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भक्तों ने भगवान को लौटाए खातेदारी अधिकार

जयपुर। मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे की ग्राम्योत्थान की मंशा से राजस्थान भर में इन दिनों संचालित राजस्व लोक अदालत अभियान - न्याय आपके द्वार राजस्व मामलों के निस्तारण के साथ ही ग्राम्य समस्याओं का हमेशा-हमेशा के लिए निराकरण करते हुए पारिवारिक एवं सामाजिक सौहार्द की बहाली की दिशा में ऎतिहासिक उपलब्धियां हासिल करता जा रहा है।

बरसों से अटके कामों का हाथों-हाथ निस्तारण हो रहा है, ग्रामीण विकास की गतिविधियों को सम्बल प्राप्त हो रहा है तथा गांवों के विकास तथा ग्रामीणों के उत्थान के लिए संचालित योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी पाकर हजारों ग्रामीण रोजाना लाभान्वित हो रहे हैं।

भीषण गर्मी के दौर में भी आम ग्रामीणों के लिए ये शिविर उनकी जिन्दगी भर के लिए राहत की फुहारें बरसाकर जिन्दगी में शान्ति और आनन्द की बहारें लाने का सुकून देने वाले सिद्ध हो रहे हैं। यही कारण है कि प्रदेश के ग्रामीणों द्वारा इन शिविरों को ग्राम्य उत्सव के रूप में देखा और अनुभव किया जा रहा है।

प्रदेश के राजसमन्द जिले में राजस्व लोक अदालत अभियान-न्याय आपके द्वार के अन्तर्गत ग्राम्यांचलों में लग रहे शिविरों में एक ही छत के नीचे सारे कामों का निस्तारण और संपादन होते देख ग्रामीणों की उत्साहजनक भागीदारी का ग्राफ निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है।

इन शिविरों में ऎसे-ऎसे उल्लेखनीय काम हो रहे जिन्हें कर पाना आसान नहीं था किन्तु सरकार की मंशा और शासन-प्रशासन की आत्मीय भागीदारी और शिविरों को आशातीत सफलता प्रदान करने के लक्ष्य को लेकर जो कुछ किया जा रहा है वह ग्राम्य उत्थान का नया इतिहास रचने लगा है।

इसी तरह का एक रोचक मामला राजसमन्द पंचायत समिति के राज्यावास में हाल ही सम्पन्न राजस्व लोक अदालत अभियान - न्याय आपके द्वार में सामने आया जिसमें 52 साल बाद भगवान भैरवनाथ की भूमि वास्तविक स्वामी भैरवजी के नाम हुई।
नेकदिल भक्तों के आपसी राजीनामे से भगवान के नाम प्रदत्त भूमि पाँच दशकों बाद भगवान के खाते में दर्ज होने का यह अनूठा मामला है जो अनन्य श्रद्धा, न्याय और समर्पण का त्रिवेणी संदेश देता नज़र आता है।

इस सारे मामले के पीछे रोचक कहानी है। इसके अनुसार दशकों पहले राज्यावास ग्राम पंचायत अन्तर्गत फतहनगर गांव में भैरूजी के स्थानक के लिए भैरूजी के नाम पर फतहनगर ठिकाने की ओर से 5 बीघा 4 बिस्वा भूमि सेवा-पूजा के लिए दी गई।

श्री भैरूजी मन्दिर की सेवा-पूजा परंपरा से कुमावत और गाड़री समाज के भक्तगत करते आ रहे हैं। यह क्रम लम्बे समय से चला आ रहा था कि इस बीच सन् 1966 में सेटलमेंट के समय भूमि पर भैरूजी का नाम हट गया और उसकी जगह यह जमीन दोनों समाजों के पुजारियों के वारिसों के नाम चढ़ गई और रिकार्र्ड में भैरूजी की बजाय वे खातेदार के रूप में दर्ज हो गए।

कालान्तर में दोनों समाजों के पुजारियों का कुनबा बढ़ता रहा। इसके फलस्वरूप विरासत से बहन-बेटियों व अन्य सदस्यों की बढ़ोतरी की वजह से जमीन को लेकर आपसी मनमुटाव और झगड़े होने लगे।

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Web Title-Devotees returned to God Khatedari Rights
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