स्वास्थ्य विशेषज्ञों की माने तो चाय का सर्वप्रथम उपयोग एक औषधि के तौर पर किया गया था। जड़ी-बूटियों के जानकार समय-समय पर तमाम रोगों के इलाज के लिए चाय की ताजा पत्तियों और इसके बीजों को औषधि के तौर पर इस्तेमाल करते गए।
जैसे-जैसे समय बीता, चाय हमारी जिंदगी का हिस्सा और दिन के शुरुआत में पहले पेय के रूप में हमारे परिवारों के बीच प्रचलित हो गई।
खाद्य और पेय पदार्थों को औषधीय गुणों के आधार पर अपने दैनिक जीवन संतुलित मात्रा में लेने से कई रोगों से दूर-दूर तक आपका पाला नहीं पड़ता है।
संतुलित मात्रा में चाय का सेवन अनेक रोगों को आपके नजदीक भटकने भी नहीं देता। चलिए आज जानते हैं औषधीय गुणों से भरपूर चाय की चुस्कियों के बारे में… औषधीय गुणों से भरपूर विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक चाय के बारे मेंः-
गौतीचाय : बुंदेलखंड में ग्रामीण लोग इस तरह की चाय बनाते हैं। हल्की सी नींबू की सुंगध लिए इस चाय की चुस्की गजब की ताजगी ले आती है। लेमन ग्रास की तीन पत्तियों को हथेली पर कुचलकर दो कप पानी में डाल दिया जाता है और उबाला जाता है। स्वादानुसार शक्कर डालकर इसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह एक कप बचे। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
जो लोग अदरक का स्वाद पसंद करते हैं, वे एक चुटकी अदरक कुचलकर इसमें डाल सकते हैं। इस चाय में भी दूध का उपयोग नहीं होता है। गौती चाय में कमाल के एंटीओक्सीडेंट गुण होते हैं, और शरीर के अंदर किसी भी प्रकार के संक्रमण को नियंत्रित करने में गौती चाय काफी असरकारक होती है।
कालीचाय : जबरदस्त मिठास लिए ये चाय बगैर दूध की होती है। इस चाय को तैयार करने के लिए 2 कप पानी में एक चम्मच चाय की पत्ती और 3 चम्मच शक्कर को डालकर उबाला जाता है। जब चाय लगभग एक कप शेष रह जाती है, इसे उतारकर छान लिया जाता है और परोसा जाता है। हर्बल जानकारों के अनुसार मीठी चाय दिमाग को शांत करने में काफी सक्रिय भूमिका निभाती है यानि यह तनाव कम करने में मदद करती है।
धनिया चाय : राजस्थान के काफी हिस्सों में धनिया की चाय स्वास्थ्य सुधार के हिसाब से दी जाती है। लगभग 2 कप पानी में जीरा, धनिया, चायपत्ती और कुछ मात्रा में सौंफ डालकर करीब 2 मिनिट तक खौलाया जाता है, आवश्यकतानुसार शक्कर और अदरख डाल दिया जाता है। कई बार शक्कर की जगह शहद डालकर इसे और भी स्वादिष्ट बनाया जाता है। गले की समस्याओं, अपचन और गैस से त्रस्त लोगों को इस चाय का सेवन कराया जाता है।
अनंतमूली चाय : पातालकोट में सर्द दिनों में अक्सर आदिवासी अनंतमूली चाय पीते हैं। अनंतमूल स्वभाव से गर्म प्रकृति का पौधा होता है, इसकी जड़ें निकालकर लगभग 1 ग्राम साफ जड़ पानी में खौलाई जाती है। इसी पानी में थोड़ी सी चाय की पत्तियों को भी डाल दिया जाता है। दमा और सांस की बीमारी से ग्रस्त रोगियों को इसे दिया जाता है।
खट्टी गौती चाय : मध्यभारत के गोंडवाना क्षेत्र में गौती चाय बनाते समय इसी चाय में संतरे या नींबू के छिलके डाल दिए जाते हैं और कुछ मात्रा नींबू रस की भी डाल दी जाती है और फि र परोसी जाती है खट्टी गौती चाय। सदियों पुराने इस एंटी एजिंग फार्मुले को आदिवासी अपनाते रहें हैं और अब आधुनिक विज्ञान इस पर ठप्पा लगाना शुरु कर रहा है। नई शोध बताती है कि हरी चाय और नींबू का मिश्रण उम्र के पड़ाव की प्रक्रिया को धीमा कर देता है, यानि आप इस चाय का प्रतिदिन सेवन करें तो अपने यौवन को लंबा खींच सकते हैं।
मुलेठी चाय : गुजरात के सौराष्ट्र में जेठीमद चाय के नाम मशहूर इस चाय को मध्यभारत में मुलेठी चाय के नाम से जाना जाता है। साधारण चाय तैयार करते समय चुटकी भर मात्रा मुलेठी की डाल दी जाए तो चाय में एक नई तरह की खुश्बु का संचार होता है और चाय स्वादिष्ठ भी लगती है। दमा और सर्दी खांसी से परेशान लोगों को इस चाय को प्रतिदिन दिन में दो से तीन बार लेना चाहिए।
बस्तर की सैदी या मीठी चाय : शहद होने की वजह से इस चाय को शहदी चाय या सैदी चाय कहा जाता है। बस्तर के दुरस्थ गांवों में अक्सर इस चाय को तैयार किया जाता है। साधारण चाय पत्ती (2 चम्मच) के साथ कुछ मात्रा में शहद (लगभग 2 चम्मच) और दूध (2 चम्मच) डालकर फेंटा जाता है।
दूसरी तरफ एक बर्तन में 2 कप पानी को उबाला जाता है।
पानी जब उबलने लगे, इसमें इस फेंटे हुए मिश्रण को डाल दिया जाता है। यदि आवश्यकता हो तो थोड़ी सी मात्रा अदरक की डाल दी जाती है और तैयार हो जाती है सैदी चाय। माना जाता है कि यह चाय शरीर में गजब की स्फूर्ति लाती है। शहद, अदरक और चाय के अपने अपने औषधीय गुण है और जब इनका संगम होता है तो ये गजब का टॉनिक बन जाते हैं।
मसाला चाय : गुजरात में काली मिर्च, सौंठ, तुलसी, दालचीनी, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, लौंग, पीपलामूल, जायफल, जायपत्री और लौंग मिलाकर एक मसाला तैयार किया जाता है। चाय पत्ती और दूध के उबलते पानी में चुटकी भर मसाला डाल दिया जाता है। स्वादिष्ठ मसाला चाय जब आपको परोसी जाती है, ना सिर्फ ये गजब का स्वाद लिए होती है बल्कि शरीर ताजगी से भरपूर हो जाता है।
सहजन की चाय : राजस्थानियों के अनुसार सहजन का फूल पेट और कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, साइटिका, गठिया आदि में उपयोगी है। इसकी छाल का सेवन साइटिका, गठिया, लीवर में लाभकारी होता है। सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात और कफ रोग खत्म हो जाते हैं। इसकी पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया, साइटिका, मधुमेह, पक्षाघात, वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है। साइटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखता है।
काढ़ा पीने से क्या-क्या हैं फायदे - कैंसर और पेट आदि के दौरान शरीर के बनी गांठ , फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन , हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है यह भी पाया गया है कि यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द) , जोड़ों में दर्द, लकवा, दमा,सूजन, पथरी आदि में लाभकारी है।
सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द और शहद को दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से वायरस से होने वाले रोग, जैसे चेचक के होने का खतरा टल जाता है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
सहजन में हाई मात्रा में ओलिक एसिड होता है, जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिए अति आवश्यक है।
सहजन में विटामिन-सी की मात्रा बहुत होती है। यह शरीर के कई रोगों से लड़ता है। यदि सर्दी की वजह से नाक-कान बंद हो चुके हैं तो , आप सहजन को पानी में उबालकर उस पानी का भाप लें। इससे जकड़न कम होगी।
Note : चाय पीना बहुत हानिकारक होता है इसे नही पीना चाहिए लेकिन फिर भी आप पीना चाहते है तो ये ऊपर बताएं गए उपाय कर सकते है और अगर चाय छोड़ दी है तो आप ऊपर बताये गए उपाय एक गिलास कुनकुने पानी मे डाल कर भी सेवन कर सकते है।
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