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क्यों चढ़ाया जाता है शनि पूजा में सरसों का तेल और लोहा? जानिए इसके पीछे छिपा धार्मिक और ज्योतिषीय रहस्य

Why Mustard Oil and Iron Are Offered in Shani Dev Worship? Know the Religious and Astrological Significance - Puja Path in Hindi

भारतीय धार्मिक परंपराओं में शनिवार का दिन शनि देव की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन देशभर के मंदिरों में श्रद्धालु शनि देव को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग प्रकार की पूजा-अर्चना करते हैं। खास बात यह है कि शनि पूजा में सरसों का तेल, जिसे आम बोलचाल में कड़वा तेल कहा जाता है, और लोहा चढ़ाने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर इन दोनों वस्तुओं को ही क्यों अर्पित किया जाता है। इसके पीछे केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि पौराणिक कथाएं, ज्योतिषीय मान्यताएं और आध्यात्मिक संकेत भी जुड़े हुए हैं।
शनि देव को कर्म और न्याय का देवता माना गया है

ज्योतिष शास्त्र में शनि को कर्म, न्याय, अनुशासन और समय का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि शनि देव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसलिए उन्हें निष्पक्ष न्यायाधीश भी कहा जाता है। शनि से जुड़ी कई प्रतीकात्मक चीजें भी बताई गई हैं, जिनमें काला या गहरा नीला रंग, लोहा, तिल और सरसों का तेल प्रमुख माने जाते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से शनि की ऊर्जा और उनके स्वभाव को समझने का प्रयास किया जाता है।

सरसों का तेल चढ़ाने के पीछे की मान्यता

शनिवार के दिन शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा बहुत पुरानी मानी जाती है। ज्योतिष के अनुसार सरसों का तेल शनि ग्रह से जुड़ा हुआ द्रव्य माना जाता है। इसकी प्रकृति भारी और गहरी मानी जाती है, जो शनि के स्वभाव से मेल खाती है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान हनुमान और शनि देव का सामना हुआ तो हनुमान जी ने अपनी शक्ति से शनि को परास्त कर दिया था। उस समय शनि देव को चोट लग गई और उन्हें पीड़ा होने लगी। तब हनुमान जी ने उनके शरीर पर सरसों का तेल लगाया, जिससे उन्हें आराम मिला। इसी घटना के बाद से यह मान्यता प्रचलित हुई कि शनि देव को सरसों का तेल अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी तेल का एक प्रतीकात्मक अर्थ माना जाता है। इसे जीवन में संतुलन, धैर्य और स्थिरता का प्रतीक समझा जाता है। जब भक्त शनि देव को तेल अर्पित करते हैं तो यह अपने अहंकार और कठोरता को त्यागने का भी संकेत माना जाता है।
शनि पूजा में लोहे का महत्व
शनि पूजा में लोहा चढ़ाने की परंपरा भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक ग्रह से एक धातु जुड़ी होती है और शनि की धातु लोहा मानी जाती है। इसी कारण शनिवार के दिन लोहे से बनी वस्तुएं जैसे कील, छल्ला या अन्य वस्तुएं अर्पित करने या दान देने की परंपरा प्रचलित है।
लोहा अपनी मजबूती और कठोरता के कारण अनुशासन और परिश्रम का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए लोहे का दान या अर्पण यह दर्शाता है कि व्यक्ति अपने जीवन में अनुशासन और जिम्मेदारी को अपनाने का संकल्प ले रहा है। धार्मिक मान्यताओं में शनिवार को लोहे का दान करने को भी शुभ माना गया है।
शनि पूजा का आध्यात्मिक संदेश
धार्मिक विद्वानों के अनुसार शनि पूजा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि जीवन से जुड़े गहरे संदेश भी देती हैं। तेल संतुलन और धैर्य का प्रतीक है, जबकि लोहा कठोर परिश्रम और अनुशासन का संकेत देता है। शनिवार का दिन व्यक्ति को अपने कर्मों पर विचार करने और जीवन में सुधार करने की प्रेरणा भी देता है।
क्या केवल पूजा सामग्री से शनि प्रसन्न होते हैं?
धार्मिक ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि शनि देव को प्रसन्न करने का सबसे बड़ा माध्यम अच्छे कर्म और ईमानदारी है। मान्यता है कि शनि विशेष रूप से उन लोगों पर कृपा करते हैं जो परिश्रमी होते हैं, जरूरतमंदों की सहायता करते हैं और अन्याय या छल से दूर रहते हैं। इसलिए केवल पूजा सामग्री चढ़ाना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि आचरण और कर्म भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इस प्रकार शनि देव की पूजा में सरसों का तेल और लोहा चढ़ाने की परंपरा केवल धार्मिक रीति नहीं है। इसके पीछे पौराणिक कथाएं, ज्योतिषीय प्रतीक और जीवन के गहरे संदेश जुड़े हुए हैं। यह परंपरा मनुष्य को धैर्य, अनुशासन और अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करने का भी माध्यम मानी जाती है।

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Web Title-Why Mustard Oil and Iron Are Offered in Shani Dev Worship? Know the Religious and Astrological Significance
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