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नैना के ज़रिए संदीपा धर ने भाई-बहन कम्पैरिजन वाली संस्कृति पर उठाए सवाल

Sandeepa Dhar questions the culture of sibling comparison through Naina - Bollywood News in Hindi

मुंबई। जैसे-जैसे 20 फरवरी को रिलीज़ होने जा रही दो दीवाने सहर में की तारीख करीब आती जा रही है, वैसे-वैसे इस फिल्म को लेकर दर्शकों का उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। फिलहाल इस फिल्म के साथ फिल्म के ट्रेलर में नज़र आई संदीपा धर का हालिया सोशल मीडिया नोट चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने दर्शकों के दिलों को छू लिया है। इस नोट में संदीपा ने भावनात्मक पंक्तियों के माध्यम से नैना से परिचय कराते हुए बताया है कि नैना एक ऐसा किरदार है, जो शूटिंग खत्म होने के बाद भी उनके साथ बना रहा। हालांकि इस प्रेम कहानी के परे, नैना की यात्रा में छिपी सामाजिक सच्चाई इस फिल्म को खास तौर पर प्रासंगिक बनाती है। रवि उद्यावर के निर्देशन में बनी और संजय लीला भंसाली फिल्म्स द्वारा निर्मित यह फिल्म भले ही एक लव स्टोरी के रूप में प्रस्तुत की जा रही हो, लेकिन संदीपा के शब्द इसके भीतर छिपी बातों को उजागर करते हैं। ये वो बातें हैं, जिन पर कभी खुलकर बात नहीं होती। संदीपा ने भावनात्मक लहजे में लिखा है, सुंदर। सफल। अमीर परिवार में शादी हुई नैना को हर कोई परफेक्ट मानता है। इनफैक्ट कागज़ पर वह वही आदर्श छवि है, जिसे समाज सराहता है। लेकिन इस परफेक्शन की कीमत क्या है। उस सजी-संवरी छवि के पीछे एक ऐसी स्त्री है, जिसने धीरे-धीरे अपनी पहचान खो दी है। एक सच्चाई जो कई भारतीय घरों में अनकही रह जाती है।
इसके अलावा संदीपा ने भारतीय परिवारों में आम तौर पर होने वाले भाई-बहन की तुलना पर भी बात की है। यह एक ऐसी चर्चा है, जिस पर कम ही बातें होती है, लेकिन जो बच्चे के आत्मसम्मान पर गहरा असर डालती है। परफेक्ट बच्चा बनाम दूसरा बच्चा। एक जो अपेक्षाओं पर खरा उतरता है, और दूसरा जो अभी खुद को खोज रहा है। हालांकि भारतीय परिवारों में इस तुलना को अक्सर प्रेरणा का नाम दिया जाता है, लेकिन कई बार वही तुलना चुपचाप भावनात्मक दरार बन जाती हैं।
नैना के माध्यम से संदीपा एक बड़े सवाल को सामने रखती हैं। वो लिखती हैं, क्या आज भी एक महिला की सफलता इस बात से तय होती है कि वह तयशुदा भूमिकाओं में कितनी सहजता से फिट बैठती है? क्यों बाहरी मान्यता को आंतरिक संतोष से ज्यादा महत्व दिया जाता है? और क्यों परफेक्ट बनने की चाहत अक्सर आत्म-विलुप्ति की मांग करती है?
गौरतलब है कि फिल्म दो दीवाने सहर में कहानी की खूबसूरती यह है कि यह परंपराओं को खलनायक नहीं बनाती, बल्कि एक आईना दिखाती है। यह स्वीकार करती है कि भारत में प्रेम कहानियां सिर्फ दो लोगों की नहीं होतीं, बल्कि वे परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा, छवि और उस अदृश्य चेकलिस्ट से भी जुड़ी होती हैं, जो तय करती है कि क्या सही है। संदीपा के अनुसार दो दीवाने सहर में दो अपूर्ण लोगों की सच्चे प्यार और खुद को पाने की कहानी और रोमांस नहीं है, बल्कि खुद को हासिल करने की भी यात्रा है।
संदीपा धर के अनुसार सही मायनों में यह कहानी आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी या आदर्श बहन के दायरे से बाहर निकलकर अपनी पहचान दोबारा खोजने की भी है। विशेष रूप से ऐसे समय में, जब मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत पहचान और भावनात्मक स्वतंत्रता पर बातचीत मुख्यधारा का हिस्सा बन रही है, नैना की यात्रा बेहद प्रासंगिक महसूस होती है।
समाज भले ही आज भी परफेक्शन का जश्न मनाता हो, लेकिन ऐसी कहानियां याद दिलाती हैं कि प्रामाणिकता कहीं ज्यादा ताकतवर होती है। अगर संदीपा के शब्दों को संकेत माना जाए, तो 20 फरवरी को ‘दो दीवाने सहर में’ के माध्यम से सिर्फ एक किरदार से मुलाकात नहीं होगी, बल्कि उन बातचीतों की शुरुआत भी होगी, जिन्हें कई परिवार लंबे समय से टालते आए हैं।

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Web Title-Sandeepa Dhar questions the culture of sibling comparison through Naina
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