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धौलाधार की गोद से थाली तक: ‘लुंगडु’ बना सेहत, स्वाद और रोजगार का खजाना

From the Lap of the Dhauladhar to the Dining Plate: Lungdu Emerges as a Treasure Trove of Health, Flavor, and Livelihood - Kangra News in Hindi

कांगड़ा। गर्मियों के मौसम में हिमाचल प्रदेश की हरी-भरी पहाड़ियों और धौलाधार की वादियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला जंगली पौधा “लुंगडु” आज भी लोगों के जीवन, स्वास्थ्य और आजीविका से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रकृति की गोद में पनपने वाला यह पौधा केवल एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, परंपरा और खानपान की जीवंत पहचान है। हिमाचल प्रदेश में अप्रैल से सितंबर तक मिलने वाला लुंगडु अपने औषधीय गुणों, अनोखे स्वाद और पोषक तत्वों के कारण विशेष महत्व रखता है। इसे कई क्षेत्रों में “लिंगड़” तथा “खसरोड़” के नाम से भी जाना जाता है। विटामिन-ए, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स, आयरन, फोलिक एसिड और फाइबर से भरपूर यह पौधा स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है।
लुंगडु का वैज्ञानिक नाम डिप्लाजियम मैक्सिमम है। यह लंबे समय से पहाड़ी क्षेत्रों के पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहा है। इसका उपयोग सब्जी और अचार दोनों रूपों में किया जाता है। कच्चे रूप में इसमें हल्का कसैलापन होता है, जो उबालने के बाद समाप्त हो जाता है।
कांगड़ा जिला में शाहपुर क्षेत्र के धारकण्डी के करेरी, बोह तथा सल्ली सहित धौलाधार की पहाड़ियों में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। धर्मशाला, पालमपुर, बैजनाथ तथा बरोट-भंगाल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी लोग इसे बड़ी मेहनत से इकट्ठा करते हैं।
लुंगडु केवल स्वाद और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी लोगों के लिए अतिरिक्त आजीविका का भी महत्वपूर्ण साधन है।
शाहपुर के बोह की रहने वाली कांता देवी और गुडो देवी बताती हैं कि ग्रामीण परिवार सुबह-सुबह कई किलोमीटर की कठिन चढ़ाई चढ़कर इसे जंगलों से इकट्ठा करते हैं और पीठ पर ढोकर नीचे बाजारों तक पहुंचाते हैं। एक व्यक्ति प्रतिदिन 10 से 15 किलोग्राम तक लुंगडु इकट्ठा कर लेता है। इसके बाद इसे बंडलों में बांधकर बाजारों में बेचा जाता है। उन्होंने बताया कि वे अक्सर शाहपुर बाजार में आकर इसे बेचती हैं।
पहले ग्रामीण लोग इसे गांव-गांव जाकर अनाज के बदले बेचते थे, लेकिन बदलते समय के साथ अब इसकी बाजारों में अच्छी कीमत मिलने लगी है। औषधीय गुणों और बढ़ती मांग के कारण शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में लोग लुंगडु का बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसकी सब्जी और अचार बड़े चाव से खाए जाते हैं।
आज “लुंगडु का मदरा” भी कांगड़ी धाम और विभिन्न सामाजिक समारोहों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार किया गया इसका अचार भी लोगों में काफी लोकप्रिय हो रहा है।
हिमाचल की वादियों में उगने वाला “लुंगडु” सचमुच प्रकृति का ऐसा उपहार है, जो स्वाद, स्वास्थ्य, संस्कृति और आजीविका — चारों को एक साथ जोड़ता है।
प्रकृति का यह अनमोल उपहार न केवल हिमाचल की पारंपरिक विरासत को जीवित रखे हुए है, बल्कि पहाड़ी लोगों की मेहनत, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी भी बयां करता है।

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Web Title-From the Lap of the Dhauladhar to the Dining Plate: Lungdu Emerges as a Treasure Trove of Health, Flavor, and Livelihood
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