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विभुवन संकष्टी चतुर्थी: क्या आज भद्रा का रहेगा प्रभाव? जानिए पूजा का शुभ समय, विधि और महत्व

Vibhuvan Sankashti Chaturthi 2026: Know Puja Timings, Rituals and Spiritual Significance of Lord Ganesha Worship - Puja Path in Hindi

ज्येष्ठ अधिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है। इस वर्ष यह व्रत शुभ और शुक्ल योग के संयोग में मनाया जा रहा है, जिससे इसकी आध्यात्मिक महत्ता और अधिक बढ़ गई है। सनातन परंपरा में संकष्टी चतुर्थी को विघ्नों का नाश करने वाली तिथि माना जाता है। विशेष रूप से अधिक मास में आने वाली संकष्टी चतुर्थी अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजन, जप और दान करने से जीवन में आने वाली बाधाओं का निवारण होता है तथा सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
क्या विभुवन संकष्टी पर रहेगा भद्रा का प्रभाव?

धार्मिक गणनाओं के अनुसार आज प्रातः 8 बजकर 12 मिनट से रात्रि 9 बजकर 21 मिनट तक भद्रा का काल रहेगा। हालांकि भद्रा का प्रभाव केवल उसके पृथ्वी लोक में होने पर ही मान्य माना जाता है। आज चंद्रमा धनु राशि में स्थित रहेगा, जिसके कारण भद्रा का पृथ्वी पर प्रभाव नहीं माना जा रहा है। ऐसे में श्रद्धालु बिना किसी संशय के भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
चंद्र दर्शन का विशेष महत्व
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखकर रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करते हैं और उन्हें अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके पश्चात भगवान गणेश की पूजा कर व्रत का पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि चंद्र दर्शन के बिना संकष्टी व्रत की पूर्णता नहीं होती।

दिनभर के शुभ मुहूर्त

आज का ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 4 बजकर 2 मिनट से 4 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 38 मिनट से 3 बजकर 34 मिनट तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त सायंकाल 7 बजकर 14 मिनट से 7 बजकर 34 मिनट तक रहेगा। अमृत काल सायंकाल 7 बजकर 37 मिनट से रात्रि 9 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। निशीथ मुहूर्त रात्रि 11 बजकर 59 मिनट से अगले दिन प्रातः 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगा।
इसके अतिरिक्त प्रातः और सायंकाल के कई शुभ काल भी उपलब्ध रहेंगे, जिन्हें पूजा-पाठ, जप और आराधना के लिए उत्तम माना गया है। श्रद्धालु अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार इन शुभ समयों में भगवान गणेश का पूजन कर सकते हैं।
विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पूजन विधि
इस पावन अवसर पर प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करें। गणपति का शुद्ध जल से अभिषेक करें और उन्हें पुष्प, फल तथा चंदन अर्पित करें। इसके बाद लड्डुओं का भोग लगाकर संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण अथवा पाठ करें।
पूजन के दौरान भगवान गणेश के मंत्रों का जप विशेष फलदायी माना जाता है। आराधना पूर्ण होने के बाद भगवान की आरती करें और रात्रि में चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य अर्पित करें। अंत में भगवान गणेश से जाने-अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा याचना कर व्रत का समापन करें।

गणपति आराधना का आध्यात्मिक महत्व

भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण के बिना अधूरी मानी जाती है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी पर उनकी उपासना करने से मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने की मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार श्रद्धा और निष्ठा के साथ की गई गणपति आराधना जीवन के अनेक कष्टों को दूर करने में सहायक होती है।

नारियल के लड्डू अर्पित करने की परंपरा

इस विशेष तिथि पर भगवान गणेश को नारियल से बने लड्डुओं का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता है कि इससे भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बनाए रखते हैं। यह परंपरा समर्पण, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
श्रद्धा और विश्वास का पर्व
विभुवन संकष्टी चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आत्मिक शुद्धि, अनुशासन और ईश्वर के प्रति समर्पण का पर्व भी है। यह दिन भक्तों को अपने जीवन में सकारात्मकता, संयम और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। इसलिए इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश की आराधना करना विशेष पुण्यदायी माना गया है।
डिस्क्लेमर: यह आलेख धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मान्यताओं में भिन्नता संभव है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या व्रत से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए योग्य विद्वान अथवा संबंधित विषय के जानकार से परामर्श अवश्य करें।

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