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जब न्याय के प्रहरी ही अपराधी बन जाएँ, तो कानून की आस्था कैसे बचे?

When the guardians of justice themselves become criminals, how can the faith in the law be preserved? - Hisar News in Hindi

भारतीय न्याय व्यवस्था की नींव सत्य और न्याय पर आधारित है। न्यायालय को हमेशा से समाज का सबसे बड़ा सहारा माना जाता रहा है। जब अन्याय पीड़ित व्यक्ति हर दरवाज़े पर ठोकर खाकर थक जाता है, तब उसे अदालत से ही उम्मीद रहती है। लेकिन यह उम्मीद तब कमजोर पड़ जाती है जब न्याय का सहारा बनने वाले लोग ही उसे अपने स्वार्थ और लालच का साधन बना लेते हैं। हाल ही में लखनऊ की अदालत ने एक वकील परमानंद गुप्ता को 29 झूठे मुकदमे दर्ज कराने के अपराध में उम्रकैद और पाँच लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई। यह फैसला एक उदाहरण है कि न्यायपालिका कानून का दुरुपयोग करने वालों को बख्शेगी नहीं। यह केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं है, बल्कि पूरे समाज और न्यायिक व्यवस्था के लिए चेतावनी है कि कानून का मज़ाक उड़ाने वालों की कोई जगह नहीं। वकील पेशे को समाज में हमेशा सम्मानित दृष्टि से देखा जाता है। वकील को केवल मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि न्यायालय का अधिकारी भी माना जाता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह सत्य और न्याय के लिए संघर्ष करेगा। लेकिन जब वही वकील झूठे मुकदमों का निर्माण करने लगे, निर्दोषों को फँसाने लगे, और अपने पेशे का इस्तेमाल व्यक्तिगत दुश्मनी या आर्थिक लाभ के लिए करने लगे, तो यह न केवल उसकी आचार संहिता का उल्लंघन है बल्कि पूरे पेशे की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न है। एक वकील जो अदालत में सत्य का पक्षधर होना चाहिए, अगर असत्य का सबसे बड़ा हथियार बन जाए तो समाज में न्याय की कोई गारंटी नहीं रह जाती।
झूठे मुकदमों का असर केवल आरोपित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह उसके परिवार, उसकी सामाजिक स्थिति और उसकी आर्थिक स्थिति तक को झकझोर देता है। वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, बेगुनाही साबित करने के लिए सबूत जुटाने पड़ते हैं और मानसिक यातना अलग से झेलनी पड़ती है। समाज भी ऐसे व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। इससे उसका आत्मविश्वास टूट जाता है और धीरे-धीरे कानून और अदालत पर से विश्वास उठने लगता है। यही सबसे बड़ा नुकसान है, क्योंकि न्याय पर से भरोसा खत्म होना किसी भी समाज के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।
झूठे मुकदमों की समस्या यह भी है कि यह असली पीड़ितों के मामलों को कमजोर करती है। जब कोई कानून, जैसे एससी-एसटी एक्ट, जिसका उद्देश्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना है, झूठे मुकदमों में इस्तेमाल किया जाता है तो वास्तविक पीड़ितों की आवाज़ दब जाती है। अदालतों को यह तय करने में अधिक समय लग जाता है कि कौन-सा मामला सच है और कौन-सा झूठा। नतीजा यह होता है कि असली पीड़ितों को न्याय मिलने में देर होती है और उनका दर्द बढ़ जाता है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि झूठे मुकदमे गढ़ने वाले और उन्हें अदालत में आगे बढ़ाने वाले वकीलों पर कठोरतम कार्रवाई हो। यदि कोई डॉक्टर लापरवाही करता है, तो उस पर केस चलता है। यदि कोई इंजीनियर खराब निर्माण करता है तो उसे दंडित किया जाता है। तो फिर वकील, जो न्याय के प्रहरी हैं, यदि झूठे मुकदमों का व्यापार करें, तो उन्हें भी आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और न्याय में बाधा डालने जैसी धाराओं में दंडित किया जाना चाहिए। उनकी प्रैक्टिस पर रोक लगनी चाहिए और बार काउंसिल को उनके लाइसेंस रद्द करने चाहिए।
यह केवल कानून की सख्ती का मामला नहीं है, बल्कि वकालत के पेशे की मर्यादा का प्रश्न है। जब तक झूठे मुकदमों के निर्माण और संचालन में शामिल वकीलों पर मुकदमे नहीं चलेंगे, तब तक यह कुप्रथा बंद नहीं होगी। अदालतें जितनी कठोर सज़ा देंगी, उतना ही यह संदेश समाज में जाएगा कि कानून का दुरुपयोग करने वालों की कोई जगह नहीं। न्याय व्यवस्था को बचाने के लिए आवश्यक है कि कानून में ऐसे प्रावधान हों जिससे झूठे मुकदमों की पहचान होने पर तुरंत कार्रवाई हो।
वकीलों की जवाबदेही तय करनी होगी। अगर यह साबित हो कि किसी वकील ने जानबूझकर मुवक्किल को झूठे मुकदमे के लिए उकसाया, तो उस पर केवल पेशेवर कार्रवाई न हो बल्कि आपराधिक मुकदमा भी दर्ज हो। इस कदम से न केवल निर्दोष लोगों की रक्षा होगी बल्कि वकालत का पेशा भी अपने वास्तविक उद्देश्य – न्याय की सेवा – के लिए जाना जाएगा। आज लखनऊ की अदालत का फैसला पूरे देश के लिए मिसाल है। इसने साबित किया है कि न्यायालय केवल आरोपी और अपराधी के बीच निर्णय करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की पवित्रता को भी सुरक्षित रखने वाला प्रहरी है।
यदि वकील अपने कर्तव्य से भटकेंगे, तो वे भी अपराधी की श्रेणी में आएँगे और उन्हें उसी प्रकार दंड मिलेगा जैसे अन्य अपराधियों को मिलता है। अब समय आ गया है कि समाज और न्यायपालिका दोनों मिलकर वकालत के पेशे को अपराध का साधन बनने से बचाएँ। बार काउंसिल ऑफ इंडिया को चाहिए कि वह वकीलों के लिए कठोर आचार संहिता लागू करे और झूठे मुकदमों में लिप्त पाए जाने पर तत्काल लाइसेंस रद्द करे। अदालतों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों की सुनवाई तेज़ी से पूरी करें ताकि न्याय केवल होता हुआ नज़र ही न आए बल्कि सही समय पर मिले भी।
वकीलों को भी आत्ममंथन करना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि उनका पहला कर्तव्य केवल मुवक्किल की जीत नहीं बल्कि न्याय की जीत है। यदि इस सोच को अपनाया जाए तो न्यायालय में पेश होने वाला हर वकील समाज की नज़रों में वास्तविक प्रहरी होगा, न कि अपराध का भागीदार। न्याय केवल कागज़ों पर लिखा शब्द नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था है। और यह आस्था तभी बनी रहेगी जब न्याय के रक्षक भी पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। झूठे मुकदमों से केवल अदालतों का बोझ नहीं बढ़ता बल्कि समाज का विश्वास भी टूटता है।
निर्दोष लोग जब सालों तक जेलों में सड़ते हैं, तब उनके परिवार बर्बाद हो जाते हैं। उनकी मासूम ज़िंदगियाँ खत्म हो जाती हैं। ऐसे समय में अदालतों से सख्त और स्पष्ट संदेश मिलना ही समाज को यह विश्वास दिलाता है कि न्याय जीवित है और उसकी रक्षा की जा रही है। लखनऊ का फैसला इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल एक अपराधी वकील को दंडित करने का मामला है बल्कि पूरे देश को यह चेतावनी है कि झूठे मुकदमे गढ़ने और चलाने वालों के लिए अब जगह नहीं बची है। यह संदेश हर उस वकील को याद दिलाना चाहिए जो कभी भी असत्य के रास्ते पर जाने का प्रयास करेगा।
कानून और अदालत किसी के भी दबाव या छलावे में नहीं आने वाले। इसलिए ज़रूरी है कि इस फैसले को समाज एक आदर्श की तरह देखे और इसे पूरे देश में लागू करने की कोशिश की जाए। वकीलों को भी चाहिए कि वे इस घटना से सीख लें और यह संकल्प लें कि वे अपने पेशे की गरिमा को कभी धूमिल नहीं होने देंगे। तभी न्याय वास्तव में न्याय कहलाएगा और अदालतें आम आदमी के लिए भरोसे का सबसे बड़ा आधार बन सकेंगी।

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