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SYL पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पंजाब-हरियाणा के रुख में अभी भी नहीं आया बदलाव

Supreme Courts comment on SYL, Punjab-Haryana stand still unchanged - Chandigarh News in Hindi

खास खबर। चंडीगढ़ सतलुज-यमुना लिंक नहर यानी एसवाईएल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी ने एक बार फिर इस पुराने विवाद को चर्चा में ला दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “जब दिल खुलता है तो दरवाजा भी खुलता है।” यह टिप्पणी उस समय की गई जब अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पीठ को बताया कि पंजाब और हरियाणा अब “एक साथ आवाज उठा रहे हैं” और पिछली बार की तुलना में दोनों राज्यों ने अपने दिल ज्यादा खोले हैं।
हालांकि, करीब 30 साल पुराने इस विवाद में मौजूदा बातचीत को बड़ी प्रगति मानना अभी जल्दबाजी होगी। हरियाणा ने एसवाईएल नहर को पूरा कराने की मांग को लेकर वर्ष 1996 में मुकदमा दायर किया था। इसके बाद से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग चरणों में चलता रहा है।
हरियाणा के पक्ष में क्या हैः
वर्ष 1955 में जल बंटवारे के तहत राजस्थान को 8 मिलियन एकड़ फीट पानी आवंटित किया गया था, जबकि अविभाजित पंजाब के हिस्से में 7.2 मिलियन एकड़ फीट पानी आया था। वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद केंद्र ने इसी हिस्से में से हरियाणा को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी देने का निर्णय किया। बाद में एराडी न्यायाधिकरण ने हरियाणा के हिस्से को 3.83 मिलियन एकड़ फीट, पंजाब के हिस्से को 5 मिलियन एकड़ फीट तय किया और एसवाईएल नहर को जरूरी बताया।
हरियाणा का कहना है कि उसने अपने हिस्से में आने वाली करीब 92 किलोमीटर नहर का निर्माण कर लिया है, लेकिन उसे अपने हिस्से का पूरा पानी नहीं मिल रहा। हरियाणा के अनुसार उसे करीब 1.62 मिलियन एकड़ फीट पानी ही मिल रहा है और करीब 1.88 मिलियन एकड़ फीट पानी हर साल कम मिल रहा है। दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़, रेवाड़ी और झज्जर जिलों में करीब तीन लाख हेक्टेयर जमीन सिंचाई के अभाव में प्रभावित हो रही है।
एसवाईएल मामले में सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2002, 2004 और 2017 में महत्वपूर्ण आदेश दे चुका है। अदालत ने कहा था कि पंजाब एकतरफा तरीके से जल समझौते को समाप्त नहीं कर सकता। पंजाब के वर्ष 2004 के जल समझौता समाप्ति कानून को भी सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया था।
पंजाब का पानी देने से इनकार करने के पीछे तर्कः
पंजाब की सबसे बड़ी आपत्ति वर्ष 1955 में हुए जल आवंटन को लेकर है। पंजाब का सवाल है कि राजस्थान गैर-तटीय राज्य होने के बावजूद उसे 8 मिलियन एकड़ फीट पानी कैसे दिया गया, जबकि अविभाजित पंजाब के हिस्से में 7.2 मिलियन एकड़ फीट पानी आया। पंजाब का कहना है कि 1955 में रावी-ब्यास नदियों के पानी का आकलन करीब 15.85 मिलियन एकड़ फीट था, लेकिन अब नदियों में पानी का प्रवाह काफी कम हो चुका है। इसके साथ ही पंजाब में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और धान की खेती के कारण पानी की समस्या और गंभीर हुई है।
पंजाब का तर्क है कि एसवाईएल नहर का निर्माण कर दिया गया तो यह स्थायी व्यवस्था बन जाएगी। एसवाईएल विवाद का पंजाब में राजनीतिक और भावनात्मक इतिहास भी रहा है। वर्ष 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूर्री में एसवाईएल नहर की आधारशिला रखी थी। इसके बाद अकाली दल ने आंदोलन शुरू किया। बाद के वर्षों में उग्रवाद के दौर में नहर निर्माण से जुड़े मजदूरों की हत्याएं भी हुईं। वर्ष 2004 में पंजाब सरकार ने जल समझौतों को समाप्त करने के लिए कानून बनाया और वर्ष 2016 में नहर के लिए अधिग्रहित जमीन को वापस करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
2027 के विधानसभा चुनाव का भी असरः
पंजाब में वर्ष 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल हरियाणा को पानी देने के समझौते के साथ जनता के बीच जाने का जोखिम नहीं लेना चाहता। जनवरी 2026 में हुई बैठक में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी कहा था कि “जूस नहीं बहेगा, पानी बहेगा। जब तक पानी का मुद्दा हल नहीं होता, नहर बनाने का कोई मतलब नहीं है।”
बातचीत में प्रगति, लेकिन मूल विवाद जस का तसः
मौजूदा घटनाक्रम को फिलहाल प्रक्रियात्मक प्रगति कहा जा सकता है, लेकिन इसे विवाद के समाधान की दिशा में ठोस प्रगति नहीं माना जा सकता। जनवरी 2026 में दोनों राज्यों ने अधिकारियों को महीने में तीन से चार बार बैठक करने पर सहमति जताई थी। पहले दोनों राज्य सुप्रीम कोर्ट की तारीख का इंतजार करते थे। केंद्र सरकार इन बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रही है। इसी को अटॉर्नी जनरल ने दोनों राज्यों के “एक साथ आवाज उठाने” के रूप में अदालत के सामने रखा। लेकिन दोनों राज्यों के मूल रुख में अभी कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
हरियाणा पहले नहर का निर्माण पूरा कराने और उसके बाद पानी मिलने की बात कर रहा है, जबकि पंजाब पहले पानी की उपलब्धता का नए सिरे से आकलन कराने और उसके बाद नहर के मुद्दे पर आगे बढ़ने की बात कह रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की “दिल खुलने” वाली टिप्पणी को दोनों राज्यों को बातचीत के लिए प्रोत्साहित करने की न्यायिक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि दोनों राज्य आपसी सहमति से समाधान की दिशा में आगे बढ़ें, ताकि अदालत को ऐसा आदेश जारी करने की स्थिति में न आना पड़े जिसे लागू कराने में कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है। फिलहाल ऐसा लगता है कि चुनाव तक दोनों राज्यों के बीच “संयुक्त आवाज” और “आपसी सहमति से समाधान” जैसे बयान ज्यादा सुनाई देंगे, लेकिन पंजाब में एसवाईएल के करीब 122 किलोमीटर हिस्से पर तत्काल निर्माण शुरू होने की संभावना कम है।
चुनाव के बाद केंद्र सरकार को पानी के नए आकलन के लिए नए न्यायाधिकरण या किसी अन्य व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ना पड़ सकता है। इससे पंजाब यह कह सकता है कि उसने अतिरिक्त पानी नहीं दिया बल्कि पानी का दोबारा आकलन कराया गया, जबकि हरियाणा इसे एसवाईएल के अपने अधिकार की स्वीकार्यता के रूप में पेश कर सकता है।

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