चंडीगढ़। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह भारत की आत्मा, धड़कन और पहचान है। मुख्यमंत्री शुक्रवार को मां अम्बा की पावन धरती अम्बाला में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में उपस्थित जनसमूह को संबोधित कर रहे थे।
राज्य स्तरीय कार्यक्रम के दौरान नई दिल्ली में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित मुख्य उद्घाटन समारोह का सीधा प्रसारण भी दिखाया गया। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में वंदे मातरम् की अमर भावना को नमन किया। उन्होंने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में वर्ष भर चलने वाले समारोह का शुभारंभ किया तथा स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया।
इससे पहले मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्रदेश वासियों को ‘वंदे मातरम्’ गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर हार्दिक बधाई देते हुए उपस्थित जनसमूह को ‘स्वदेशी संकल्प’ भी दिलाया, साथ ही सूचना जनसम्पर्क एवं भाषा विभाग द्वारा वंदे मातरम् की गौरव गाथा को प्रदर्शित करने वाली लगाई गई प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
‘वंदे मातरम्’ भारत की आत्मा है : मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह भारत के स्वराज्य आंदोलन की चेतना का उदगार है। इस गीत ने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतवासियों में आत्मबल, अनुशासन और त्याग की भावना जगाई थी। उन्होंने कहा कि यह गीत वह दिव्य शक्ति है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था और युवाओं के भीतर क्रांति की ज्योति प्रज्वलित की। अंग्रेज़ इस गीत से डरते थे क्योंकि इसमें हथियारों से करोड़ गुना अधिक शक्ति थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ गीत हमारी नदियों की कल-कल, खेतों की हरियाली और धरती के गौरव की गूंज है। यह शिवरात्रि की तपस्या में, वैसाखी के उल्लास में, होली के रंगों में और दीपावली के दीपों में रचा-बसा है। यह गीत हमारी एकता का अमृत मंत्र है।
150 वर्ष की राष्ट्रीय चेतना की यात्रा
मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ का रचना वर्ष 1875 में श्री बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। वर्ष 1896 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे कोलकाता में सार्वजनिक रूप से वाचन किया था। 1905 में बंगाल विभाजन आंदोलन के दौरान यह गीत राग देश मल्हार में स्वरबद्ध होकर आंदोलन का प्रेरणास्रोत बना। ब्रिटिश शासन के खिलाफ यह गीत राष्ट्रवाद और एकता का प्रतीक बन गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि इसकी शक्ति इतनी प्रबल थी कि ब्रिटिश सरकार ने इसके गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस गीत ने भारत के हर वर्ग, हर धर्म और हर क्षेत्र के लोगों को एक सूत्र में बाँधकर आज़ादी के आंदोलन को गति दी।
वीर सपूतों की स्मृति में अम्बाला छावनी में शहीदी स्मारक का निर्माण किया
मुख्यमंत्री ने कहा कि इतिहास गवाह है, सन् 1857 में स्वतंत्रता संग्राम की पहली चिंगारी अम्बाला की पवित्र भूमि से ही उठी थी। यह वही धरती है जिसने वीरता को न केवल लिखा बल्कि जिया भी है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने इन वीर सपूतों की स्मृति में अम्बाला छावनी में शहीदी स्मारक का निर्माण किया है।
‘वंदे मातरम्’ पर आपत्ति करने वाले भारत की आत्मा को नहीं समझते
मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ लोग ‘वंदे मातरम्’ पर आपत्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि यह लोग भारत की संस्कृति, आत्मा और राष्ट्रीय गर्व को नहीं समझते। उन्होंने बताया कि 1923 में काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर को ‘वंदे मातरम्’ गाने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन, उस वर्ष कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने धार्मिक आधार पर आपत्ति जताई और कहा कि इस्लाम में संगीत वर्जित है। बाद में 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने मुस्लिम लीग नेताओं को खुश करने के लिए राष्ट्रीय गीत बदलने का निर्णय लिया। बाद में भी कांग्रेस और उसके नेताओं ने कई बार ‘वंदे मातरम्’ के प्रति असहमति दिखाई।
ए.आई.एम.आई.एम. नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने वर्ष 2017 में मांग की थी कि स्कूलों में छात्रों के लिए ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य करने वाले सर्कुलर को रद्द किया जाए। हाल ही में,तेलंगाना में भी कांग्रेस सरकार ने कहा है कि स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य नहीं किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि इसी तरह वर्ष 2019 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार ने सचिवालय में ‘वंदे मातरम्’ गायन पर प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ कोई विवाद नहीं, बल्कि यह मां भारती का प्रसाद है। यह तुष्टिकरण नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर चलने वालों का गीत है।
एक गीत जिसने जगाया देश का स्वाभिमान
मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ ने भारत के सोये स्वाभिमान को जगाया और आज़ादी के आंदोलन को जन-आंदोलन में बदल दिया। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे असंख्य वीरों ने इस गीत को गाते हुए प्राणों की आहुति दी। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल की यातनाएँ सहते हुए ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष किया और आज़ादी का कारवाँ आगे बढ़ता गया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि में यही गीत देशभक्ति और स्वाधीनता का मूल मंत्र बना। ‘वंदे मातरम्’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘जय हिंद’ के नारों ने अंग्रेज़ी हुकूमत को झकझोर दिया, और आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ।
हमें ‘वंदे मातरम्’ की ज्योति सदैव प्रज्वलित रखनी है
मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वर्ष 1950 में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक अपनी मातृभूमि से कितना प्रेम करते हैं। आज भी ‘वंदे मातरम्’ की भावना उतनी ही प्रासंगिक है जितनी स्वतंत्रता आंदोलन के समय थी। देश की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए हमें ‘वंदे मातरम्’ की ज्योति सदैव प्रज्वलित रखनी है।
मुख्यमंत्री ने नागरिकों से पांच संकल्प लेने का आह्वान किया
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने उपस्थित जनसमूह को पाँच संकल्प लेने की अपील की। इनमें भारत प्रथम यानि हर कार्य में राष्ट्र सर्वोपरि है। इसी प्रकार तुष्टिकरण नहीं के जरिये समग्र एवं संतुलित विकास का मार्ग अपनाने का आह्वान किया। साथ ही तीसरे संकल्प के तहत मुख्यमंत्री ने कहा कि अंतिम व्यक्ति तक न्याय व अवसर, सम्मान यानि समाज के हर वर्ग को समान सम्मान मिले। वहीं, स्वदेशी और नवाचार के आह्वान के रूप में आत्मनिर्भरता की तेज यात्रा का चौथा संकल्प तथा साथ ही पांचवे संकल्प के रूप में राष्ट्र विरोधी शक्तियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की बात कही।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब ये पाँच संकल्प हर नागरिक के जीवन में उतरेंगे, तभी ‘वंदे मातरम्’ की 150 वर्ष की यात्रा पूर्ण सार्थक होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए हर नागरिक को एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए।
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