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बच्चों की शिक्षा से जुड़े मामले में अवमानना पर सुप्रीम कोर्ट का शिक्षा मंत्रालय के सचिव को नोटिस

Supreme Court issues notice to Education Ministry Secretary - Delhi News in Hindi

नई दिल्ली,। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सचिव के खिलाफ अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नोटिस जारी किया। यह कार्रवाई उस आरोप पर की गई कि मंत्रालय ने अदालत के उस निर्देश का पालन नहीं किया, जिसमें 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता, विनियमन और निगरानी की मांग वाली याचिका पर निर्णय लेने को कहा गया था। अदालत ने इस मामले में मंत्रालय द्वारा निर्देशों का पालन नहीं किए जाने पर जवाब मांगा है। याचिका में ऐसे शैक्षणिक संस्थानों के लिए उचित नियामक व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई है, ताकि बच्चों की शिक्षा और उनके अधिकारों की प्रभावी निगरानी की जा सके। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने आईएएस अधिकारी टी.के. अनिल कुमार से जवाब मांगा है। यह जवाब वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की अवमानना ​​याचिका पर मांगा गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का तय समय में पालन करने में नाकाम रही।
सुप्रीम कोर्ट की यह कार्यवाही 11 मई के उस आदेश से जुड़ी है, जिसमें कोर्ट ने उपाध्याय की रिट याचिका का निपटारा कर दिया था। कोर्ट ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सामने 10 फरवरी 2026 को दी गई उनकी अर्जी पर गौर करने के बाद यह फैसला लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था और याचिकाकर्ता से अर्जी के नतीजे का इंतजार करने को कहा था। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र को तय समय में अर्जी पर फैसला लेने का निर्देश दिया था।
अवमानना ​​याचिका में उपाध्याय ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के साफ निर्देश के बावजूद संबंधित अधिकारी ने उनकी अर्जी पर कोई फैसला नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और/या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों का रजिस्ट्रेशन करें, उन्हें मान्यता दें और उनकी देखरेख व निगरानी करें।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 30(1) के दायरे के बारे में भी स्पष्टीकरण मांगा है। इसमें यह बात भी शामिल है कि यह अनुच्छेद 19(1)(जी) को ही खास तौर पर दोहराता है और धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थान अनुच्छेद 26 के दायरे में आते हैं।
अपनी अवमानना ​​याचिका में उपाध्याय ने दावा किया कि जनवरी में उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई सीमावर्ती जिलों का दौरा किया और वहां कई ऐसे संस्थान पाए जिनका न तो रजिस्ट्रेशन हुआ था और न ही उन्हें मान्यता मिली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के सीमावर्ती जिलों में ऐसे बिना रजिस्ट्रेशन और बिना मान्यता वाले संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि रजिस्ट्रेशन, मान्यता, देखरेख और निगरानी न होने से बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21ए का भी जिक्र किया गया और 'तमिलनाडु राज्य बनाम के. श्याम सुंदर' मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला दिया गया। इसमें तर्क दिया गया कि शिक्षण संस्थानों के सही रजिस्ट्रेशन, मान्यता, देखरेख और निगरानी के बिना बच्चों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं दी जा सकती।
यह मुद्दा पहले भी उपाध्याय की दायर एक दूसरी पीआईएल (जनहित याचिका) के जरिए सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुका है। अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने उसी मुद्दे पर उनकी तीसरी याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि एक ही मामले से जुड़ी पिछली कार्यवाही के बाद बार-बार याचिकाएं दाखिल करने पर वह विचार नहीं करेगा।
शीर्ष अदालत ने कहा था कि उपाध्याय की ओर से पहले दायर एक रिट याचिका का निपटारा उन्हें सक्षम अधिकारी के पास जाने की छूट देकर किया गया था, जबकि एक अन्य याचिका को इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया गया था कि उन्हें अपनी अर्जी पर फैसले का इंतजार करना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट 16 अक्टूबर को अवमानना ​​कार्यवाही पर विचार करेगा।
--आईएएनएस

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Web Title-Supreme Court issues notice to Education Ministry Secretary
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