चित्तौड़गढ़। राष्ट्रीय स्तर पर वीर रस की पहचान और मेवाड़ की गौरवगाथाओं के प्रखर रचनाकार पंडित नरेंद्र मिश्र का मंगलवार सुबह 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे। चित्तौड़गढ़ स्थित आवास पर नाश्ता करने के बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी, परिजन उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत, शिक्षा क्षेत्र और मेवाड़ में शोक की लहर दौड़ गई।
मेवाड़ के ‘राजकवि’ की उपाधि
1976 में जब तत्कालीन पूर्व महाराणा भगवत सिंह ने पं. मिश्र की अमर कृति ‘गोरा-बादल’ सुनी, तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्हें ‘मेवाड़ राजवंश के राजकवि’ की उपाधि प्रदान की। यह सम्मान उनके साहित्यिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धियों में माना जाता है। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
देश और तिरंगे के लिए समर्पित आवाज
निधन से दो दिन पहले ही उन्होंने वंदेमातरम पर चार पंक्तियाँ लिखीं, जो उनकी देशभक्ति की निरंतर जलती लौ का प्रमाण हैं। इससे पहले भी उनकी वीर रस से ओत-प्रोत पंक्तियाँ राष्ट्रीय पर्वों पर लाखों जनमानस को प्रेरित करती रही थीं।
10वीं कक्षा में लिखी कालजयी ‘गोरा-बादल’
5 मई 1937 को उत्तर प्रदेश के ठाकुरद्वारा में जन्मे नरेंद्र मिश्र बचपन से ही इतिहास और राष्ट्रभक्ति के कथानकों से प्रभावित थे। विद्यालय के दिनों में ही उन्होंने ‘गोरा-बादल’ जैसी कालजयी कविता की रचना कर सबको चकित कर दिया था। बाद में मेवाड़ की संस्कृति और शौर्य के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा हुआ कि उन्होंने यही भूमि अपनी कर्मभूमि बना ली।
शिक्षक से उपजिला शिक्षा अधिकारी तक की यात्रा
चित्तौड़गढ़ जिले की छोटी सादड़ी से शिक्षक के रूप में करियर शुरू करने वाले पं. मिश्र अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए शिक्षा विभाग में सम्मानित रहे। आगे चलकर वे उपजिला शिक्षा अधिकारी बने और इसी पद से सेवानिवृत्त हुए।
मेवाड़ को समर्पित साहित्य
उनकी कविताएँ ‘हल्दीघाटी’, ‘पद्मिनी’, ‘हुमायूं की राखी’, ‘पन्नाधाय’, ‘हाड़ी रानी’ और महाराणा प्रताप पर आधारित कई रचनाएँ आज भी मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर की तरह पढ़ी-सुनी जाती हैं।चित्तौड़गढ़, उदयपुर की मोती मगरी, डबोक एयरपोर्ट और नई दिल्ली के पुराने संसद भवन पर उनकी पंक्तियाँ अंकित हैं—जो उनके साहित्यिक प्रभाव की जीवंत मिसाल हैं।
उन्होंने मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के कुलगीत भी रचे, जिन्हें आज भी परंपरा से गाया जाता है।
मंचीय मर्यादा के संस्कारी कवि
राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में शालीनता और मर्यादा के प्रतीक माने जाने वाले पं. मिश्र 18 बार दिल्ली के लाल किले पर आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। वे कहा करते थे—“जो कविता मैं अपने घर की बहन-बेटियों के सामने नहीं सुना सकता, वह देश की बहन-बेटियों के सामने भी नहीं सुना सकता।”उनकी यह सोच उन्हें मंचों पर एक विशिष्ट स्थान दिलाती रही।
सम्मान और मान्यताएं
पं. मिश्र को महाराणा कुम्भा सम्मान, निराला सम्मान, तांत्या टोपे सम्मान, दीनदयाल उपाध्याय साहित्य पुरस्कार और राजस्थान साहित्य अकादमी के विशिष्ट साहित्यकार सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। विशेष बात—इन सम्मानों के लिए उन्होंने कभी आवेदन नहीं किया; उनका साहित्य ही उनका परिचय रहा।
परिवार और अंतिम वर्षों की स्थितियां
1997 में उनकी पत्नी सरोज मिश्र का निधन हो गया था। वे दो पुत्र—विवेक और विश्वास, तथा तीन पुत्रियाँ—श्रद्धा, डॉ. निरूपमा और अनामिका छोड़ गए हैं। पिछले कुछ समय से वे चिकित्सकीय रूप से कमजोर थे और घर पर ही रहते थे।
पंडित नरेंद्र मिश्र का अवसान केवल एक कवि का निधन नहीं, बल्कि मेवाड़ की सांस्कृतिक परंपरा की एक विलक्षण वाणी का मौन हो जाना है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को सदैव मेवाड़ की शौर्य गाथा और भारतभक्ति का संदेश देती रहेंगी।
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