नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'सेवा तीर्थ' के उद्घाटन के बाद एक जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हम सभी आज एक नए इतिहास को बनते देख रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण शुभ दिन है। यह दिन भारत की विकास यात्रा में नए आरंभ का साक्षी बन रहा है।
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उन्होंने कहा कि शास्त्रों में विजया एकादशी का बड़ा महत्व है। इस दिन जिस संकल्प के साथ आगे बढ़ते हैं, उसमें विजय जरूर प्राप्त होती है। आज हम सभी विकसित भारत का संकल्प लेकर सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं। अपने लक्ष्य में विजयी होने की दैवीय शक्ति साथ है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं पीएमओ के कर्मचारियों, अधिकारियों, सेवा तीर्थ के निर्माण से जुड़े इंजीनियरों और श्रमिकों का आभार व्यक्त करता हूं। आजादी के बाद साउथ और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतों से देश के लिए अहम निर्णय हुए और नीतियां बनीं, लेकिन यह भी सच है कि ये इमारतें ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीक के तौर पर बनाई गई थीं। इसका मकसद भारत को वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखना था।
पीएम ने कहा कि एक समय था जब कोलकाता देश की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन 1905 के बंगाल विभाजन के बाद कोलकाता ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का प्रबल केंद्र बन गया था। अंग्रेजों ने 1911 में भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट किया और उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत की जरूरतों और सोच को ध्यान में रखकर नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की इमारतों को बनाने का काम शुरू किया। इसके बाद जब रायसेना हिल्स के भवनों का उद्घाटन हुआ था, तब के वायसराय ने कहा था कि जो भवन बने हैं, वे ब्रिटिश सम्राट की सोच के अनुरूप हैं, यानी उस दौरान ये भवन ब्रिटेन के महाराज की सोच को गुलाम भारत की जमीन पर उतारने का माध्यम थे।
रायसेना हिल्स का चुनाव इसीलिए किया गया कि इमारतें अन्य इमारतों से ऊंची रहें और कोई उनकी बराबरी न कर सके। संयोग से सेवा तीर्थ का यह परिसर किसी पहाड़ी पर नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा हुआ है। साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतें, जिसे ब्रिटिश हुकूमत की सोच को लागू करने के लिए बनाई गई थीं, वहीं आज मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन जैसे नए परिसर भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बने हैं। यहां से जो फैसले होंगे, वे किसी महाराज की सोच को नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने का आधार होंगे।
उन्होंने कहा कि इसी अमृत भावना के साथ आज मैं इस सेवा तीर्थ, कर्तव्य भवन भारत की जनता को समर्पित कर रहा हूं। इस समय 21वीं सदी का पहला क्वार्टर पूरा हो चुका है। यह आवश्यक है कि विकसित भारत की हमारी कल्पना केवल नीतियों और योजनाओं में ही नहीं, हमारे कार्यस्थलों और हमारी इमारतों में भी दिखाई दे, जहां से देश का संचालन होता है। वह जगह प्रभावी भी होनी चाहिए और प्रेरणादायी भी। वह इम्प्रेसिव भी हो और इंस्पायरिंग भी।
आज नई-नई टेक्नोलॉजी तेजी से हमारे बीच जगह बना रही है, लेकिन इन सुविधाओं के विस्तार के लिए नए टूल्स के उपयोग के लिए पुरानी इमारतें नाकाफी पड़ रही थीं। साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक पुराने भवनों में जगह की कमी थी। सुविधाओं की भी अपनी सीमाएं थीं। करीब 100 साल पुरानी इमारतें भीतर से जर्जर होती जा रही थीं। इसके अलावा भी कई चुनौतियां थीं। मैं समझता हूं कि इन चुनौतियों के बारे में देश को निरंतर बताया जाना जरूरी है। दिल्ली के 50 से ज्यादा अलग-अलग स्थानों से चल रहे मंत्रालयों की इमारतों के किराए पर ही हर साल डेढ़ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो रहे हैं।
हर रोज 8 से 10 हजार कर्मचारियों को एक इमारत से दूसरी इमारत में जाने का लॉजिस्टिक खर्च अलग होता था। अब इन भवनों के निर्माण से खर्च कम होगा, समय बचेगा और कर्मचारियों के समय की बचत से उत्पादकता बढ़ेगी। निश्चित तौर पर पुराने भवनों में बिताए गए वर्षों की स्मृतियां हमारे साथ रहेंगी। अलग-अलग समय की चुनौतियों से जुड़ते हुए कई महत्वपूर्ण फैसले किए गए। वहां से देश को नई दिशा मिली, और सुधार के अनेक पहल हुए।
पीएम मोदी ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा में यह बहुत जरूरी है कि भारत गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर आगे बढ़े। दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद भी हमारे यहां गुलामी के प्रतीकों को ढोया जाता रहा। 2014 में देश ने औपनिवेशिक और दासात्मक मानसिकता के अवशेषों से मुक्ति पाने का संकल्प लिया। हमने गुलामी की मानसिकता को बदलने का अभियान शुरू किया। हमने वीरों के नाम पर नेशनल वॉर मेमोरियल बनाया। हमने पुलिस की वीरता को सम्मान देने के लिए पुलिस स्मारक बनाया। रेसकोर्स का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया। यह केवल नाम बदलने का निर्णय नहीं था, यह सत्ता के मिजाज को सेवा की भावना में बदलने का पवित्र प्रयास था।
उन्होंने कहा कि नाम बदलने की पहल केवल शब्दों का बदलाव नहीं है। इन सभी प्रयासों के पीछे वैचारिक सूत्रता एक ही है—स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान, गुलामी से मुक्त निशान। नए प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम सेवा तीर्थ है। सेवा की भावना ही भारत की आत्मा है। सेवा की भावना ही भारत की पहचान है।
पीएम ने कहा कि ये भवन हमें हर क्षण याद दिलाएंगे कि शासन का अर्थ सेवा है और दायित्व का अर्थ समर्पण है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है, सेवा परमो धर्मः, अर्थात् सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। भारतीय संस्कृति का यही विचार प्रधानमंत्री कार्यालय और सरकार का विजन है, इसलिए सेवा तीर्थ केवल एक नाम नहीं, यह एक संकल्प है। सेवा तीर्थ यानी नागरिक की सेवा से पवित्र हुआ स्थल।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में आगे कहा कि आज जब भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है, आज जब भारत अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की नई गाथा लिख रहा है, आज जब भारत नए-नए ट्रेड समझौते कर संभावनाओं के नए दरवाजे खोल रहा है, और जब देश संतृप्ति के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तो सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवनों में आप सबके काम की नई गति और आपका नया आत्मविश्वास देश के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।
उन्होंने कहा कि पिछले 11 वर्षों में हमने शासन का एक नया मॉडल देखा है, जो हर निर्णय के केंद्र में नागरिक को रखता है। "नागरिक देवो भवः" केवल एक नारा नहीं है, यह हमारी कार्य संस्कृति का मार्गदर्शक सिद्धांत है। इन नए भवनों में प्रवेश करते हुए हमें इस आदर्श को पूरी तरह से अपनाना होगा। सेवा तीर्थ में लिया गया हर निर्णय, संसाधित की गई हर फाइल और यहां बिताया गया हर पल हमारे देश के 140 करोड़ लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए समर्पित होना चाहिए। हम यहां अपने अधिकारों का दावा करने नहीं आए हैं, हम यहां अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने आए हैं। हमने देखा है कि जब शासन सेवाभाव से चलता है तो परिणाम भी असाधारण होते हैं। तभी तो 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले। तभी तो अर्थव्यवस्था नई गति पकड़ती है।
--आईएएनएस
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