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विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस, विभाजन की अमानवीय त्रासदी:–डॉ अपूर्वा

Partition Horrors Remembrance Day: The Inhumane Tragedy of Partition – Dr. Apoorva - Dausa News in Hindi

दौसा। भाजपा जिला अध्यक्ष लक्ष्मी रेला ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर एक शाम शहीदों के नाम सांस्कृतिक कार्यक्रम का दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ किया। भारतीय जनता पार्टी दौसा शहर मंडल द्वारा विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर विभाजन की विभीषिका में अपने प्राणों की आहुति देने वाले एवं असंख्य कष्ट सहने वाले वीरों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा एक सशक्त, एकजुट एवं समरस भारत के निर्माण का संकल्प लेने के लिए कैप्टन छुट्टन लाल टाउन हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया गया। भाजपा प्रदेश मंत्री डॉ. अपूर्वा नें कार्यकर्ता को संबोधित करते हुए कहा भारत का स्वतंत्रता संग्राम ऐतिहासिक एवंदीर्घकालिक विभाजन की अकल्पनीय त्रासदी रूप में हुई। द्विराष्ट्र सिद्धांत पर आधारित यह एक भौगोलिक विभाजन ही नहीं अपितु भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आत्मा का विघटन था जिसने भारत, पाकिस्तान दोनों देशों की जनता को इस सीमा तक झकझोर दिया कि इसका दंश आज तक झेलते आ रहे है। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन उससे एक दिन पहले, 14 अगस्त को पाकिस्तान अस्तित्व में आया, और इसके साथ ही शुरू हुई इतिहास की सबसे भीषण मानवीय त्रासदियों में से एक, जिसे आज हम "विभाजन विभीषिका” के नाम से जानते हैं। विभाजन के दौरान लाखों लोग मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए और स्त्रियों के साथ जो हुआ वह इतिहास के पन्नों में पीड़ा बनकर दर्ज है। इस विभीषिका की स्मृति को जीवित रखने और इससे सीख लेने के लिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2021 में 14 अगस्त को "विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस" के रूप में घोषित किया। विभाजन की ऐतिहासिक एवं हृदय विदारक घटना 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना से लेकर 1947 तक घटित हुई राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक द्वेष एवं औपनिवेशिक नीतियों की चरम परिणति थी। ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों में भारत में धार्मिक पहचान की भावना प्रबल रूप में उभार लेते हुए नव राष्ट्र निर्माण तक जा पहुंची। मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी पार्टी मुस्लिम लीग ने 1940 में लाहौर प्रस्ताव के तहत “द्वि राष्ट्र सिद्धांत" रखा, जिसमें कहा गया कि भारत में हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं और उनका साथ रहना संभव नहीं। अखंड भारत ने में स्वप्न को साकार करने के लिए गांधी, सरदार पटेल जैसे नेताओं भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक एवं एकीकृत राष्ट्र के रूप प्रस्तुत किया, किंतु जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग पर अड़कर 1946-47 में देश को सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से अस्थिर कर दिया। जून 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन की योजना प्रस्तुत की। 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। ब्रिटिश संसद ने “भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947" पारित किया जिसमें विभाजन की रूपरेखा और तिथि निर्धारित की गई।
भाजपा जिला अध्यक्ष लक्ष्मी रेला ने कहा ब्रिटिश सरकार ने भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक सीमाएं तय करने के लिए एक अंग्रेज़ न्यायाधीश सर सिरिल रेडक्लिफ को नियुक्त किया। ऐसा व्यक्ति जिसने कभी भारत नहीं देखा था, न ही वह यहां की सामाजिक संरचना से परिचित था। रेडक्लिफ को केवल पांच सप्ताह का समय दिया गया और उसने पंजाब और बंगाल को धार्मिक जनसंख्या के आधार पर दो हिस्सों में बांटी। इस निर्णय ने खासकर पंजाब में एक खूनी जंग की नींव रख दी, क्योंकि वहां हिन्दू, मुस्लिम और सिख मिलकर रहते थे।
विभाजन के बाद लगभग 1.4 से 2 करोड़ लोग अपने घरों से उजड़कर भारत या पाकिस्तान की ओर पलायन करने को विवश हुए। इसे हाल ही के विश्व में हुए विस्थापनो में से सर्वाधिक विभत्स तथा सबसे बड़ा विस्थापन घोषित किया गया। इतिहास का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट था, जिसमें न कोई पूर्व योजना थी, न आधार, न सुरक्षा, न कोई सुविधा। औपनिवेशिक महत्वाकांक्षाओं एवं राजनीतिक स्वार्थ लिप्तता द्वारा लगभग 20 लाख लोगों की बलि दी गई। ट्रेनें लाशों से भरी हुई आती थीं, जिनमें सिर कटे शव, जलाए हुए शव, और महिलाओं की लाशें पाई जाती थी। हजारों महिलाओं का बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन, और किडनैपिंग की गई। बच्चों एवं बुजुर्गों को जिंदा जला दिया गया।
विभाजन ने विस्थापितों का भूगोल छीन लिया, घर छीना, दुकानें छीनीं, जमीनें खोई लेकिन असाधारण रूप से सबकुछ खोकर भारत आने वाले विस्थापितों ने अदम्य साहस और श्रम से अपना भविष्य निर्मित किया, नगर बसाए, व्यापार खड़ा किया, शिक्षा, उद्यम और परिश्रम को अपनी पूंजी बनाया। यह पुनर्निर्माण उस मानसिक शक्ति की कहानी है जो राख से भी अग्नि की संभावना निकाल लेती है। यही भारत की सभ्यता और संस्कृति रही है, इसी जिजीविषा ने भारत को विश्व में सिरमौर बनाए रखा है लेकिन इतिहास की यह एक विडम्बना है। पहली पीढ़ी के पास स्मृतियां थीं, दूसरी पीढ़ी के पास स्मृतियां और संघर्ष दोनों थे, तीसरी पीढ़ी के सामने एक नई चुनौती है, क्या वह उन स्मृतियों की भाषा को जीवित रख पाएगी ? यही वह प्रश्न है जिस पर आज हमें सबसे गंभीरता से विचार करना होगा।
पश्चिमी भारत में विभाजन के प्रमुख केंद्र के रूप में पंजाब (लाहौर, अमृतसर, रावलपिंडी) तथा पूर्वी भारत में बंगाल (कोलकाता, नोआखाली) उभरे। अमृतसर और लाहौर में हिन्दू और सिखों की बस्तियां जलाकर राख कर दी गईं, सैकड़ों गुरुद्वारों को अपवित्र किया गया। बंगाल में हुई साम्प्रदायिक हिंसा का स्वरूप इतना भीषण था कि स्वयं गांधीजी को वहां जाकर हस्तक्षेप करना पड़ा।
जिला मीडिया प्रभारी प्रेम हरितवाल ने बताया इस अवसर पर जिला महामत्री विपिन जैन, दौसा नगर अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह राजपूत, सिकंदर वधावन, किरण डोरिया, मंजू लता जाटव, सरोज मीणा, मधु जैमन, मिश्री मीणा, रिकी पॉइंटग, नवीन शर्मा, ऋषि राज मीणा, सुरेश शर्मा, हरीश झालानी, राजेंद्र शर्मा उपस्थित रहे।

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Web Title-Partition Horrors Remembrance Day: The Inhumane Tragedy of Partition – Dr. Apoorva
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