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अल्पायु में असाधारण पुरुषार्थ से रचा जिनशासन का इतिहास, त्रिलोक ऋषिजी की पुण्य स्मृति में युवाचार्यश्री ने किया गुणगान

In his short life, he created the history of Jainism through extraordinary efforts - Bhilwara News in Hindi

शांतिभवन में धर्मसभा, ज्ञान, साधना और जिनशासन सेवा को बताया जीवन का आदर्श भीलवाड़ा। कविकुलभूषण पूज्यपाद त्रिलोक ऋषिजी महाराज की पुण्य स्मृति पर शांतिभवन में आयोजित धर्मसभा में श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने उनके अद्वितीय व्यक्तित्व एवं कृतित्व का स्मरण करते हुए कहा कि त्रिलोक ऋषिजी का जीवन असाधारण पुरुषार्थ, आगम-ज्ञान, साहित्य-सृजन और जिनशासन सेवा की अनुपम मिसाल है। उन्होंने कहा कि कुछ महापुरुष अपने अल्प जीवन में ऐसे कार्य कर जाते हैं जो युगों तक प्रेरणा देते हैं और त्रिलोक ऋषिजी का संपूर्ण जीवन इसका साक्षात प्रमाण है।युवाचार्यश्री ने कहा कि पुण्य स्मरण केवल किसी महापुरुष को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके जीवन से शुभता, पवित्रता और निर्मलता को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का अवसर है। उन्होंने बताया कि विक्रम संवत 1904 में रतलाम में जन्मे त्रिलोकचंद ने विपरीत परिस्थितियों के बीच बचपन बिताया। पिता के निधन के बाद माता नानूबाई ने धैर्य और धर्मनिष्ठा के साथ परिवार का पालन-पोषण किया। बाद में माता, बहन, भाई और बालक त्रिलोकचंद—चारों ने वैराग्य स्वीकार किया तथा लगभग दस वर्ष की आयु में त्रिलोकचंद ने दीक्षा लेकर त्रिलोक ऋषिजी का स्वरूप धारण किया।
युवाचार्यश्री ने बताया कि दीक्षा के बाद त्रिलोक ऋषिजी ने अल्प समय में 17 आगम कंठस्थ कर लिए। उत्तराध्ययन सूत्र सहित अनेक ग्रंथों का गहन अध्ययन कर उन्होंने आगम के सार को सरल भाषा में साहित्य और काव्य के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। उनकी रचनाओं में आगम की प्रामाणिकता, भाषा की सरलता और जीवनोपयोगी संदेश का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि त्रिलोक ऋषिजी केवल श्रेष्ठ कवि ही नहीं, बल्कि विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। वे दोनों हाथों और दोनों पैरों से लेखन करने में सक्षम थे तथा अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर हस्तलेखन के लिए प्रसिद्ध थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने विशाल धार्मिक साहित्य की रचना की। ज्ञान-कुंजर जैसे चित्र, चित्रालंकार काव्य तथा गोमूत्रिका बंध और छत्र बंध जैसी रचनाएं उनकी अद्भुत सृजनशीलता और आध्यात्मिक दृष्टि की साक्षी हैं।
युवाचार्यश्री ने महाराष्ट्र में जिनशासन के विस्तार में त्रिलोक ऋषिजी के योगदान को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों और अभावों के बीच उन्होंने वहां विहार कर धर्म का बीजारोपण किया। लगभग साढ़े तीन वर्ष के प्रवास में उनके मुखारविंद से 22 दीक्षाएं हुईं और आगे चलकर उसी परंपरा ने महाराष्ट्र में जिनशासन को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। उन्होंने अनेक श्रावकों को आगम अध्ययन से जोड़कर ज्ञान की समृद्ध परंपरा स्थापित की।
उन्होंने कहा कि मात्र 36 वर्ष की अल्पायु में त्रिलोक ऋषिजी ने साधना, स्वाध्याय, लेखन, चिंतन और जिनशासन सेवा के क्षेत्र में जो कार्य किए, वे उनके असाधारण पुरुषार्थ का परिचायक हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि समय की महत्ता उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग में निहित होती है।
इस अवसर पर साध्वी नाव्याश्री ने कहा कि परमात्मा और गुरु के प्रति समर्पण तभी सार्थक होता है, जब साधक अपने भीतर की आध्यात्मिक क्षमता को जागृत कर साधना के मार्ग पर अग्रसर हो।
धर्मसभा का संचालन आनंद अनुभूति चातुर्मास शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने किया। उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपवास, आयंबिल, एकासन एवं अन्य तप आराधनाओं के प्रत्याख्यान युवाचार्यश्री से ग्रहण किए। सभा में बेंगलुरु, चेन्नई, मालेगांव, यशवंतपुर, उदयपुर, पाली, चित्तौड़गढ़ सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।
शांतिभवन अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ ने आगामी कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि 2 अगस्त को 12 से 21 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए 'मन की बात' संवाद एवं 'आनंद बाल शिविर' आयोजित होगा। 4 अगस्त को 'कर्मा–प्रिंसिपल एंड प्रैक्टिकल' क्लासेज तथा सिद्धि तप की आराधना जारी रहेगी। वहीं 5 अगस्त से आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में नौ दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ होगा।

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