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नर्सरी से कॉलेज तकः दाख़िले की दौड़ में बच्चों पर बढ़ता दबाव और प्रतिस्पर्धा

From Nursery to College: Increasing Pressure and Competition on Children in the Admission Race - Bhiwani News in Hindi

ज शिक्षा का अर्थ सीखना नहीं, बल्कि साबित करना हो गया है। साबित करना कि बच्चा बेहतर है, तेज़ है, दूसरों से आगे है। और यह साबित करने की ज़िम्मेदारी बच्चे से ज़्यादा उसके माता-पिता के कंधों पर डाल दी गई है। नतीजा यह है कि नर्सरी से लेकर विश्वविद्यालय तक, ‘दाख़िला’ अब एक सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानसिक, आर्थिक और सामाजिक तनाव का कारण बन चुका है। दाख़िले की इस दौड़ में सबसे पहले निशाने पर आता है मासूम बच्चा। वह उम्र, जब खेलना, कल्पना करना और सवाल पूछना चाहिए, उसी उम्र में उसे फ़ॉर्म, इंटरव्यू, टेस्ट और रैंक के बोझ तले दबा दिया जाता है। नर्सरी एडमिशन के नाम पर माता-पिता छुट्टियाँ लेते हैं, स्कूल-दर-स्कूल भटकते हैं, सिफ़ारिशें ढूँढते हैं और कई बार आत्मसम्मान तक गिरवी रख देते हैं। यह सब इसलिए नहीं कि बच्चा सीख सके, बल्कि इसलिए कि वह ‘अच्छे स्कूल’ का टैग हासिल कर सके। आज शिक्षा संस्थान ज्ञान के मंदिर कम और प्रतिस्पर्धी बाज़ार ज़्यादा बनते जा रहे हैं। अख़बारों में ‘मिशन एडमिशन’ जैसे शब्द आम हो चुके हैं। टीवी चैनलों पर दाख़िले को लेकर बहसें होती हैं, कोचिंग संस्थान भविष्य की गारंटी बेचते हैं और स्कूल-कॉलेज अपनी ब्रांड वैल्यू चमकाने में लगे रहते हैं। इस पूरे तंत्र में बच्चा एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रोजेक्ट बन जाता है—जिसे हर हाल में सफल दिखाना ज़रूरी है। कभी 60–65 प्रतिशत अंक लाना सम्मान की बात हुआ करती थी। सेकंड डिविज़न जीवन की हार नहीं मानी जाती थी।
आज हालात यह हैं कि 90 प्रतिशत से नीचे अंक लाने वाला बच्चा और उसके माता-पिता अपराधबोध में जीते हैं। 95–96 प्रतिशत अंक लाने वालों को भी चैन नहीं है, क्योंकि कट-ऑफ़ हर साल नई ऊँचाई छू रहा है। ऐसा लगता है मानो अंकों की इस दौड़ का कोई अंत ही नहीं। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब ज़्यादातर बच्चे 90 प्रतिशत से ऊपर अंक ला रहे हैं, तो क्या वास्तव में सब असाधारण प्रतिभाशाली हैं? या फिर मूल्यांकन प्रणाली ही अपना संतुलन खो चुकी है?
शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करना था, लेकिन वह अब अंकों और रैंक के गणित में सिमट कर रह गया है। ज्ञान से ज़्यादा प्रदर्शन मायने रखता है, और प्रदर्शन से ज़्यादा उसका प्रचार। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे भयावह पहलू है बच्चों पर पड़ने वाला मानसिक दबाव। परीक्षा, इंटरव्यू और चयन की अनिश्चितता बच्चे के भीतर डर और असुरक्षा पैदा करती है। असफलता की स्थिति में पहला सवाल यही होता है—“अब क्या होगा?”
यह सवाल सिर्फ़ भविष्य का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का भी होता है। बच्चा यह मानने लगता है कि उसकी असफलता उसके माता-पिता की हार है। यह भाव उसके आत्मविश्वास को गहरे तक चोट पहुँचाता है। विडंबना यह है कि माता-पिता भी इस दबाव के शिकार हैं। समाज ने उनके सामने सफलता की एक संकीर्ण परिभाषा रख दी है—टॉप स्कूल, टॉप कॉलेज और टॉप करियर। वे यह सोचने से डरते हैं कि अगर उनका बच्चा इस तय ढाँचे में फिट नहीं हुआ, तो लोग क्या कहेंगे। परिणामस्वरूप वे बच्चे की रुचि, क्षमता और स्वभाव को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त असमानता इस समस्या को और गंभीर बना देती है। जिनके पास संसाधन हैं, वे महँगी कोचिंग, प्राइवेट स्कूल और मैनेजमेंट कोटा खरीद सकते हैं। लेकिन मध्यम और निम्न वर्ग के बच्चों के लिए यह दौड़ कहीं ज़्यादा कठिन है। योग्यता के बावजूद अवसर न मिलना, व्यवस्था पर से भरोसा तोड़ देता है। धीरे-धीरे शिक्षा सामाजिक न्याय का माध्यम न रहकर विशेषाधिकार का प्रतीक बन जाती है। एक और चिंताजनक पहलू यह है कि हम बच्चों को सोचने के बजाय रटने की ट्रेनिंग दे रहे हैं।
सवाल पूछने वाले बच्चे ‘डिस्ट्रैक्टेड’ माने जाते हैं और उत्तर याद करने वाले ‘मेधावी’। रचनात्मकता, संवेदनशीलता और नैतिकता जैसे गुण पाठ्यक्रम से बाहर कर दिए गए हैं। शिक्षा का लक्ष्य इंसान बनाना था, लेकिन हम मशीन तैयार करने में लगे हैं। इस संदर्भ में यह सवाल बेहद ज़रूरी है—क्या शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ़ टॉपर पैदा करना है? या ऐसे नागरिक तैयार करना है जो समाज के प्रति ज़िम्मेदार हों, सवाल पूछ सकें और बदलाव ला सकें?
जब तक हम इस सवाल का ईमानदारी से उत्तर नहीं खोजेंगे, तब तक दाख़िले की यह दौड़ और ज़्यादा बेरहम होती जाएगी। ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा को बाज़ार से मुक्त किया जाए और मूल्यांकन प्रणाली को मानवीय बनाया जाए। स्कूलों और कॉलेजों में सीटें बढ़ाने, गुणवत्ता सुधारने और अवसरों को समान बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास हों। सबसे ज़रूरी है माता-पिता और समाज की सोच में बदलाव—कि हर बच्चा एक जैसा नहीं होता और सफलता का एक ही रास्ता नहीं होता।
अगर शिक्षा को आनंद, जिज्ञासा और आत्मविकास का माध्यम बना दिया जाए, तो दाख़िले की यह दौड़ अपने आप धीमी पड़ जाएगी। वरना हम आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा भविष्य सौंपेंगे, जहाँ डिग्रियाँ तो होंगी, लेकिन संतुलन और संवेदनशीलता नहीं। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम रुककर सोचें—क्या शिक्षा का मक़सद केवल टॉपर पैदा करना है, या संवेदनशील, सोचने-समझने वाला इंसान बनाना? जब तक दाख़िले की यह अंधी दौड़ जारी रहेगी, तब तक शिक्षा बोझ बनी रहेगी, आनंद नहीं। बदलाव सिस्टम में चाहिए, लेकिन शुरुआत हमारी सोच से होगी—वरना यह दौड़ हर साल और बेरहम होती जाएगी।

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Web Title-From Nursery to College: Increasing Pressure and Competition on Children in the Admission Race
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