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'वंदे मातरम भारत की सभ्यतागत विरासत का अभिन्न हिस्सा, ये असंवैधानिक नहीं', ओवैसी को अमित मालवीय का जवाब

Vande Mataram is an Integral Part of India Civilizational Heritage; It is Not Unconstitutional — Amit Malviya Reply to Owaisi - Delhi News in Hindi

नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने 'वंदे मातरम' के विरोध पर एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को करारा जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि 'वंदे मातरम' को असंवैधानिक बताने की कोशिश बौद्धिक रूप से बेईमान और ऐतिहासिक रूप से चयनात्मक है। असदुद्दीन ओवैसी ने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा दिए जाने का विरोध किया है। सांसद ने 'वंदे मातरम' के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय पर भी सवाल उठाए और दावा किया कि जिस व्यक्ति ने 'वंदे मातरम' लिखा था, वो ब्रिटिश राज के प्रति सहानुभूति रखते थे और मुसलमानों से नफरत करते थे। नेताजी बोस, गांधी, नेहरू और टैगोर, इन सभी ने इसे अस्वीकार (वंदे मातरम) कर दिया था। ओवैसी ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में लिखा, "'वंदे मातरम' एक देवी की स्तुति है। इसे राष्ट्रगान के बराबर नहीं माना जा सकता। जन-गण-मन भारत और उसके लोगों का गुणगान करता है, किसी खास धर्म का नहीं।" उन्होंने यह भी कहा कि धर्म और राष्ट्र एक बराबर नहीं है।
इसके बाद, ओवैसी को जवाब देते हुए अमित मालवीय ने कहा कि भारत अपने सभी नागरिकों का समान रूप से है, लेकिन भारत की सभ्यतागत विरासत भी उसके सभी नागरिकों की समान रूप से है और 'वंदे मातरम' उस विरासत का एक अभिन्न अंग है।
अमित मालवीय ने 'एक्स' पर लिखा, "कानूनी और संवैधानिक रूप से 'वंदे मातरम' को भारत के राष्ट्रीय जीवन में एक सम्मानित स्थान प्राप्त है। संविधान सभा ने इसे अस्वीकार नहीं किया था। 24 जनवरी 1950 को सभा ने 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया और साथ ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इसकी ऐतिहासिक भूमिका के कारण 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत के रूप में स्पष्ट रूप से समान सम्मान और दर्जा दिया। यह कहना कि भारत के संविधान निर्माताओं ने 'वंदे मातरम' को 'अस्वीकार' कर दिया था, तथ्यात्मक रूप से गलत है।"
'वंदे मातरम सिर्फ एक देवी की स्तुति है', पर ओवैसी को जवाब देते हुए अमित मालवीय ने लिखा, "यह तर्क भारत के सभ्यतागत संदर्भ को जानबूझकर नजरअंदाज करता है। भारतीय परंपराओं में, मातृभूमि को लंबे समय से 'भारत माता' के रूप में मानवीकृत किया गया है, किसी सांप्रदायिक देवी के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पण की एक सांस्कृतिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में। दुनिया भर के राष्ट्र प्रतीकवाद, रूपक और मानवीकरण का उपयोग करते हैं। 'ब्रिटानिया' ब्रिटेन का प्रतिनिधित्व करती है, 'मैरिएन' फ्रांस का, और 'मां रूस' रूस का। भारत के सांस्कृतिक प्रतीकवाद को सिर्फ इसलिए चुनिंदा रूप से अवैध नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह भारतीय सभ्यता से उत्पन्न होता है।"
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को लेकर अमित मालवीय ने कहा, "बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को उनके कथित विचारों से जुड़े व्यंग्यचित्रों तक सीमित कर देना और साथ ही 'वंदे मातरम' की ऐतिहासिक भूमिका को नजरअंदाज करना, एक वैचारिक संशोधनवाद का प्रयास है। यह गीत भारत के उपनिवेश-विरोधी आंदोलन का मुख्य नारा बन गया था। अनगिनत स्वतंत्रता सेनानी 'वंदे मातरम' का उद्घोष करते हुए फांसी के फंदे तक गए। विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारियों, सुधारकों और देशभक्तों ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया। इसके भावनात्मक और राजनीतिक महत्व को पीछे से किसी वैचारिक दृष्टिकोण से मिटाया नहीं जा सकता।"
उन्होंने आगे लिखा, "संविधान सभा में ईश्वर या देवी-देवताओं का आह्वान करने वाले संशोधनों की अस्वीकृति ने इस बात की पुष्टि की कि भारतीय राज्य किसी भी आधिकारिक धर्म की स्थापना नहीं करेगा। इसके लिए भारत को अपने सभ्यतागत मूल्यों, सांस्कृतिक स्मृतियों या आध्यात्मिक शब्दावली को त्यागने की जरूरत नहीं थी। भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ कभी भी स्वदेशी परंपराओं के प्रति शत्रुता या सार्वजनिक जीवन से बहुसंख्यक सांस्कृतिक प्रतीकों को मिटाना नहीं रहा है।"
भाजपा नेता ने 'धर्म और राष्ट्र' पर भी ओवैसी को जवाब दिया। उन्होंने कहा, "यह दावा कि धर्म राष्ट्र नहीं है, भारतीय संदर्भ में एक गलत द्वंद्व है। भारत न तो कोई धर्म-शासित राज्य है, और न ही यहां का राष्ट्रवाद किसी एक धर्म के पालन पर निर्भर करता है। लेकिन भारत निस्संदेह एक ऐसी सभ्यता है जिसे हजारों वर्षों के भारतीय चिंतन, परंपराओं, प्रतीकों और दर्शन ने आकार दिया है। 'वंदे मातरम' का सम्मान करने से भारत न तो कम संवैधानिक होता है, न कम लोकतांत्रिक और न ही कम समावेशी। यह केवल उस सांस्कृतिक आत्मा को स्वीकार करता है जिसने स्वतंत्रता संग्राम में प्राण फूंके थे और जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है।"
--आईएएनएस

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