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जलियावाला गोलीकांड की गूंज फिर सुनाई दी, पोते ने दादा की मौत का मुआवजा मांगा

The rebel of Joliwala shootout was heard again, grandson demanded compensation for Dadas death - Punjab-Chandigarh News in Hindi

चंडीगढ़। देश में 97 साल पहले हुए जलियांवाला बाग गोलीकांड की गूंज अब एक बार फिर सुनाई दे रही हैॆ। इस गोलीकांड में मरने एक स्वतंत्रता सेनानी के पोते ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर मुआवजे की मांग की है।

जनरल डायर के आदेशों पर जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी वाले दिन हुए हत्याकांड में मारे गए अमृतसर के गांव गलवट्टी के ईशर सिंह के पोते ने अपने दादा की मौत के मुआवजे की मांग हाईकोर्ट से की है। एडवोकेट धर्मपाल गिल के जरिए दायर याचिका में याची पटियाला निवासी मोहन सिंह ने मांग की है कि 97 वर्ष से लंबित मुआवजा 12 प्रतिशत ब्याज सहित जारी किया जाए। दायर केस में केंद्र सरकार, पंजाब सरकार, पंजाब के फ्रीडम फाइटर डिपार्टमैंट के सैक्रेटरी व अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर को पार्टी बनाया गया है। कहा गया है कि मुआवजे की मांग को लेकर याची प्रशासनिक स्तर पर भी अधिकारियों से मिले मगर उनकी सुनवाई नहीं हुई। जिसके चलते यह याचिका दायर की गई। केस की अगली सुनवाई जुलाई में होगी। याची ने कहा कि उसके जैसे अन्य लोग भी आवश्यक मुआवजे व लाभ न मिलने से कष्ट में हैं। याची के मुताबिक वह काफी ज्यादा उम्र के हो गए हैं और बैडरिडन हैं।मुआवजे का फैसला लिया था
याची के मुताबिक उसके दादा ईशर सिंह और गांव के 15-16 लोग जलियांवाला बाग में होने वाली सभा में भाग लेने गए थे। इस दौरान प्रमुख व्यक्तियों के भाषण के दौरान वह गोलीकांड का शिकार बने।याची के वकील ने कहा कि देश की आजादी के बाद से भारत सरकार व पंजाब सरकार स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चला रही है मगर यह क्रियान्वयन एजैंसियों की उदासीनता और नकारात्मक सोच के चलते सिरे नहीं चढ़ सकी। कहा गया कि सरकार ने जलियांवाला बाग में हुए निर्मम गोलीकांड में मारे गए लोगों के परिवार के लिए मुआवजे का फैसला लिया था। क्रियान्वयन एजेंसियों को प्रभावित लोगों के नाम और पतों की जानकारी थी। ऐसे में वह उनकी शिकायतों के निवारण और मुआवजा जारी करने के लिए बाध्य थी। वहीं प्रतिवादी पक्ष के एकतरफा रवैये के चलते मृतकों के परिवारों को कष्ट झेलना पड़ा। खुद भी रह चुके हैं स्वतंत्रता सेनानी
याची ने कहा कि वह खुद स्वतंत्रता सेनानी व पीड़ित रह चुके हैं। याची के मुताबिक वह भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 20 अक्तूबर, 1942 से 24 जुलाई, 1943 तक लाहौर जेल रह चुके हैं। मई, 2016 में याची को स्वतंत्रता सेनानी का पहचान-पत्र भी जारी हुआ था। उन्हें स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पैंशन स्कीम के तहत पैंशन मिल रही थी, हालांकि यह दिसम्बर, 2007 में वापस ले ली गई। जिसके पीछे कारण बताया गया कि याची लाहौर जेल में रहने के तथ्य को साबित नहीं कर सके।

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Web Title-The rebel of Joliwala shootout was heard again, grandson demanded compensation for Dadas death
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