तों ने इस बात पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई कि राज्यों के स्थानीय निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (EROs) के सॉफ्टवेयर अधिकारों को सीमित किया गया और आईटी सिस्टम में बड़े बदलाव पूर्ण आयोग की मंजूरी के बिना किए गए।
इस विषय पर प्रशासनिक असंतोष इतना गहरा था कि आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव तक औपचारिक पत्र भेजकर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। गोवा का उदाहरण भी सामने आया, जहां तकनीकी विकल्पों की कमी के कारण सभी सत्यापन पूरे होने के बावजूद 97 पात्र मतदाताओं के नाम सूची में दर्ज नहीं हो सके। इसी तरह पश्चिम बंगाल में सॉफ्टवेयर द्वारा चिन्हित विसंगतियों (Logical Discrepancies) के आधार पर बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और अपीलीय प्रक्रियाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए गए।
राजनीतिक स्तर पर विपक्ष खासकर कांग्रेस ने इन आपत्तियों को सीधे तौर पर 'वोट चोरी' और 'चुनावी हेरफेर' के एक सुनियोजित प्रयास के रूप में व्याख्यायित किया। विपक्षी दलों का तर्क है कि जब मतदाता सूचियों से वास्तविक नागरिकों के नाम हटाने की प्रक्रिया को अपारदर्शी बनाया जाता है और नए पंजीकरणों को जटिल किया जाता है, तो यह जनादेश को सीधे प्रभावित करने जैसा है।
पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने को राजनीतिक रूप से एकतरफा लाभ पहुंचाने की कोशिश बताया गया। किंतु प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से यदि इसका परीक्षण किया जाए, तो 'वोट चोरी' के राजनीतिक नैरेटिव और आयुक्तों की लिखित आपत्तियों के बीच एक स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपने किसी भी नोट में इसे किसी दल विशेष के लाभ के लिए की गई दुर्भावनापूर्ण 'वोट चोरी' करार नहीं दिया है, बल्कि उनका मुख्य विरोध निर्णय प्रक्रिया के अत्यधिक केंद्रीकरण और स्थापित नियमों की अनदेखी को लेकर था। बहु-सदस्यीय संस्थाओं में जब शक्तियां एक ही केंद्र में सिमटने लगती हैं और फाइलों को बिना औपचारिक परामर्श के आगे बढ़ाया जाता है, तो व्यवस्था में खामियां आना तय है।
आयुक्तों की चिंता इस बात को लेकर थी कि यदि सॉफ्टवेयर आधारित विसंगतियों के नाम पर बिना उचित मानवीय सत्यापन के नाम काटे जाएंगे या पंजीकरण रोके जाएंगे, तो मतदाता सूची की शुद्धता और आयोग की विश्वसनीयता दोनों को धक्का पहुंचेगा। इस पूरे विवाद को चुनाव आयोग की संवैधानिक संरचना के आलोक में भी देखना होगा।
संविधान के अनुच्छेद 324 और ऐतिहासिक टी.एन. शेषन मामले में उच्चतम न्यायालय के 1995 के फैसले के अनुसार, निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त 'समानों में प्रथम' (First among equals) हैं, अकेले निर्णयकर्ता नहीं। कानूनन आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति या फिर बहुमत से होने चाहिए। ऐसे में फाइलों को बिना साथी आयुक्तों के संज्ञान में लाए सीधे आगे बढ़ाना संस्थागत मर्यादाओं के प्रतिकूल है।
एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू यह भी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग जैसी जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता होती है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है। इस संरचनात्मक असंतुलन के बावजूद दोनों आयुक्तों द्वारा लगातार 14 बार लिखित विरोध दर्ज कराना यह स्पष्ट करता है कि उनके लिए प्रक्रियात्मक शुद्धता और संवैधानिक जवाबदेही किसी भी अन्य दबाव से अधिक महत्वपूर्ण थी।
चुनाव आयोग के इतिहास में मतभेद का यह पहला उदाहरण नहीं है। 2019 के आम चुनावों के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी आदर्श आचार संहिता के फैसलों पर अपनी असहमति लिखित रूप में दर्ज कराई थी। इसके बाद 2021 में भी न्यायिक हलफनामों और बैठकों को लेकर आयुक्तों के बीच टकराव की बातें सामने आई थीं। यह इतिहास बताता है कि बहु-सदस्यीय संस्थाओं में आंतरिक असहमति कोई नई बात नहीं है।
आयोग का आधिकारिक पक्ष भी यही रहा है कि एक संवैधानिक संस्था के भीतर विचारों का आदान-प्रदान और मतभेद होना स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है और अंतिम निर्णय संस्थागत नियमों के तहत ही लिए जाते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के दो पहलू हैं। सकारात्मक पहलू यह है कि यह प्रकरण चुनाव आयोग के भीतर 'चेक्स एंड बैलेंसेज' (नियंत्रण और संतुलन) की व्यवस्था को जीवित दिखाता है।
यदि दो आयुक्त खुले तौर पर नियमों के विचलन पर प्रश्न उठा रहे हैं, तो यह साबित करता है कि आयोग के भीतर पूर्णतः एकतरफा व्यवस्था लागू करना आसान नहीं है और संस्थागत ईमानदारी अभी भी मौजूद है। वहीं इसका चिंताजनक पहलू यह है कि यदि देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था में मतदाता पंजीकरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने की प्रवृत्ति दिखेगी, तो इससे आम नागरिक और राजनीतिक दलों के बीच आयोग की निष्पक्षता को लेकर संदेह गहराएगा।
प्रजातंत्र में चुनावी प्रक्रिया की गरिमा केवल मतदान के दिन सुरक्षित नहीं होती, बल्कि उसकी वास्तविक नींव उस मतदाता सूची पर टिकी होती है जिसका उपयोग नागरिक अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए करते हैं। 14 लिखित आपत्तियों का यह प्रकरण केवल राजनीतिक बयानबाजी का हथियार नहीं बनना चाहिए, बल्कि इसे चुनावी सुधारों की दिशा में एक गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए। मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया को तकनीक-सम्मत होने के साथ-साथ पारदर्शी, विकेंद्रीकृत और मानवीय जांच के प्रति उत्तरदायी बनाना अनिवार्य है, ताकि 'वोट चोरी' जैसे आरोपों को चुनावी राजनीति में पनपने की कोई गुंजाइश ही न बचे।

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Web Title-Electoral integrity, internal dissent and the vote theft narrative
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