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फोरेंसिक अध्ययन पर सम्मेलन अपराध विज्ञान, कानून और मनोविज्ञान के इंटरसेक्शन पर केंद्रित

Conference on Forensic Studies focused on the intersection of Criminology, Law and Psychology - Sonipat News in Hindi

सोनीपत। अपराध अध्ययन पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा चैप्टर 25-26 मार्च को सेंटर ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फारेंसिक स्टडीज द्वारा जिंदल इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल साइंसेज, ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में आयोजित किया गया, जिसने कानून और फोरेंसिक के इंटरसेक्शन के बारे में अधिक जानने के लिए सभी पृष्ठभूमि और पेशे के उपस्थित लोगों के लिए एक अनूठा अवसर प्रदान किया। । अपराध विज्ञान, फोरेंसिक और संबंधित अपराध अध्ययनों के विभिन्न क्षेत्रों के प्रसिद्ध विशेषज्ञों ने विशेष रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उभरती अपराध घटनाओं पर नए शोध और अंतर्²ष्टि पर चर्चा की। मुख्य विषय पुनर्विचार फोरेंसिक पर केंद्रित था: अपराध अध्ययन में अंत:विषय, जहां प्रस्तुतकर्ताओं ने साक्ष्य की स्वीकार्यता, आपराधिक मनोविज्ञान और आपराधिक व्यवहार, मानवाधिकारों में फोरेंसिक, धोखाधड़ी का पता लगाने और दस्तावेज परीक्षा जैसी फोरेंसिक तकनीकों की विश्वसनीयता सहित विभिन्न विषयों को कवर किया।

दर्शकों ने पूर्ण सत्र में दो प्रख्यात वक्ताओं को सुना - इंटरनेशनल विजन यूनिवर्सिटी, नॉर्थ मैसेडोनिया से डॉ एब्रू इबिश, और पारुल विश्वविद्यालय से प्रो डॉ देबारती हलदर। जहां डॉ. हलदर ने साइबर अपराधों में अपने काम और अपराध विज्ञान, शिकार विज्ञान, मनोविज्ञान और फोरेंसिक के इंटरसेक्शन पर कानून की भूमिका के बारे में बात की, वहीं डॉ इबिश ने किशोरों की आपराधिकता को एक अलग तरह से देखा। कई शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और शिक्षकों ने भी पांच पैनल सत्रों में अपने शोध प्रस्तुत किए, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र जैसे अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ फोरेंसिक अपराध विज्ञान और कानून की बहुमुखी प्रतिभा की खोज की।

जिंदल इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल साइंसेज (जेआईबीएस) के प्रधान निदेशक डॉ संजीव पी साहनी ने कहा: "हम प्रगतिशील रूप से एक अधिक डिजिटल और वैज्ञानिक रूप से उन्नत दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं, जहां अपराध और अपराध दोनों जांच तकनीकी रूप से उन्नत हो रही है। अपराध में एक नया विशेषज्ञ, चाहे वह फोरेंसिक वैज्ञानिक हो या क्रिमिनोलॉजिस्ट या फोरेंसिक मनोवैज्ञानिक, अब अपने अनुशासन के दायरे में काम नहीं कर सकते। एक फोरेंसिक वैज्ञानिक को साक्ष्य कानून और संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों के बारे में समझने की जरूरत है, और एक अपराधी को संज्ञानात्मक मनोविज्ञान और डिजिटल विज्ञान और क्रिप्टोकरेंसी घोटाले को समझने की जरूरत है। इन विषयों में एक सफल करियर के लिए आवश्यक है कि आप विभिन्न प्रकार के ज्ञान के आधार पर आवेदन और विश्लेषण करने में सक्षम हों। यही कारण है कि हम इस तरह के ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक मंच प्रदान करने के इच्छुक हैं।"

डॉ साहनी एक प्रख्यात व्यवहार विशेषज्ञ हैं जो ओपी, जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी हैं और सेंटर फॉर क्रिमिनोलॉजी एंड फोरेंसिक स्टडीज के निदेशक हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते एक वित्तीय घोटाले के मामले पर सुनवाई करते हुए देश में फोरेंसिक सुविधाओं की कमी पर खेद व्यक्त किया था जो आपराधिक न्याय प्रणाली में बैक लॉग का कारण बन रहा है। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एम.एम. सुरेश ने एक समस्या पर प्रकाश डाला है जिसे पहले भी संसाधनों और कर्मियों की कमी के संदर्भ में चिह्न्ति किया गया है। यह उन कुछ कारणों में से एक है जिसके कारण भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के भीतर आपराधिक न्यायनिर्णयन में फोरेंसिक साक्ष्य का मुख्य रूप से उपयोग किया जाना बाकी है। जहां कानून और फोरेंसिक विज्ञान दोनों का उद्देश्य सच्चाई तक पहुंचना है, वहां संसाधनों की कमी, खराब गेटकीपिंग या नई अपराध तकनीकों को बनाए रखने के लिए अनुसंधान की कमी के कारण न्याय को रोका नहीं जा सकता है।

सेंटर फॉर क्रिमिनोलॉजी एंड फोरेंसिक स्टडीज के सहायक निदेशक और फोरेंसिक और अपराध अध्ययन के सहायक प्रोफेसर प्रो. पौलोमी भद्र ने यह भी कहा कि 'कानूनी पेशा अभी भी फोरेंसिक विज्ञान में वैज्ञानिक साक्षरता को पकड़ रहा है, इस बीच अपराध के रुझान बदल रहे हैं और नया अपराधी तेजी से तकनीक-प्रेमी होता जा रहा है। यदि हमें न्याय प्रणाली के भीतर की खाई को पाटना और अपराध को दूर करना है, तो कानूनी और वैज्ञानिक पेशेवरों के बीच अंत:विषय समझ में सुधार करने की सख्त आवश्यकता है। हमें प्रत्येक की ताकत और कमियों को समझने की जरूरत है।

--आईएएनएस

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