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एक तस्वीर में 24 साल पुराना वो मंजर : जब थार की तपती रेत पर उतरा एक फ़रिश्ता, और एक युवा कलेक्टर को मिला जिंदगी का सबसे हसीन शॉट

The Barmer famine and Dr. Kalam simplicity... A memoir by senior IAS officer Ajitabh Sharma - Jaipur News in Hindi

बाड़मेर का अकाल और डॉ. कलाम की सादगी... वरिष्ठ आईएएस अजिताभ शर्मा का संस्मरण सोशल मीडिया पर 50 हजार से अधिक बार देखा जा चुका है

सैयद हबीब, जयपुर। सिनेमा की भाषा में कहें तो कुछ दृश्य स्क्रीन पर भले ही कुछ मिनटों के लिए आते हैं, लेकिन वे ताउम्र जेहन में ठहर जाते हैं। जय प्रकाश चौकसे अक्सर लिखा करते थे कि "असली सिनेमा रील पर नहीं, इंसान की संवेदनाओं के कैनवास पर रचा जाता है।" वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अजिताभ शर्मा की एक ताजा सोशल मीडिया पोस्ट ठीक किसी क्लासिक फिल्म के उस यादगार दृश्य की तरह है, जिसने इंटरनेट पर 50 हजार से अधिक लोगों का दिल जीत लिया है।
यह कहानी है 24 साल पुराने एक ऐसे दृश्य की, जहाँ एक तरफ थार का तपता रेगिस्तान था, दूसरी तरफ अकाल की मार, और बीच में थे दो किरदार—एक वो, जो देश का सर्वोच्च नागरिक यानी राष्ट्रपति था, और दूसरा वो युवा आईएएस, जिसने पहली बार किसी जिले (बाड़मेर) की कमान संभाली थी।
पहला दृश्य : बाड़मेर की जलती रेत और 'मिसाइल मैन' का आगमन
दिसंबर 2002। लोकेशन: बाड़मेर, राजस्थान।
कैमरे का ज़ूम-इन थार के उस बीहड़ रेगिस्तान पर होता है, जहां अकाल अपनी पूरी विभीषिका के साथ पसरा हुआ था। इंसान से लेकर मवेशी तक पानी की एक-एक बूंद को तरस रहे थे। ऐसे में सीन में एंट्री होती है भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की।
आईएएस की ट्रेनिंग पूरी किए अभी मुश्किल से चार साल ही बीते थे और अजिताभ शर्मा को बाड़मेर का कलेक्टर बनाया गया था। जब देश का राष्ट्रपति किसी जिले के अकाल राहत कार्यों की जमीनी हकीकत (First-hand Feedback) जानने पहुंचता है, तो किसी भी नए-नवेले युवा अफसर के दिल की धड़कनें तेज होना स्वाभाविक है। यह एक ऐसा तनावपूर्ण फ्रेम हो सकता था, जैसा किसी गंभीर पॉलिटिकल ड्रामा में होता है। लेकिन कलाम साहब के आते ही इस सीन की पूरी लाइट, टोन और बैकग्राउंड स्कोर बदल गया।
क्लोज़-अप : न रोब, न हिदायत... बस एक आत्मीय संवाद
जैसे किसी अच्छी फिल्म में संवादों से ज्यादा किरदारों की खामोशी और आंखों की आत्मीयता बोलती है, ठीक वही जादू उस मुलाकात में हुआ।
अजिताभ शर्मा उस मुलाकात की फ्रेम-बाय-फ्रेम यादों को उकेरते हुए बताते हैं कि चर्चा का विषय था—रेगिस्तान में जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके और क्या सरकार को पीढ़ियों से चली आ रही लोक-व्यवस्था में बिना वजह दखल देना चाहिए या नहीं?
लेकिन इस सीन का असली हीरो कोई नीतिगत फैसला नहीं, बल्कि डॉ. कलाम का व्यवहार था।
सुनने की ललक: राष्ट्रपति भवन का कोई आभामंडल नहीं, बल्कि सामने वाले की बात को पूरी तन्मयता से सुनने की एक अद्भुत ललक।
अहंकार से परे : यह साबित करने की कोई जल्दबाजी नहीं कि "मैं तुमसे ज्यादा जानता हूं।"
खुलकर बोलने की आजादी : एक युवा कलेक्टर को यह आजादी देना कि वह बिना किसी झिझक के अपने मन की बात रख सके।
द क्लाइमेक्स : बातचीत की सबसे हसीन कला...
जय प्रकाश चौकसे अक्सर कहते थे कि एक महान अभिनेता वह नहीं होता जो आपको अपनी कला से दबा दे, बल्कि वह होता है जो सह-कलाकार को भी अपने सामने खुलकर जीने का मौका दे।
अजिताभ शर्मा अपनी इस वायरल पोस्ट के अंत में जो निष्कर्ष निकालते हैं, वह जीवन और सिनेमा दोनों का सबसे बड़ा दर्शन है:
"शायद बातचीत की सबसे बेहतरीन कला यह नहीं है कि लोग आपकी तारीफ करें या आपसे प्रभावित हों, बल्कि यह है कि लोग आपके साथ रहते हुए खुद को बेहद सहज और वास्तविक (At Home) महसूस कर सकें।"
सोशल मीडिया पर सुपरहिट हुई यह भावुक दास्तान
24 साल बाद जब अजिताभ शर्मा ने उस पल की एक पुरानी तस्वीर के साथ अपनी भावनाएं साझा कीं, तो यह पोस्ट सोशल मीडिया पर 'ब्लॉकबस्टर' साबित हुई। 50,000 (50K) से अधिक व्यूज और हजारों शेयर्स के साथ लोग इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि आज के दौर में जब हर कोई दूसरों पर अपना प्रभाव जमाने की होड़ में लगा है, तब डॉ. कलाम जैसी महान शख्सियत की सादगी और बड़प्पन कितना दुर्लभ और कीमती था।
यह संस्मरण साबित करता है कि असली 'हीरो' वही होता है जो अपनी महानता का बोझ दूसरों पर नहीं डालता, बल्कि दूसरों को अपने सामने बड़ा महसूस कराता है।

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Web Title-The Barmer famine and Dr. Kalam simplicity... A memoir by senior IAS officer Ajitabh Sharma
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