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बड़ा सवाल…महामहिम राष्ट्रपति के सम्मान का ?

Big question…about respect for His Excellency the President? - Delhi News in Hindi

भारत के राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होते हैं। इस पद पर आसीन व्यक्ति भारतीय गणराज्य का प्रमुख भी होता है। कार्यपालिका का सर्वोच्च पद होने तथा तीनों सेनाओं के प्रमुख होने के नाते भी राष्ट्रपति को देश में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त होता है। परन्तु विगत समय से ऐसी कई घटनाएं सामने आईं जिन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि कई बार देश के इस सर्वोच्च पद पर बैठने वाले महामहिम राष्ट्रपति को भी अपमानित करने का दुस्साहस किया गया। जिन दो महामहिम राष्ट्रपति के अपमान या यथोचित उन्हें सम्मान न दिए जाने की चर्चा रही उनमें एक तो वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं और दूसरे इनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद।

यह भी एक अजीब संयोग है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जिन्होंने 25 जुलाई, 2022 को भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की, वह महिला होने के साथ साथ आदिवासी समाज से सम्बन्ध रखने वाली पहली राष्ट्रपति भी हैं। जबकि इनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का सम्बन्ध दलित समाज से था। राजनीतिक हल्क़ों में उपरोक्त दोनों व्यक्तियों के अपमान की चर्चा आदिवासी व दलित समुदाय के अपमान के रूप में भी रेखांकित की जा रही है। परन्तु यदि इस राजनैतिक पहलू को पीछे छोड़ भी दिया जाए तो भी एक राष्ट्रपति के रूप में इन विभूतियों के साथ जो घटनाएं घटित हुई हैं वह निश्चित रूप से इस सर्वोच्च गरिमामयी पद पर आसीन व्यक्ति के 'सम्मान' पर प्रश्न चिन्ह ज़रूर खड़ा करती हैं।

ताज़ातरीन घटना गत 31 मार्च की ही है जबकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ सम्मान देने उनके निवास पर पहुंचीं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 10 अन्य विशिष्टजन तथा परिवार के सदस्य भी उपस्थित थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जिस समय लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ सम्मान से नवाज़ रही थीं उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, बीजेपी के संगठन मंत्री बीएल संतोष तथा पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू भी इस कार्यक्रम में शामिल थे।

इस अवसर पर लिए गए चार चित्र जो राष्ट्रपति भवन की ओर से एक्स पर पोस्ट किए गए उनमें से एक चित्र में साफ़ दिखाई दे रहा है कि जिस समय महामहिम राष्ट्रपति मुर्मू खड़े होकर ससम्मान लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न प्रदान कर रही हैं उस समय लालकृष्ण आडवाणी कुर्सी पर बैठे हैं और उनके बग़ल की कुर्सी पर प्रधानमंत्री मोदी भी बैठे हैं और ताली बजा रहे हैं। जबकि सामने की पंक्ति में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ सहित सभी लोग भी बैठे हुए हैं। 96 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी के न खड़े हो पाने का कारण तो उनकी आयु व उनका ख़राब स्वास्थ्य माना जा सकता है परन्तु प्रधानमंत्री मोदी व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा महामहिम राष्ट्रपति के सम्मान में न खड़ा होना आलोचकों के लिये चर्चा का विषय ज़रूर बना।

कुछ लोगों ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि यह सामान्य शिष्टाचार के ख़िलाफ़ तो है ही साथ ही जानबूझकर देश की आधी आबादी के साथ ही आदिवासियों को भी अपमानित किए जाने वाली घटना है। इसके पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष 28 मई को नवनिर्मित संसद भवन का उद्घाटन किया था उस समय भी विपक्ष सहित अनेक संगठनों, राजनेताओं व बुद्धिजीवियों ने कहा था कि संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति द्वारा ही कराया जाना चाहिए था न कि प्रधानमंत्री द्वारा। राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन करना ही लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का प्रतीक होता। इससे पूर्व जब नई संसद भवन का शिलान्यास समारोह हुआ था उसमें भी तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को आमंत्रित नहीं किया गया था।

नई संसद भवन के उद्घाटन समारोह को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अपमान करने का आरोप लगाते हुये यहां तक कहा था कि 'ऐसा लग रहा है कि मोदी ने दलित और आदिवासी समुदायों से भारत के राष्ट्रपति का चुनाव केवल चुनावी कारणों से सुनिश्चित किया है'। खड़गे ने यह भी कहा था कि भारत के राष्ट्रपति का कार्यालय भाजपा-आरएसएस सरकार के तहत प्रतीकवाद तक सिमट गया है। उस समय कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी कहा था कि नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री को नहीं बल्कि राष्ट्रपति को करना चाहिए।

ऐसी ही एक घटना 23 जुलाई 2022 की है जबकि संसद में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का विदाई समारोह आयोजित हो रहा था। उस विदाई समारोह में प्रथम पंक्ति में बैठे सभी विशिष्ट जनों का अभिवादन करते हुये राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जब प्रधानमंत्री मोदी के पास पहुंचे तो वे राष्ट्रपति की ओर देखने के बजाए उनकी अनदेखी करते हुये कैमरे की तरफ़ देखने लगे जबकि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री मोदी की ओर असहज होकर देखते हुये आगे निकल गए। इसी तरह 18 मार्च 2018 की उस घटना में भी राष्ट्रपति कोविंद व उनकी पत्नी का अनादर होते साफ़ दिखाई दिया था जब वे भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिये पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर गए थे।

महामहिम राष्ट्रपति जब प्रभु जगन्नाथ के विराजमान होने वाले 'रत्न सिंहासन' पर माथा टेकने गए तो वहाँ उपस्थित मंदिर सेवकों ने उनके लिए रास्ता नहीं छोड़ा। आरोप यह भी था कि जब राष्ट्रपति और उनकी पत्नी दर्शन कर रहे थे उस समय कुछ सेवादारों ने कथित रूप से दोनों को कोहनी भी मारी। कुछ सेवक/पंडे महामहिम राष्ट्रपति के शरीर से भी चिपक रहे थे। यहाँ तक कि महामहिम राष्ट्रपति की पत्नी, जो भारत की 'फर्स्ट लेडी' हैं जानबूझकर कुछ पंडे उनके सामने भी आ गए थे। इस घटना को लेकर राष्ट्रपति भवन की ओर से असंतोष भी व्यक्त किया गया था। उस समय भी राष्ट्रपति व उनकी पत्नी से दुर्व्यवहार करने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।

उसी समय यह ख़बर भी आई थी कि राष्ट्रपति ने पुरी छोड़ने से पहले ही वहां के तत्कालीन ज़िलाधीश अरविंद अग्रवाल से इस घटना के बारे में अपना असंतोष भी ज़ाहिर कर दिया था। परन्तु राष्ट्रपति व उनकी पत्नी के निरादर की बात करना, दोषी के विरुद्ध कार्रवाई करना या उस पर खेद जताना तो दूर उल्टे उनके जाने के कुछ ही देर बाद एक सेवायत ने मीडिया के सामने इस बात को लेकर शिकायत ज़रूर दर्ज कराई कि राष्ट्रपति की ओर से उन्हें एक रुपया भी दक्षिणा नहीं दी गयी। इस तरह की शर्मानक घटनाएं निश्चित रूप से महामहिम राष्ट्रपति के सम्मान को लेकर सवाल ज़रूर खड़ा करती हैं। महामहिम राष्ट्रपति के पद पर आसीन होने वाला व्यक्ति किसी भी धर्म जाति या लिंग का क्यों न हो, उसका सर्वोच्च सम्मान किया जाना चाहिए। (नोटः ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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