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कश्मीर में घरेलू हिंसा पर मुंह नहीं खोलतीं पीडि़ताएं, इन दो महिलाओं ने उठाया बीड़ा

पंपोर। जम्मू एवं कश्मीर (Jammu and Kashmir) में जहां ताजा घटनाक्रम को लेकर तनाव का माहौल है, वहीं घरेलू हिंसा और पीडि़ता का इसे लेकर आवाज ना उठा पाना अभी भी बहुत बड़ी समस्या है। राज्य में बाकी सभी बड़ी घटनाएं बड़े राजनीतिक संघर्ष के कारण दब जाती हैं और जो कुछ भी राजनीतिक एजेंडा सांख्यिकी या अलगाववादी के अनुरूप नहीं होता, उसे कोई महत्व नहीं दिया जाता है।

इस कारण महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ती जा रही है और उन्हें समाज या मीडिया कोई महत्व नहीं दे रहा है। भारत के विभिन्न हिस्सों में जब वर्ष 2016 में महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढऩे की बात सामने आई, तो कश्मीर की दो महिलाओं मंतशा बिंती राशिद और सुबरीन मलिक ने इस बात पर विचार किया कि राज्य में जमीनी स्थिति गंभीर है और इससे निपटने के लिए कड़ी कार्रवाई की जरूरत है।

मंतशा बिंती राशिद एक स्वैच्छिक संगठन कश्मीर वुमेन कलेक्टिव (केडब्ल्यूसी) की संस्थापक सदस्य हैं। यह संगठन कश्मीरी महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा और दुव्र्यवहार के खिलाफ आवाज उठाता है। इसके अलावा, वह राज्य के उद्योग विभाग में एक नौकरशाह हैं। उन्होंने न्यूयॉर्क की स्टेट यूनिवर्सिटी में लिंग और नीति का अध्ययन किया है। उन्होंने कहा, कश्मीर में महिलाओं के लिए कुछ किए जाने की जरूरत थी।

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Web Title-Victim women do not open their mouth on domestic violence in jammu and kashmir
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