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भारतीय विज्ञान में महिलाओं की अधूरी यात्राः प्रतीकात्मक उपस्थिति से प्रभावी नेतृत्व तक पहुँचने की जद्दोजहद

The unfinished journey of women in Indian science: The struggle from symbolic presence to effective leadership - Hisar News in Hindi

भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बीते कुछ दशकों में उल्लेखनीय प्रगति की है। अंतरिक्ष कार्यक्रम, जैव प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नैनो प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों की पहचान आज विश्व स्तर पर बनी है। इस यात्रा में महिलाओं की भागीदारी केवल औपचारिकता भर नहीं रही बल्कि ठोस और प्रभावी साबित हुई है। डॉ. टेसी थॉमस, जिन्हें मिसाइल महिला कहा जाता है, या चंद्रयान-3 मिशन की महिला वैज्ञानिकों कल्पना कलहस्ती और ऋतु करिधल का योगदान इसका जीवंत उदाहरण है। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय महिला वैज्ञानिकों की भूमिका अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रही, वे वास्तविक परिवर्तन की धुरी बन चुकी हैं। फिर भी तस्वीर का दूसरा पहलू चिंता पैदा करता है। भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की पढ़ाई करने वाली लड़कियों की संख्या बड़ी है, परंतु शोध और नेतृत्व के पदों तक पहुँचते पहुँचते यह संख्या लगातार घटती जाती है। इस प्रवृत्ति को ही ‘लीकी पाइपलाइन’ कहा जाता है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि स्नातक स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की भागीदारी लगभग तैंतालीस प्रतिशत है। यह आँकड़ा किसी भी देश के लिए गौरवपूर्ण हो सकता है। लेकिन जब यही लड़कियाँ आगे शोध और अनुसंधान के मार्ग पर बढ़ती हैं तो मात्र चौदह प्रतिशत ही इस क्षेत्र में टिक पाती हैं। यही नहीं, उच्च शिक्षा संस्थानों में महिला संकाय की संख्या लगभग पंद्रह प्रतिशत तक सीमित है। देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जैसे आईआईटी, आईआईएससी या सीएसआईआर अब तक किसी महिला के नेतृत्व में नहीं रहे।
वैज्ञानिक पुरस्कारों और मान्यताओं की दुनिया में भी असमानता साफ दिखती है। वर्ष 2023 तक दिए गए छह सौ से अधिक शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कारों में केवल सोलह ही महिला वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया। यह आँकड़े बताते हैं कि प्रारंभिक स्तर पर भले ही महिलाएँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में समान उत्साह के साथ प्रवेश करती हैं, लेकिन जैसे-जैसे ज़िम्मेदारियाँ और दबाव बढ़ते हैं, वैसे-वैसे उनकी संख्या कम होती जाती है। यही वह रिसाव है जो राष्ट्रीय उत्कृष्टता को कमजोर करता है। इस रिसाव की कई परतें हैं।
मातृत्व और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ महिलाओं के कॅरियर को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। लंबे कार्य घंटे, उच्च दबाव वाले प्रोजेक्ट और लचीले विकल्पों की कमी के कारण बहुत सी प्रतिभाशाली महिलाएँ बीच रास्ते से बाहर हो जाती हैं। संस्थागत ढाँचे में भी पुरुष वर्चस्व कायम है। विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में पदोन्नति और नेतृत्व पदों पर जाने का मार्ग महिलाओं के लिए कठिन है। अनौपचारिक नेटवर्क, सामाजिक पूर्वाग्रह और लैंगिक धारणाएँ इस कठिनाई को और गहरा करती हैं।
वित्तपोषण और मान्यता का संकट भी कम नहीं है। शोध अनुदान में महिलाओं को कम प्राथमिकता दी जाती है। यह उनकी परियोजनाओं की दिशा और नवाचार की संभावनाओं को सीमित करता है। सामाजिक दृष्टिकोण भी विज्ञान को पुरुष प्रधान क्षेत्र मानता है, जिससे परिवार और समाज अक्सर लड़कियों को इस ओर बढ़ने से हतोत्साहित करते हैं। यदि कोई महिला कॅरियर ब्रेक ले भी ले तो पुनः-प्रवेश बेहद कठिन हो जाता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की महिला वैज्ञानिक योजना अवश्य मौजूद है, परंतु उसकी पहुँच अभी बहुत सीमित है।
यह समस्या केवल महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियों की बाधा नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य से भी गहराई से जुड़ी है। जब भारत विकसित भारत के सपने को पूरा करने का संकल्प ले रहा है, तब वैज्ञानिक नवाचार और शोध में आधी आबादी की भागीदारी को नज़रअंदाज़ करना आत्मघाती साबित हो सकता है। विश्व बैंक का अनुमान है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से 2025 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को सात सौ अरब डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि मिल सकती है। यदि महिलाएँ बराबरी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में योगदान करेंगी तो भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा स्वतः बढ़ेगी। इसके साथ ही यह भारत की वैश्विक छवि का भी सवाल है।
लैंगिक समानता की दिशा में ठोस कदम भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और नेतृत्व की आकांक्षाओं के अनुरूप हैं। जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर जब भारतीय महिला वैज्ञानिक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलती हैं तो वह भारत की विश्वसनीयता का प्रतीक बन जाता है। इससे भी आगे, यह आने वाली पीढ़ियों की आकांक्षा का प्रश्न है। अगर आज हम विज्ञान में महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करते हैं, तो कल हमारी बेटियाँ आत्मविश्वास से भरी होंगी और विज्ञान को अपनी पसंद का क्षेत्र मानेंगी। सरकार ने कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की किरण योजना, महिला वैज्ञानिक योजना, एसईआरबी पॉवर फेलोशिप जैसी पहलें युवा महिला शोधार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई हैं। इसरो और डीआरडीओ ने लचीले कार्य समय, विस्तारित मातृत्व अवकाश और घर से काम करने जैसे विकल्प लागू किए हैं। कई संस्थानों में लैंगिक संवेदनशीलता समितियाँ भी गठित की गई हैं। लेकिन यह सब अभी भी अपर्याप्त है। आवश्यकता है कि इन योजनाओं की पहुँच को बढ़ाया जाए और उन्हें प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
आगे की राह यह है कि अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों में महिलाओं के लिए न्यूनतम प्रतिनिधित्व की सीमा तय की जाए। महिला नेतृत्व वाली परियोजनाओं के लिए विशेष वित्तपोषण सुनिश्चित हो। कॅरियर ब्रेक के बाद पुनः-प्रवेश को आसान बनाया जाए और अधिक संख्या में पुनः-प्रवेश फेलोशिप दी जाए। वरिष्ठ महिला वैज्ञानिकों और नई शोधार्थिनियों के बीच मार्गदर्शन का सेतु तैयार किया जाए। सबसे बढ़कर, समाज की मानसिकता बदली जाए। परिवार और समाज को यह स्वीकार करना होगा कि विज्ञान पुरुषों का नहीं, बल्कि सभी का क्षेत्र है।
भारतीय विज्ञान में महिलाओं की यात्रा प्रतीकात्मक उपस्थिति से आगे बढ़ चुकी है, लेकिन नेतृत्व तक पहुँचने में अब भी कई बाधाएँ मौजूद हैं। यह बाधाएँ केवल व्यक्तिगत हानि नहीं बल्कि राष्ट्रीय हानि भी हैं। अगर भारत को ज्ञान शक्ति बनना है, तो इस रिसाव को रोकना ही होगा। वास्तविक नवाचार और उत्कृष्टता तभी संभव है जब प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में पुरुष और महिलाएँ बराबरी से कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों। यह केवल समान अवसर का सवाल नहीं है, बल्कि भारत के वैज्ञानिक भविष्य और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का भी प्रश्न है।

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Web Title-The unfinished journey of women in Indian science: The struggle from symbolic presence to effective leadership
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