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मुखौटों के पीछे सिसकता बचपन : भरतपुर के स्कूलों की तकदीर बदल रही है दरख्त छांव की टीम

Childhood sobs behind masks: The team of Darakht Chhaon is changing the fate of Bharatpur schools. - Bharatpur News in Hindi

खास खबर। भरतपुर सरकारी दस्तावेजों और विज्ञापनों में 'कायाकल्प' और 'सर्व शिक्षा अभियान' की तस्वीरें अक्सर सुनहरी दिखाई देती हैं, लेकिन इन चमकदार 'मुखौटों' को हटाकर देखा जाए तो धरातल पर हकीकत कुछ और ही बयां करती है। भरतपुर के ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में स्थित सरकारी स्कूलों की जर्जर दीवारें और बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी मासूम बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है। प्रशासन की इसी संवेदनहीनता और बरसों की बेरुखी के बीच 'दरख्त छांव फाउंडेशन' एक उम्मीद बनकर सामने आई है।
फाइलों में सुधार, धरातल पर बदहालीः
सरकारी फाइलों में जहाँ स्कूलों को 'आदर्श' बताया जाता है, वहीं असलियत यह है कि आज भी कई स्कूलों में न पीने को स्वच्छ पानी उपलब्ध है और न ही बेटियों के लिए गरिमापूर्ण शौचालय। टूटी हुई खिड़कियां, टपकती छतें और संसाधनों की कमी ने शिक्षा के मंदिर को उपेक्षा का केंद्र बना दिया है। प्रशासन की इस सुस्ती का सीधा असर गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों पर पड़ रहा है, जहाँ सुविधाओं के अभाव में 'ड्रॉप-आउट' की दर लगातार बढ़ रही है।


संस्थापक का संकल्प:
"नीयत साफ, तो रास्ते अनेक" व्यवस्था की इसी लाचारी को देखते हुए संस्थापिका उषा सोलंकी और उनकी संस्था 'दरख्त छांव फाउंडेशन' ने इन स्कूलों के कायाकल्प का बीड़ा उठाया है। संस्थापक उषा सोलंकी का स्पष्ट मानना है कि "यदि नीयत साफ और इरादे प्रेरित हों, तो संसाधनों की कमी कभी भी बदलाव की राह में रोड़ा नहीं बन सकती।" इसी प्रेरणा के साथ जहाँ प्रशासन बजट की कमी का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेता है, वहाँ यह टीम अपनी सीमित शक्ति के साथ स्कूलों में पेयजल व्यवस्था का नवीनीकरण और शौचालयों का पुनर्निर्माण कर रही है।
सामूहिक प्रयास से बदलाव की नींवः
यह लड़ाई केवल ईंट और पत्थरों की नहीं, बल्कि बच्चों के आत्मसम्मान की है। इस मुहिम में मोनिका सिंह, वरुण फौजदार, यशराज सिंह और शाहिद खान जैसे समर्पित युवा अपनी पूरी ऊर्जा झोंक रहे हैं। यह टीम मौके पर पहुँचकर न केवल बुनियादी ढांचे को दुरुस्त कर रही है, बल्कि बच्चों के लिए एक सुरक्षित और स्वास्थ्यप्रद वातावरण भी सुनिश्चित कर रही है। इस वर्ष के लिए फाउंडेशन ने 50 से अधिक सरकारी स्कूलों और आंगनवाड़ियों के नवीनीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है।
अनसुलझे सवाल और भविष्य की चुनौतीः
आखिर कब तक विशाल संसाधनों वाली सरकारें बुनियादी सुविधाओं के नाम पर असहाय बनी रहेंगी? जब एक संस्था अपने स्तर पर स्कूलों की सूरत बदल सकती है, तो सरकारी तंत्र की इच्छाशक्ति पर सवाल उठना लाजिमी है। दरख्त छांव फाउंडेशन की यह पहल केवल स्कूलों की मरम्मत नहीं है, बल्कि सोए हुए सिस्टम के लिए एक चेतावनी है कि अब बच्चों के भविष्य के साथ 'कागजी खेल' बंद होना चाहिए।

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Web Title-Childhood sobs behind masks: The team of Darakht Chhaon is changing the fate of Bharatpur schools.
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