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नगर निकाय चुनाव और आहत अवाम : रील में चमकती राजधानी, कीचड़ में सिसकती ज़िंदगानी

Civic Body Elections and the Agrieved Public: A Capital Shining on Reel, Lives Struggling in the Mire - Jaipur News in Hindi

जयपुर। बात जब राजधानी की साख और जनता के सब्र की हो, तो कलम का तल्ख होना लाजिमी है। राजस्थान में नगर निकाय चुनावों की बिसात क्या बिछी, सत्ता प्रतिष्ठान के दावों और वादों का मुलम्मा सोशल मीडिया की डिजिटल चौपालों पर उतरता नजर आ रहा है। यह महज किसी विपक्षी दल का प्रायोजित प्रलाप नहीं, बल्कि उस आम शहरी और नौजवान का संचित आक्रोश है जो रोज़ सुबह गड्ढों, उफनते सीवरों और कचरे के अंबार से जूझते हुए घर से निकलता है।

एक जागरूक नागरिक ने सीधे सत्ता के शीर्ष पर उंगली रखते हुए जो लिखा, वह आँखें खोलने के लिए काफी है: "मुख्यमंत्री (8 विभाग), दो उपमुख्यमंत्री (10 विभाग) और एक सीनियर मंत्री (6 विभाग) वाले जयपुर शहर में गड्ढों, सीवर, सड़कों, नालियों, ट्रैफिक और कचरे की स्थिति देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भाजपा को एक-एक पार्षद जिताने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की मदद क्यों लेनी पड़ रही है। इतनी सत्ता, इतने विभाग और इतना प्रशासनिक नियंत्रण, फिर भी शहर की यह हालत है—तो सवाल पार्षदों का नहीं, व्यवस्था और जवाबदेही का है।"
यह टिप्पणी किसी दफ्तर में बैठकर लिखी गई सियासी पटकथा नहीं, बल्कि गुलाबी नगर की बदहाली का कड़वा एक्स-रे है। लोग पूछ रहे हैं कि जिस शहर में सरकार के सबसे ताकतवर चेहरे निवास करते हों, उसी शहर के रोहिणी विहार और भढाणा जैसे इलाकों में आम इंसान का पैदल निकलना दूभर क्यों है?
शहर के दर्द को बयां करते हुए एक अन्य यूजर ने इतिहास के पन्नों को खंगाल डाला—
"जयपुर में केवल काफिले ही दौड़ रहे हैं, विकास का रूट नहीं लग पाया! विकास इतने माननीयों की रस्साकशी के बीच फंसा है कि शहर के 298 साल के इतिहास में यह सबसे बुरी स्थिति है। 1981 की विनाशकारी बाढ़ में भी इतना नुकसान नहीं हुआ होगा जितना आज की प्रशासनिक बेरुखी से हो रहा है। माननीयों ने सोशल मीडिया की ‘रील’ (Reel) को ही ‘रियल’ (Real) विकास मान लिया है!"
बात यहीं नहीं थमती। चुनाव आते ही दावों और वायदों की जो बरसात होती है, उस पर एक तल्ख शेर के जरिए जनता ने आईना दिखाया है—
"सूबे का हर घर खँगाला जायेगा,
नित नया जुमला उछाला जायेगा,
हो न क्यों—आखिर चुनावी दौर है,
बाद में छीना निवाला जायेगा।"
एक तरफ नौजवान यूजीसी रोलबैक (#UGCROLLBACK) और आरक्षण सुधारों (#ReservationsReforms) पर सरकार की चुप्पी को लेकर चेता रहे हैं कि निकाय चुनावों के नतीजे हुक्मरानों की आँखें खोल देंगे; तो दूसरी तरफ जगतपुरा की आरएएस (RAS) कॉलोनी जैसे पॉश इलाकों के बाशिंदे लाचारी जता रहे हैं कि चुनाव जीतने के बाद माननीय विधायक जी ने इलाके का रुख तक नहीं किया और जब सोशल मीडिया पर समस्याएं गिनाईं, तो ब्लॉक कर दिया गया।
नौकरशाही के बेलगाम होने और जनप्रतिनिधियों के रील-संस्कृति में खो जाने की यह गूंज ईवीएम तक क्या गुल खिलाएगी, यह तो वक्त बताएगा। मगर हुक्मरानों को यह समझ लेना चाहिए कि जनता के सब्र का बांध जब टूटता है, तो भारी-भरकम लवाजमे और प्रशासनिक सहारे भी धाराशायी हो जाया करते हैं।

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Web Title-Civic Body Elections and the Agrieved Public: A Capital Shining on Reel, Lives Struggling in the Mire
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