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जब कावेरी पर फैसले को लेकर कर्नाटक में भड़क उठी तमिल विरोधी हिंसा !

When anti-Tamil violence erupted in Karnataka over the decision on Kaveri! - Bengaluru News in Hindi

बेंगलुरु। कावेरी नदी जल बंटवारा ब्रिटिश शासनकाल से ही कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का विषय रहा है। दक्षिण कर्नाटक के क्षेत्र मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आते थे। विशेषज्ञों की राय है कि सत्ता से निकटता के कारण तमिलनाडु को हमेशा फायदा हुआ लेकिन कर्नाटक के हितों को दरकिनार कर दिया गया। इस विवाद के परिणामस्वरूप 1991 में कर्नाटक में तमिल विरोधी हिंसा हुई, जिसमें राज्य की राजधानी बेंगलुरु और मैसूरु सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। तमिलनाडु को पानी छोड़ने के कावेरी जल न्यायाधिकरण के आदेश के बाद प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क उठी।
परिणामस्वरूप, तमिलों को बेंगलुरु और अन्य शहरों से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पुलिस फायरिंग में 16 लोग मारे गये।
आपदा के बाद तमिलनाडु को पानी छोड़े जाने के विरोध में किसानों द्वारा आत्महत्या करने की कई घटनाएं सामने आई हैं।
तमिलनाडु को पानी छोड़ने के आदेश के बाद अधिकारियों ने स्थिति पर लगाम लगा ली है और राज्य में, खासकर बेंगलुरु में कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित कर लिया है।
सूत्र बताते हैं कि जब कावेरी मुद्दे की बात आती है तो स्थिति का अनुमान लगाना कठिन है।
चूंकि बेंगलुरु को वैश्विक आईटी केंद्र के रूप में जाना जाता है, इसलिए यह सुनिश्चित करना सर्वोपरि चुनौती है कि शांति भंग न हो।
रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों राज्यों के बीच विवाद 1890 में शुरू हुआ जब तमिलनाडु ने कर्नाटक में झीलों के निर्माण और झीलों से गाद हटाने पर आपत्ति जताई।
बांधों के अभाव में तमिलनाडु कावेरी के पूरे पानी का आनंद लेता था।
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने 1990 में अपने अंतरिम आदेश में 205 टीएमसी पानी छोड़ने का आदेश दिया जिसके परिणामस्वरूप रक्तपात हुआ।
अंतिम फैसला 2007 में आया जिसमें कर्नाटक को 192 टीएमसी पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया।
कर्नाटक द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के बाद फरवरी 2018 में इसे घटाकर 177.25 टीएमसी कर दिया गया।
विशेषज्ञों की राय है कि चूंकि कर्नाटक के दावे विवेकपूर्ण थे, इसलिए छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा हर बार कम कर दी गई।
लघु सिंचाई एवं पर्यावरण विभाग के सेवानिवृत्त सचिव और जल संसाधन एवं पर्यावरण के विशेषज्ञ कैप्टन एस. राजाराम ने आईएएनएस को बताया कि कावेरी विवाद को लेकर न्यायपालिका की भूमिका और आदेशों में देरी संदिग्ध है।
कैप्टन राजा राम बताते हैं, “कावेरी ट्रिब्यूनल का गठन 2 जून 1990 को किया गया था। ट्रिब्यूनल को फैसला देने में 17 साल लग गए। आदेश 5 फरवरी 2007 को दिया गया था। आदेश को चुनौती देते हुए मामला मई 2007 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अंतिम आदेश 11 साल बाद 16 फरवरी 2018 को आया। जो मुद्दा करोड़ों किसानों से जुड़ा है उसमें इतना समय क्यों लग रहा है? क्या यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं है? क्या किसानों का मुद्दा इतना नगण्य है? यदि चुनाव, सिनेमा अभिनेताओं या राजनेताओं पर छापे से संबंधित याचिकाओं पर तत्काल ध्यान दिया जाता है। अदालतें किसानों पर ध्यान नहीं देतीं।”
राष्ट्रीय नीति में पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता है।
भारत सरकार ने नदी जल वितरण के लिए 1956 में अंतर-राज्य जल विवाद अधिनियम बनाया। इससे पहले विवादों को दीवानी मुकदमों के रूप में निपटाया जाता था।
भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा ने 1990 में एक न्यायाधिकरण का गठन करते हुए अपने फैसले में रेखांकित किया कि यह मुद्दा किसानों की शिकायतों से संबंधित है।
चार राज्यों (केंद्र शासित प्रदेश पांडिचेरी सहित) में हजारों किसान पीड़ित हैं और समाधान खोजने की जरूरत है।
कैप्टन राजा राम कहते हैं, “निर्देश के बावजूद ट्रिब्यूनल को 17 साल लग गए। राजनीतिक दल इस मुद्दे को जीवित रखना चाहते हैं।''
आंकड़ों के मुताबिक, तीनों राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में एक सामान्य वर्ष में कावेरी से 740 टीएमसी पानी उपलब्ध होता है।
कर्नाटक को 284.75 टीएमसी, तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी, पांडिचेरी को सात टीएमसी पानी इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है।
इसके अलावा, पर्यावरण संरक्षण के लिए 10 टीएमसी पानी आवंटित किया जाता है जिसे पूरे नदी में प्रवाहित करना होता है। भारी वर्षा और चक्रवात के दौरान चार टीएमसी पानी को समुद्र की ओर पलायन माना जाता है।
कर्नाटक में चार जलाशयों - केआरएस, काबिनी, हरंगी और हेमवती में 119 टीएमसी पानी जमा करने की क्षमता है।
तमिलनाडु अपने दो बांधों मेट्टूर और लोअर भवानी में 129 टीएमसी पानी जमा कर सकता है।
जलाशय उपलब्ध पानी को संग्रहित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और मेकेदातु परियोजना जिसमें 67.14 टीएमसी पानी की भंडारण क्षमता के साथ एक संतुलन जलाशय बनाया जाना है, संभावित समाधान हो सकता है क्योंकि शुष्क मौसम के दौरान, तमिलनाडु को पानी आसानी से उपलब्ध कराया जा सकता है।
हालाँकि, तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध कर रहा है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जल वितरण पूरी तरह से कानूनी मामला नहीं है। यह प्रकृति में एक तकनीकी-कानूनी मामला है और विवाद को सुलझाने के लिए कानूनी विशेषज्ञों को जल विज्ञान विशेषज्ञों से परामर्श लेना होगा।
प्रदेश में बारिश की कमी को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आ गया है।
कर्नाटक तर्क दे रहा है कि उसे पीने के लिए पानी की आवश्यकता है क्योंकि बांध सूखे हैं और तमिलनाडु पानी छोड़ने के लिए दबाव बना रहा है। गेंद अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है।(आईएएनएस)

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