पिछले दोनों लंबी बहस व विवादों के बाद आख़िरकार वक़्फ़ संशोधन विधेयक, 2025 संसद के दोनों सदनों में पारित हो ही गया। चूँकि इस समय दोनों ही सदनों में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का बहुमत है इसलिये इस विधेयक के पारित होने की पूरी संभावना भी थी। हाँविपक्ष को कुछ उम्मीदें स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले सत्ता के सहयोगी दलों के प्रमुख नेताओं नितीश कुमार, चंद्र बाबू नायडू, जयंत चौधरी व चिराग़ पासवान से ज़रूर थीं कि शायद वे इस विधेयक के विरोध में खड़े हों परन्तु ऐसा नहीं हुआ। यहां तक कि इनके दलों के मुस्लिम सांसदों ने भी इस विधेयक का विरोध नहीं किया।
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बहरहाल अब कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी इण्डिया गठबंधन दलों द्वारा एक इस विधेयक के विरोध के आख़िरी विकल्प के रूप में सर्वोच्च न्यायलय का दरवाज़ा खटखटाने की ख़बर है जहां इस की संवैधानिकता को चुनौती दी जाएगी। ग़ौरतलब है कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल वक़्फ़ संशोधन विधेयक, 2025 को असंवैधानिक और मुस्लिम विरोधी बताते हुये इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। जबकि सत्तारूढ़ राजग व भाजपा के नेता इस बिल को मुस्लिम हितैषी बता रहे हैं।
दरअसल एक अनुमान के अनुसार भारत में सेना और रेलवे के बाद सबसे ज़्यादा अचल संपत्ति वक़्फ़ बोर्ड के अधीन है। इन्हें संचालित करने के लिये भारत में कुल 32 वक़्फ़ बोर्ड हैं और इन सभी वक़्फ़ बोर्ड का संचालन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय वक़्फ़ काउंसिल और राज्य स्तर पर वक़्फ़ बोर्ड करते हैं।
यह व्यवस्था भारत सरकार द्वारा वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन व रखरखाव के लिए निर्धारित की गयी है। प्रत्येक वक़्फ़ संपत्ति के प्रबंधन के लिए एक मुतवल्ली नियुक्त किया जाता है। इसी मुतवल्ली के हाथों में वक़्फ़ संपत्ति का नियंत्रण होता है। वक़्फ़ संपत्ति से होने वाली कुल आय का एक निर्धारित प्रतिशत वक़्फ़ बोर्ड को, बोर्ड के रखरखाव के नाम पर दिया जाता है। यही वक़्फ़ बोर्ड वक़्फ़ संपत्ति संबंधित विवादों ख़ासकर मुतवल्ली की नियुक्ति व अवैध क़ब्ज़ा हटाने या किसी को किराये पर देने न देने जैसे मामलों में हस्तक्षेप करता है।
वक़्फ़ सम्पत्तियाँ केवल मुसलमानों से जुड़ी हुई ही नहीं हैं। बल्कि विभिन्न धर्मों में इस तरह की सम्पत्तियाँ मिलेंगी जिन्हें पूर्व में राजा महाराजाओं, ज़मींदारों, जागीरदारों, धनाढ्य लोगों द्वारा यहाँ तक कि जो साधारण लोग भी अपनी संपत्ति अपने क़ानूनी वारिसों को न देकर अपने धर्म से सम्बंधित धर्मस्थानों को दान में दे दिया करते थे।
आज देशभर में विभिन्न धर्मों के धर्म स्थलों के पास इस तरह की बेहिसाब सम्पत्तियाँ हैं। इन संपत्तियों को कहीं महंत या गद्दी नशीन देख रहे हैं, कहीं प्रबंधन कमेटियां बनी हुई हैं तो कहीं इसके प्रबंधन के लिये न्यास (वक़्फ़ ) या ट्रस्ट बनाये गये हैं। मिसाल के तौर पर जगन्नाथपुरी ट्रस्ट, वैष्णो देवी ट्रस्ट, मनसा देवी ट्रस्ट की तरह हिन्दू धर्मस्थलों से जुड़े अनेक ट्रस्ट हैं।
इसी तरह सिख धर्मस्थलों की देखभाल के लिये शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी बनाई गयी है। परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रत्येक धर्मों में पाई जाने वाली इस तरह की सम्पत्तियों में या इससे होने वाली बेहिसाब आय में आम तौर पर लूट खसोट की ख़बरें भी आती रहती हैं।
यही वजह है कि विभिन्न राज्यों में वक़्फ़ बोर्ड संपत्तियों के ग़बन और भ्रष्टाचार, वक़्फ़ ज़मीनों पर अवैध क़ब्ज़ा, राजनीतिकरण और सांप्रदायिक दुरुपयोग, धार्मिक भेदभाव, पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव, क़ानूनी विवाद और निष्क्रियता जैसे आरोप भी लगते रहे हैं।
परन्तु यदि सत्ता से जुड़े गिने चुने मुसलमानों को छोड़ दें तो न केवल देश के आम मुसलमान बल्कि समूचा विपक्ष और अनेक क़ानूनविद व बुद्धिजीवी वक़्फ़ संशोधन विधेयक, 2025 को मुस्लिम विरोधी, मुसलमानों द्वारा वक़्फ़ की गयी ज़मीनों को हड़पने का प्रयास तथा दूसरे धर्मों व धर्मस्थलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश बता रहे हैं।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब मंदिरों व अन्य धर्मों के धार्मिक प्रबंधन में किसी दूसरे धर्म के लोग शामिल नहीं किये जाते तो वक़्फ़ बोर्ड में किसी ग़ैर मुस्लिम को शामिल करने का आख़िर क्या मक़सद है? यदि मुस्लिम वक़्फ़ संपत्ति के प्रबंधन में गै़र-मुसलमानों को रखा जा सकता है तो गै़र-मुसलमानों के धर्मस्थलों की संपत्ति प्रबंधन में मुसलमानों को क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए?
विपक्ष का मानना है कि सरकार इस बिल के द्वारा वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारों को इसलिए कम कर रही ताकि वह वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर सके। विपक्ष इसे मुस्लिम समाज को तोड़ने व कमज़ोर करने का काम बता रहा है। कुछ सांसदों ने तो संसद में बहस के दौरान यह तक कह डाला कि यह विधेयक मुसलमानों के धर्म पर डाका डालने तथा मुसलमानों की वक़्फ़ संपत्ति को हड़पने वाला है।
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इस विधेयक को 'संविधान पर एक निर्लज्ज हमला' तथा समाज के स्थायी ध्रुवीकरण की रणनीति' का हिस्सा बताया जिससे भाजपा तिलमिला उठी है।
कुछ इसी से मिलता जुलता विवाद पिछले कई दिनों से बिहार के विश्व प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ स्थल बोधगया को लेकर भी छिड़ा हुआ है। यहां गत 12 फ़रवरी से बौद्ध भिक्षु बीटी एक्ट यानी बौद्ध गया टेंपल एक्ट, 1949 को समाप्त करने की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इस नियम के अंतर्गत बौद्ध गया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी (बीटीएमसी) में बौद्धों के साथ-साथ हिंदू धर्मावलंबियों को भी सदस्य बनाने का प्रावधान है।
बौद्ध भिक्षु इसे उनके धार्मिक मामलों में दख़ल मानते हुये लंबे समय से इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं।
पहले बौद्ध भिक्षु महाबोधि मंदिर के सामने ही आमरण अनशन पर बैठे थे परन्तु गत 27 फ़रवरी को प्रशासन द्वारा इन्हें महाबोधि मंदिर परिसर से हटा दिया गया। इसके बाद अब बौद्ध भिक्षु महाबोधि मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर दोमुहान नामक स्थान पर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। गोया बौद्ध धर्म के लोग भी अपने धार्मिक मामलों में दूसरे धर्म के लोगों की दख़लअंदाज़ी सहन नहीं कर पा रहे फिर आख़िर मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दख़ल देने का मक़सद क्या ?
रहा सवाल भाजपा द्वारा इस विधेयक के माध्यम से मुस्लिम हितों की बातें करने का या इस विधेयक को मुस्लिम हितैषी बताने का तो पूरी दुनिया देख रही है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा ने जिस 'गुजरात मॉडल ' को देश में लागू करने की बात कही थी वह गुजरात मॉडल दरअसल क्या है ? आज भाजपा के पूरे देश में कोई सांसद या विधायक नहीं है। जगह जगह मदरसे बंद कराये जा रहे हैं।
मस्जिदों व क़ब्रों को खोदने का सिलसिला चल रहा है।
जिन पसमांदा मुसलमानों के हितों की भाजपा बात करती है उसी समाज के कितने लोगों के घरों को बुलडोज़र से तहस नहस कर दिया गया है। उन्हीं पसमांदा मुसलमानों के व्यवसायिक व सामाजिक बहिष्कार की अपील भाजपाई समर्थक करते रहते हैं। संवैधानिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाते हुये हिन्दू राष्ट्र निर्माण की बात अनेक नेताओं व कथित धर्मगुरुओं द्वारा सरे आम की जा रही है। ऐसे वातावरण में वक़्फ़ विधेयक 2025 को मुसलमानों का हितैषी बताने का दावा, निगाहें कहीं हैं और निशाना कहीं जैसा ही है।
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