पहलगाम में हुये पाक प्रायोजित हमले के बाद भारतीय सेना की ओर से किये गये ऑप्रेशन सिन्दूर के बाद सत्ताधारी दल भारतीय सेना के शौर्य को भुनाने में लग गया है। निश्चित रूप से हमारे सैनिकों ख़ासकर भारतीय वायु सेना ने जिस बहादुरी के साथ पाक अधिकृत कश्मीर सहित पाकिस्तान के कई आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया उससे भारतीय जनता का मनोबल भी ऊँचा हुआ है साथ ही पाकिस्तान भी अपनी औक़ात को समझ चुका है। परन्तु जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस सैन्य शौर्य का राजनीतिकरण करने की कोशिश की जा रही है इस पर सवाल ज़रूर उठाये जा रहे हैं।
ख़ासकर प्रधानमंत्री के उस चित्र को लेकर जिसमें वे सैन्य वर्दी में एक लड़ाके की भूमिका में, पृष्ठभूमि में वायुसेना के लड़ाकू विमान के साथ प्रचारित किये जा रहे हैं।उधर भारत की तरफ़ से कई रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह व कई अन्य ज़िम्मेदार नेताओं द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में पुनः शामिल करने को लेकर सार्वजनिक रूप से बातें की जा रही हैं। और इसी बीच भारतीय वायुसेना प्रमुख ने सरकार की आँखें खोलने वाले कुछ बयान भी दिये हैं। साथ ही सरकार द्वारा शुरू की गयी अग्निवीर योजना पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं।
पिछले दिनों सीआईआई वार्षिक बिजनेस समिट में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल अमरप्रीत सिंह ने ख़ास तौर पर स्वदेशी सैन्य परियोजनाओं की ओर इशारा करते हुए रक्षा सौदों में देरी के मामलों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि तेजस Mk1A फ़ाइटर जेट की डिलीवरी रुकी हुई है। जो फ़रवरी 2021 में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ 48,000 करोड़ रुपये में हुई थी। उन्होंने कहा कि ऑर्डर किए गए 83 विमानों में से अब तक एक भी विमान हमें नहीं दिया गया है, जबकि इसकी डिलिवरी मार्च 2024 में ही शुरू होने वाली थी। तेजस Mk2 का प्रोटोटाइप अभी तक रोल आउट नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि तेजस सहित कई बड़ी डील हुई, पर अभी तक डिलीवरी का पता नहीं। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल ने रक्षा ख़रीद परियोजनाओं में देरी पर गंभीर चिंता जताते हुये स्वदेशी प्रोजेक्ट्स का ज़िक्र किया और साफ़ तौर से यह कहा कि हमें जो चीज़ आज चाहिए, वो आज ही चाहिए। युद्ध, सेनाओं को सशक्त बनाकर जीते जाते हैं। इसी तरह स्टील्थ AMCA फ़ाइटर का भी अभी तक कोई प्रोटोटाइप नहीं है। उन्होंने कहा कि कई बार डील के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त करते वक़्त ही हमें पता होता है कि ये सिस्टम कभी भी समय पर नहीं मिलेंगे। उन्होंने कहा कि - मैं कोई एक भी ऐसी योजना नहीं बता सकता हूं जो समय पर पूरी हुई हो। प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल की यह टिप्पणी ऐसे समय में आयी है जब वायुसेना मोदी सरकार की 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत तेज़ी से स्वदेशीकरण और घरेलू क्षमता पर ज़ोर दे रही है।
दूसरी तरफ़ सरकार द्वारा चलायी गयी अग्निवीर योजना को लेकर भी तरह तरह के सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष तो इस योजना को लेकर शुरू से ही आक्रामक था जबकि सरकार तरह तरह के तर्क देकर इस योजना के फ़ायदे गिनाने में लगी है। परन्तु अग्निवीर को लेकर अब जो सच्चाइयां सामने आ रही हैं वह भी भारतीय सेना के लिये चिंता बढ़ाने वाली हैं। इस समय सेना में अधिकारी रैंक के 16.71% पद रिक्त हैं। क्योंकि हर साल 60 हज़ार सैन्यकर्मी सेवानवृत्त भी हो रहे हैं। जबकि भर्ती का अनुपात इसके विपरीत है। कोरोना काल के दौरान ही 2 वर्ष तक सेना में भर्ती पूरी तरह बंद थी।
रक्षा मंत्रालय द्वारा हाल ही में संसद की स्थायी समिति को दी गयी जानकारी के अनुसार इस समय भारतीय सेना में एक लाख से ज़्यादा सैनिकों की कमी है। इस समय सेना की कुल संख्या 12.48 लाख है, जबकि एक लाख से अधिक पद ख़ाली हैं। इसकी एक वजह अग्निवीर योजना से घटा युवाओं का रुझान माना जा रहा है। दरअसल अग्निवीर सैन्य भर्ती योजना अथवा अग्निपथ योजना 2022 में लागू की गयी थी। इसके अंतर्गत भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में युवाओं को चार साल की अवधि के लिए "अग्निवीर" के रूप में भर्ती किया जाना है।
इन्हीं चार वर्षों के सेवाकाल में ही 6 महीने की प्रशिक्षण अवधि भी शामिल है। 4 वर्ष की सैन्य सेवा के बाद 25% अग्नि वीरों को तो नियमित सैन्य सेवा में स्थायी रूप से शामिल किया जा सकता है परन्तु शेष अग्निवीरों को "सेवा निधि पैकेज" के रूप में लगभग 11-12 लाख रुपये और अनुभव प्रमाणपत्र के साथ विदा किये जाने का प्रावधान है। इस सेवा निधि पैकेज में अग्निवीर और सरकार दोनों का ही योगदान है।
इसके बावजूद अग्निवीर योजना के प्रति युवाओं के घटते रुझान का मुख्य कारण यह है कि यह योजना छोटी अवधि, लागत-प्रभावी और युवा-केंद्रित सैन्य सेवा पर ज़ोर देती है, जबकि सामान्य सैनिकों की भर्ती लंबी अवधि की स्थायी सेवा और दीर्घकालिक लाभों पर आधारित है।
अग्निवीर योजना को आधुनिक सैन्य ज़रूरतों और बजट प्रबंधन के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन यह स्थायी नौकरी की चाह रखने वाले युवाओं के बीच विवादास्पद रही है। इस योजना के अनुसार 4 साल का छोटा कार्यकाल और सीमित प्रशिक्षण सैनिकों को पूर्ण रूप से युद्ध के लिए तैयार नहीं करता, जिससे युवा इसे जोखिम भरा मानते हैं। इसके अलावा, 4 साल बाद नागरिक जीवन में पुनर्स्थापन के लिए पर्याप्त समर्थन की कमी भी एक बड़ी चिंता का विषय है। यही कारण है कि अग्निवीर भर्ती के प्रति युवाओं का रुझान विशेष रूप से उन राज्यों में कम हुआ है, जहां सेना में भर्ती पारंपरिक रूप से लोकप्रिय थी। इसका मुख्य कारण नौकरी की अनिश्चितता, पेंशन की कमी, और दीर्घकालिक भविष्य है। हालांकि, सरकार ने हरियाणा जैसे राज्यों में अग्निवीरों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण और अन्य प्रोत्साहन देने की कोशिश की है, लेकिन यह अभी भी युवाओं के असंतोष को पूरी तरह दूर नहीं कर पाया है।
यही वजह है कि हरियाणा जैसे राज्यों में, जहां पहले प्रत्येक वर्ष लगभग 5,000 युवा सेना में भर्ती होते थे, अग्निवीर योजना के बाद यह संख्या घटकर केवल 250 तक रह गई है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भी, 2022-23 में 73,000 युवाओं ने भर्ती के लिए पंजीकरण कराया, लेकिन अग्निवीर योजना लागू होने के बाद मैदान में तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या में 80% की कमी देखी गई।
लिहाज़ा ऑपरेशन सिंदूर का श्रेय लेने और इसका चुनावी लाभ उठाने बजाये सैन्य विशेषज्ञों की सलाह पर तत्काल अमल किया जाये और सैन्य क्षमता को लेकर उठ रही उनकी चिंताओं का यथाशीघ्र समाधान किया जाये क्योंकि दुर्भाग्यवश भारत इस समय चारों ओर से असुरक्षित है। ऐसे में सैन्य पराक्रम को लेकर की जाने वाली राजनीति घातक साबित हो सकती है।
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