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नृत्य से सामाजिक बदलाव की राह पर प्रियाक्षी अग्रवाल

Priyaakshi Agarwal on the Path of Social Change Through Dance - Bhilwara News in Hindi

पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय मंच तक सफर भीलवाड़ा। जिले के छोटे से गांव बनेड़ा में जन्मी प्रियाक्षी अग्रवाल की कहानी साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल बन चुकी है। एक ऐसे ग्रामीण और गहरे पितृसत्तात्मक समाज में पली-बढ़ी प्रियाक्षी ने न केवल सामाजिक बंधनों को तोड़ा, बल्कि नृत्य को अपनी पहचान और बदलाव का माध्यम बनाया। प्रियाक्षी बताती हैं कि उन्हें महज छह साल की उम्र से नृत्य से प्रेम हो गया था। लेकिन गांव के माहौल में यह सपना देखना आसान नहीं था। लोग अक्सर तंज कसते थेकृ“नाचने वाली बनेगी क्या?” नृत्य को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था और लड़कियों की उच्च शिक्षा को भी हतोत्साहित किया जाता था। इस कारण उन्हें शारीरिक और मानसिक हिंसा तक झेलनी पड़ी। इसके बावजूद उनके भीतर नृत्य करने की जिद आलोचना और डर से कहीं ज्यादा मजबूत थी।
सोलह वर्ष की उम्र में प्रियाक्षी ने अपने सपने को पूरा करने के लिए घर छोड़ने का कठिन फैसला किया। बनेड़ा से निकला उनका यह सफर दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद होते हुए अब यूरोप तक जा पहुंचा है। उन्होंने अहमदाबाद में प्रसिद्ध नृत्यांगना और सामाजिक कार्यकर्ता मल्लिका साराभाई के साथ प्रशिक्षण और काम किया, जहां उन्होंने भरतनाट्यम, रंगमंच और कलरिपयट्टू जैसी विधाओं में दक्षता हासिल की।
प्रियाक्षी का चयन कोरिया मेंडस इंटरनेशनल मास्टर इन डांस नॉलेज, प्रैक्टिस एंड हेरिटेज कार्यक्रम के लिए हुआ, जिसके तहत उन्हें यूरोप में नृत्य मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए पूर्ण छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। यह उपलब्धि उनके संघर्ष और मेहनत का प्रतिफल थी।
भरतनाट्यम सीखने के लिए उन्होंने असाधारण मेहनत की। सामान्य तौर पर जहां किसी विद्यार्थी की सप्ताह में तीन घंटे की कक्षा होती थी, वहीं प्रियाक्षी की रोजाना चार घंटे की कक्षा होती थी। यह सिलसिला लगातार साढ़े तीन साल चला। इस दौरान उन्होंने अपनी आजीविका के लिए क्यूरेटर का काम किया, मार्केटिंग मैनेजर की नौकरी की और अपने खर्च खुद उठाए। उनका दैनिक जीवन बेहद कठिन थाकृसुबह आठ बजे घर से निकलना और रात ग्यारह बजे लौटना उनकी दिनचर्या बन गई थी। इसके बावजूद वे संतुष्ट नहीं हुईं और आगे बढ़कर केरल जाकर कलरिपयट्टू सीखने का निर्णय लिया।
आज प्रियाक्षी 18 से अधिक देशों में नृत्य प्रदर्शन कर चुकी हैं और नृत्य सिखा चुकी हैं। नॉर्वे, डेनमार्क, जर्मनी, जापान और जमैका जैसे देशों में उन्होंने भारतीय नृत्य को सामाजिक मुद्दों के साथ जोड़ा। उनके नृत्य में केवल कला नहीं, बल्कि स्त्री स्वतंत्रता, अधिकार और आत्मसम्मान की आवाज गूंजती है।
हाल ही में उन्होंने जयरंगम महोत्सव में नारीवादी प्रस्तुति दी, जिसमें महिलाओं के संघर्ष और आत्मनिर्णय की कहानी को मंच पर उतारा गया। प्रस्तुति के बाद जब महिलाएं उनकी आंखों में आंसू और दिल में कृतज्ञता लेकर पहुंचीं, तो प्रियाक्षी को लगा कि उनका नृत्य केवल मंचीय कला नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद बन गया है।
प्रियाक्षी कहती हैं कि महिलाओं को आगे बढ़कर अपने जुनून को जीना चाहिए। उनकी मान्यता है कि जो उमंग मन में है, उसे दबाना नहीं चाहिए। यदि कोई महिला लक्ष्य तय कर ईमानदारी से मेहनत करे, तो परिवार और समाज भी धीरे-धीरे साथ देने लगते हैं। मूल रूप से बनेड़ा की रहने वाली प्रियाक्षी वर्तमान में अहमदाबाद में रह रही हैं। उनका कहना है कि वे नृत्य के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आगे लाना चाहती हैं और इसके लिए जो भी संभव होगा, वह करेंगी।
सबसे भावुक पहलू यह है कि आज वही माता-पिता और गांववाले, जिन्होंने कभी उनके सपनों पर सवाल उठाए थे, अब उनकी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं। बनेड़ा की बेटी अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुकी है।
प्रियाक्षी अग्रवाल की कहानी यह सिद्ध करती है कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का प्रभावी हथियार भी बन सकती है। उनका सफर उन तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो आज भी समाज के डर से अपने सपनों को दबाए बैठी हैं। यह कहानी नृत्य की नहीं, बल्कि हिम्मत की है और यही इसे साधारण सफलता से ऊपर उठाकर बदलाव की मिसाल बनाती है।

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Web Title-Priyaakshi Agarwal on the Path of Social Change Through Dance
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