पिछले दिनों सनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के निर्देश पर जिसतरह वेनेज़ुएला पर सैन्य कार्रवाई करते हुये अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला की राजधानी कराकस से वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी का बलात अपहरण कर उन्हें न्यूयार्क ले जाया गया उसने पूरी दुनिया को न केवल अचंभे में डाल दिया है बल्कि इस घटना ने एक नई विश्व व्यवस्था व नये वैश्विक शक्ति संतुलन के गठन की संभावना को भी प्रबल कर दिया है।
कितना आश्चर्य है कि नोबल शांति पुरस्कार की चाहत रखने वाले राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिकी शक्तियों का दुरुपयोग कर इस दुनिया को जंगल राज की तरह चलाना चाह रहे हैं? वेनेज़ुएला पर की गयी ग़ैर क़ानूनी अमेरिकी कार्रवाई कई संकेतों की ओर इशारा कर रही है। एक तो यह कि क्या यह विश्व की उदारवादी सोच रखने वाली ताक़तों को विश्व की पूंजीवादी व अतिवादी व्यवस्था की ओर से दी जाने वाली यह एक सीधी चुनौती है?
ग़ौरतलब है कि ट्रंप परिवार की गिनती भी अमेरिका के बड़े पूंजीवादी घरानों में की जाती है। या फिर यह चीन व रूस जैसे देशों एक साथ ललकारने की ट्रंप की नीति का हिस्सा है ? और अब कोलंबिया, क्यूबा, मैक्सिको और ईरान जैसे देशों पर अमेरिकी सैन्य या आर्थिक दबाव की आशंका व्यक्त की जा रही है।साथ ही अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर भी अधिग्रहण की धमकी दी जा चुकी है। ये भी पढ़ें - अपने राज्य / शहर की खबर अख़बार से पहले पढ़ने के लिए क्लिक करे
ऐसे में दुनिया के सामने दो ही विकल्प बचे हैं एक तो यह कि दूसरे देशों की स्वतंत्रता व संप्रभुता का सम्मान करने वाले सभी देश वेनेज़ुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध करते हुये हर स्तर पर एकजुट होकर अमेरिका का मुक़ाबला करें। दूसरा यह कि 'जिसकी लाठी उसी की भैंस' वाली अमेरिकी नीति का ही अनुसरण करते हुये पूरी दुनिया ही जंगल राज में बदल जाये। हर ताक़तवर देश अपनी पड़ोसी कमज़ोर देश को निगलने की मानवता व न्याय विरोधी रक्तरंजित योजना पर काम करे।
उदाहरण के तौर पर चीन ताइवान को हड़प ले और रूस यूक्रेन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर ले ? इस्राईल, फ़िलिस्तीन लेबनान सीरिया पर नियंत्रण कर अपने वृहत्तर इस्राईल के नापाक मंसूबे पर आगे बढ़े ? और इन्हीं ख़तरनाक संभावनाओं के बीच एक उपाय यह भी है कि ईरान परमाणु परीक्षण के द्वारा उत्तर कोरिया की तरह एक ऐसी आत्म रक्षक व "निवारक" रणनीति पर काम करे जो अमेरिका को भी युद्ध से पीछे हटने पर मजबूर कर दे ? तो क्या लंबे समय से चले आ रहे तमाम ईरान विरोधी प्रतिबंधों के बावजूद उस के सामने इस समय वैसी ही स्थिति पैदा हो चुकी है कि आत्मरक्षा के लिये अब उसे परमाणु संपन्न देशों के क्लब में शामिल होना ज़रूरी हो गया है ?
ग़ौरतलब है कि गत 13 जून - 24 जून 2025 के मध्य चला बारह दिवसीय ईरान-इज़राइल युद्ध उस समय शुरू हुआ था जब इज़राइल ने ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी और ईरान के कई प्रमुख सैन्य अधिकारियों , परमाणु वैज्ञानिकों व प्रमुख राजनेताओं की हत्या कर दी थी साथ ही अनेक नागरिकों को भी मार दिया था। इज़राइल ने उस समय ईरान की वायु सुरक्षा को भी नुक़्सान पहुँचाया था और कई जगह तो इसे पूरी तरह नष्ट भी कर दिया था।
इतना ही नहीं बल्कि अमेरिका ने भी इस्राईल के समर्थन में 22 जून को तीन ईरानी परमाणु स्थलों पर बमबारी की। परन्तु बाद में मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करते हुये ईरान ने 550 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलों और 1,000 से अधिक आत्मघाती ड्रोनों के साथ बड़े पैमाने पर इस्राईल में राजधानी तेल अवीव सहित कई शहरों पर भीषण हमले किये। कम से कम बारह सैन्य, ऊर्जा और सरकारी स्थलों को निशाना बनाया। यहाँ तक कि कई अमेरिकी सैन्य लक्ष्यों को भी निशाना बनाया।
उस दौरान भी पश्चिमी मीडिया ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामनेई को लेकर बार बार तरह तरह की अफ़वाह उड़ा रहा था। कभी उन्हें भूमिगत बता देता था तो कभी उनके ईरान छोड़कर भाग जाने की ख़बर फैला देता था। उस समय भी आयतुल्लाह ख़ामनेई जनता को संबोधित करने के लिये सार्वजनिक रूप से दिखाई देते थे और पिछले दिनों भी बिल्कुल वैसा ही दृश्य देखने को मिला। इस बार भी 'भूमिगत' होने व 'मास्को भागने की तैयारी' जैसी अफ़वाहों के बीच गत शुक्रवार को पुनः आयतुल्लाह ख़ामनेई जनता के सामने आये तथा बेख़ौफ़ होकर ख़ुद अमेरिका को ही हिदायत व नसीहत करते सुने गए।
परन्तु ट्रंप के नेतृत्व वाला वर्तमान अमेरिका वेनेज़ुएला की घटना के बाद तो पूरी तरह बेनक़ाब हो चुका है।
दुनिया में सबसे अधिक तेल भण्डार रखने वाले अमेरिका को विश्व के अन्य तेल उत्पादक देशों से अपनी शर्तों पर तेल चाहिये। चाहे इसके लिये कोई भी बहाना बनाकर किसी राष्ट्रपति का अपहरण तक क्यों न करना पड़े। ज़ाहिर है ईरान भी वेनेज़ुएला की ही तरह दुनिया के उन गिने चुने तेल उत्पादक देशों में एक है जो अमेरिका को 'सर्वशक्तिमान ' भी नहीं मानता और न ही उसकी 'वैश्विक थानेदारी ' को स्वीकार करता है। जबकि 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति से पहले का रज़ा शाह पहलवी का ईरानी शासन अमेरिका का पिट्ठू शासन था।
उसी समय से ईरान न केवल अमेरिकी बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाये गयी अनेक प्रतिबंध भी झेलता आ रहा है जोकि निश्चित रूप से ईरान की अर्थव्यवस्था को बेहद कमज़ोर कर रहा है। इन प्रतिबंधों के बावजूद अपने अत्यंत सीमित संसाधनों के बल पर ईरान ने शिक्षा,विज्ञान यहाँ तक कि अंतरिक्ष विज्ञान तक के क्षेत्र में जो तरक़्क़ी की है उसी की झलक गत वर्ष के बारह दिवसीय ईरान-इज़राइल युद्ध में भी देखने को मिली।
परन्तु अब बात इस्राईल की नहीं बल्कि ईरान को सीधे अमेरिका चुनौती दे रहा है।
ईरान में चल रहे सरकार विरोधी व अमेरिका -इस्राईल समर्थित प्रदर्शनों को लेकर अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि प्रदर्शनकारियों को मारा गया तो अमेरिका ईरान पर बड़े हमले करेगा। ऐसे में ईरान,अमेरिकी हमलों से बचने के लिये आख़िर कौन सी रणनीति अपना सकता है ? क्या ईरान द्वारा परमाणु परीक्षण किया जाना भी इन्हीं संभावनाओं में एक सबसे प्रमुख है ? क्या निकट भविष्य में ईरान भी परमाणु परीक्षण कर "परमाणु क्लब" में शामिल हो जाएगा ताकि अमेरिका व इज़राइल जैसे देशों को सैन्य हमले से रोका जा सके ?
यदि ईरान में उपजे सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के बीच ईरान रूस और चीन जैसे सहयोगी देशों की मदद से परमाणु परीक्षण करता है तो इससे ईरान की जनता में सुरक्षा,स्वाभिमान तथा राष्ट्रवाद बढ़ेगा तो बढ़ेगा ही साथ ही वहां आंतरिक राष्ट्रीय एकता भी बढ़ेगी। इसके अलावा ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव भी बढ़ेगा साथ ही अमेरिकी एकध्रुवीयता का विरोध करने वाले देशों को भी मज़बूती मिलेगी। इसके अलावा दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दबाव का सामना करती आ रही
ईरान की अर्थव्यवस्था में इस परीक्षण से JCPOA के रूप में कई नई संभावनाएँ भी खुल सकती हैं। वैसे भी उत्तर कोरिया द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद ही ट्रंप - की उत्तर कोरिया राष्ट्रपति किम जोंग के साथ 27 -28 फ़रवरी 2019 को वेतनाम के हनोई में मुलाक़ात हुई थी। गोया आज की दुनिया में ख़ासकर अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया में यदि किसी देश को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो उसका परमाणु संपन्न देश होना ज़रूरी हो चुका है। अन्यथा कभी भी इराक़-वेनेज़ुएला-ग़ज़ा-सीरिया-लेबनान यानी कहीं भी कुछ भी हो सकता है ?
नोटः ये लेखक के निजी विचार हैं।
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